वर्ण व्यवस्था के गुण / अवगुण की समीक्षा कीजिये।

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सामाजिक विकास और सहयोग के लिए स्थापित वर्ण व्यवस्था के गुणों के साथ अवगुण का भी उल्लेख मिलता है। जो निम्नलिखित है

वर्ण व्यवस्था की विषेशताएँ / गुण

(1) सामाजिक प्रगति में योगदान-

वर्ण व्यवस्था में इस बात का ध्यान रखा गया है। कि समाज के प्रत्येक वर्ग का पूरा विकास हो सके और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। वर्ण व्यवस्था द्वारा प्रत्येक वर्ष का दायित्व निर्धारित कर दिया गया। अपने दायित्व का निर्धारण करते हुए यह समाज की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था सामाजिक प्रगति इस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति के कर्त्तव्य पालन पर निर्भर थी। यह किसी व्यक्ति विशेष का कार्य न होकर सबका सामूहिक कर्त्तव्य था।

(2) व्यवसाय का निर्धारण

यद्यपि वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुणों के आधार पर होता था, जन्म के आधार पर नहीं फिर भी एक परिवार में वंश परम्परा के अनुसार व्यवसाय अपनाए जाने लगे। एक ही कार्य को परम्परागत करते रहने से उस कार्य में निपुणता आयी और उत्तरोत्तर सुधार होता चला गया। व्यवसाय के निर्धारण में इस तरह से वर्ण व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। प्रारम्भ में इसका यह उद्देश्य नहीं था लेकिन परम्परा के कारण वर्ष व्यवस्था की यह विशेषता उभरकर सामने आयी।

(3) कर्म के सिद्धान्त एवं पुनर्जन्म की अवधारणा पर जोर

वर्ष व्यवस्था के अन्तर्गत वर्णाश्रम धर्म को मानना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य बतलाया गया। इससे वर्णाश्रम सिद्धान्त में कर्म के सिद्धान्त की पुष्टि होती है साथ ही साथ यह बात भी जोड़ दी गई कि जो व्यक्ति इस धर्म का पालन करेगा उसे मोक्ष प्राप्त होगा। वर्ष व्यवस्था के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन निष्ठापूर्वक करता था। उसे यह बताया गया है कर्तव्य पालन से ही मोक्ष की प्राप्ति होगी इसलिए वह वर्ष व्यवस्था में बताए गए कर्त्तव्य का ही अनुशरण करता था। ऐसा करने से उसे यह आशा बंधी रहती थी की वह इहलोक के साथ-साथ परलोक में भी सुख प्राप्त करेगा।

(4) श्रम विभाजन की अद्वितीय व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था के द्वारा व्यक्ति अपने परम्परागत व्यवसाय को अपनाता चला गया जिसके कारण समाज में श्रम का विभाजन हुआ। प्रत्येक व्यक्ति अपनी वंश परम्परा के कार्य को करता था और उसमें ही वह सन्तुष्ट रहता था। इस प्रकार से समाज का प्रत्येक छोटा-बड़ा कार्य चलता रहता था। प्रत्येक व्यक्ति इस व्यवस्था से बंधा होने के कारण अपने कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करता था। वंश परम्परा के इस कार्य को आगे बढ़ाने की परम्परा से यह बात उभर कर सामने आयो कि प्रत्येक कार्य में लोगों को निपुणता बढ़ती चली गई। इस प्रकार से कार्य में विशेषीकरण होता चला गया।

(5) समाजिक संघर्षों से मुक्ति

वर्ण व्यवस्था के द्वारा वर्ग संघर्ष को रोकने में काफी सहयोग प्राप्त हुआ। कभी ऐसा समय नहीं आया कि कार्यों के बंटवारे के लिए युद्ध हुआ हो। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के कार्य का निर्धारण तो वर्ण व्यवस्था करती थी। इसलिए कभी भी वर्ग संघर्ष जैसी स्थिति उभरकर सामने नहीं आयी। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि वर्ष व्यवस्था ने सामाजिक संघर्ष से मुक्ति दिलायी।

(6) समानता की नीति पर आधारित

समाज की दृष्टि से प्रत्येक वर्ष का महत्व था। कोई भी वर्ण छोटा या बड़ा नहीं था, अपितु समाज में सबकी समान उपयोगिता थी। किसी न एक वर्ष के कार्य न करने पर समस्त सामाजिक कार्यों में बाधा आ जाती थी। इस प्रकार से वर्ष व्यवस्था को ऐसा बनाया गया था कि प्रत्येक वर्ष के लोगों को महत्व प्राप्त हो सके। कार्यों का विभाजन भले ही हो गया था लेकिन प्रत्येक वर्ष समान थे।

