व्यवसाय चयन के सिद्धान्त क्या है ?

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व्यवसाय चयन के सिद्धान्त

सर्वप्रथम व्यवसाय चयन के सिद्धान्त के क्षेत्र में एली जिन्जवर्ग (Eli Ginzberg ) ने सन् 1951 में एक अध्ययन किया। जिन्जवर्ग के अनुसार, ‘व्यवसाय-चयन एक प्रक्रिया होती है। तथा यह तीन स्तरों में विभक्त होता है- कल्पनायें (Fantasy), संभाव्य चयन (Tentative choices) तथा वास्तविक चयनं (Realistic choice) बिन्जवर्ग के इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक निर्देशन कार्यकर्ता को व्यावसायिक निर्देशन देते समय देखना चाहिए कि व्यक्ति व्यावसायिक विकास के किस स्तर पर है। जिन्जवर्ग के अनुसार व्यावसायिक विकास की प्रक्रिया ठीक बालक के जन्म से ही प्रारम्भ हो जाती है तथा जीवन पर्यन्त चलती है। व्यावसायिक विकास का अध्ययन बालक के सात वर्ष की आयु से ही किया जा सकता है। व्यवसाय चयन के बारे में ग्यारह वर्ष से पूर्व की आयु काल्पनिक (Fantasy) कही जा सकती है। ग्यारह से सत्तरह वर्ष की आयु सम्भाव्य चयन (Tentative choice) की आयु है तथा सत्तरह वर्ष के ऊपर की आयु व्यवसाय के वास्तविक चयन की आयु कहलाती है। जिन्जवर्ग के अनुसार व्यवसाय का सम्भाव्य चयन स्तर पुनः तीन उप स्तरों में विभक्त किया जा सकता है। इस स्तर के प्रथम चरण में किशोर बालक अपनी रूचियों का विकास करता है अतः रूचि-स्तर कहा जा सकता है। रूचियों को ध्यान में रखने के बाद बालक अपनी क्षमताओं को देखता है अतः दूसरा स्तर क्षमताओं (Capacity Stage) का है और अन्त में बालक अपने मूल्यों (Values) का अध्ययन करता है अतः सम्भाव्य चयन का तीसरा उप-स्तर मूल्य स्तर (Value stage) है।

सुपर (Super) ने जिन्जवर्ग के उपर्युक्त वर्णित सिद्धान्त की कड़ी आलोचना की और कहा कि व्यवसाय चयन तथा व्यावसायिक विकास के लिए निम्न बातें अधिक महत्वपूर्ण है

शिक्षा के डाल्टन योजना की विवेचना कीजिए।

  1. प्रत्येक व्यक्ति योग्यता, रूचि तथा व्यक्तित्व में एक दूसरे से भिन्न होता है।
  2. इस मित्रता के कारण ही व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न व्यवसायों के लिए पसन्द का विकास होता है।
  3. प्रत्येक व्यवसाय के लिए पृथक-पृथक योग्यताओं, दक्षताओं तथा व्यक्तित्व गुणों की आवश्यकता होती है।
  4. समय तथा अनुभव के साथ-साथ हमारी व्यावसायिक रूझानें, पसन्द तथा रूचियाँ बदलती रहती है।

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