(7) शक्ति सन्तुलन बनाए रखने में योगदान

समाज की शक्ति को सन्तुलित बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि उसका समाज में समान रूप से वितरण हो। प्राचीन काल में यह मान्यता थी कि शक्तियों कुल चार प्रकार की है

  • (अ) ज्ञान शक्ति
  • (ब) सेना या सैन्य शक्ति
  • (स) अन्न या सम्पत्ति शक्ति
  • (द) सेवा या श्रम शक्ति

इन चारों शक्तियों को समाज के एक ही व्यक्ति या वर्ष के हाथों में नहीं दिया गया अपितु इनको समाज के चारों वर्षों में समान रूप से एक-एक शक्ति का विभाजन कर दिया गया। ब्राह्मणों को ज्ञान की शक्ति प्रदान की गई। क्षत्रियों को सैन्य शक्ति प्रदान की गई। वैश्य वर्ग को अन्न या सम्पत्ति शक्ति प्रदान की गई जबकि शूद्रों को सेवा या श्रम शक्ति प्रदान की गई। इस प्रकार से वर्ष व्यवस्था में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था कि समाज के किसी भी वर्ग को शक्ति विहीन न रखा जाए बल्कि शक्ति का वितरण सभी वर्षों में समान रूप से किया जाए।

वर्ण व्यवस्था के अवगुण / दोष

वर्ण व्यवस्था के कारण समाज का एक वर्ग विशेष रूप से उपेक्षित रहा। संक्षेप में वर्ण व्यवस्था के दोषों का वर्णन इस प्रकार से किया जा सकता है

(1) कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था भेदभावपूर्ण एवं दोषपूर्ण है। इस अनैतिकता के कारण प्रत्येक व्यक्ति को उसकी दक्षता का पूर्ण इस्तेमाल करने का अवसर नहीं मिल पाता है। इस प्रकार से कहा जा सकता है की किसी वर्ण विशेष को विभाजित करके निम्न बना देना न सिर्फ अनुचित है अपितु अनैतिक भी है।

(2) समाज का सबसे निम्न वर्ण शूद्र अपना विकास नहीं कर सका। धार्मिक आधार बताकर उसे विराट पुरुष के पैरों से उत्पन्न बताया गया। पैरों से उत्पन होने के कारण सेवा का भार उसके कन्धों पर डाल दिया गया। यह वर्ण लम्बे समय तक इस व्यवस्था के कारण दूसरों की सेवा ही करता रहा। फलस्वरूप यह विकास की मूलधारा से वंचित रह गया। इसका प्रभाव आज भी भारतीय समाज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस प्रकार से वर्ण व्यवस्था के दोषों के कारण समाज के शूद्र वर्ण का विकास नहीं होने दिया गया।

सामाजिक प्रतिमान से आप क्या समझते हैं? तथा इस की विशेषतायें लिखिए।

(3) वर्ष व्यवस्था के आधार पर कार्यों का विभाजन समय के साथ कर दिया गया। बाद में कार्य के आधार पर समाज का एक वर्ष अपने आपको विशिष्ट मानने लगा, अपनी इसी विशिष्टता के कारण वह अन्य वर्णों एवं जातियों को बहुत उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगा जिसके कारण आगे चलकर कई समस्याएँ जैसे छुआ-छूत की एवं भेदभाव की भावना का जन्म हुआ। इस प्रकार से वर्ण व्यवस्था ने परोक्ष रूप से छुआ-छूत की भावना को जन्म दिया।

(4) प्रत्येक व्यक्ति प्राकृतिक रूप से समान होता है। इसी प्राकृतिक समानता के कारण ही वह समाज में बराबरी का स्थान एवं आश्रय प्राप्त करता है। वर्ण व्यवस्था व्यक्ति की इस प्राकृतिक समानता पर चोट पहुँचाती है। इस प्राकृतिक अधिकार पर चोट के कारण समाज के एक विशेष वर्ण को विकास का अधिक अवसर प्राप्त हुआ। जबकि समाज के दूसरे वर्ण उपेक्षित रहे, योग्यता होते हुए भी वे प्रकृति प्रदत्त अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं कर सके।

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