उत्तर वैदिक काल में धर्म के स्वरूप की विवेचना कीजिए।

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उत्तर वैदिक काल में धर्म के स्वरूप – उत्तर वैदिक कालीन धर्म सादिक धर्म के उत्तरोत्तर विकास को प्रदर्शित करता है। इस समय आर्य पूर्व में प्रचलित अंधविश्वासों से निकलकर नवीन धार्मिक सिद्धान्तों को जन्म दे रहे थे. जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

(1) पुनर्जन्मवाद का जन्म

उत्तर वैदिक काल में कुछ ऋषियों ने आत्मा तथा ब्रह्म के विषय में चिन्तन करके अनेक सिद्धान्तों का प्रचार किया। पुनर्जन्मवाद का सिद्धान्त इस समय तक शुरू हो चुका था। मोक्ष प्राप्त करके ही सांसारिक बन्धनों से मुक्ति प्राप्त हो सकती थी।

(2) कर्मवाद का सिद्धान्त

उत्तर वैदिक काल में कर्मवाद के सिद्धान्त का भी तेजी से प्रचार हुआ। इनके अनुसार मनुष्य अपने पूर्व कर्मों का फल अवश्य ही प्राप्त किया करता है। यदि उसके कर्म अच्छे हैं तो फल भी अच्छे प्राप्त करेगा और बुरे कर्म है तो उसको कष्टों तथा दुःखों का सामना करना पड़ेगा। अच्छे कार्यों के द्वारा ही मनुष्य को मोक्ष। प्राप्त हो सकता है। उपनिषदों में आत्मा, परमात्मा तथा जन्म मरण आदि सिद्धान्त की विशद रूप से व्याख्या की गयी है।

( 3 ) तप मार्ग का सिद्धान्त

यह सिद्धान्त भी उत्तर वैदिक काल में उत्पन्न हो गया। था जिसके अनुसार तपस्या के द्वारा मनुष्य अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। संसार मोह को त्याग कर वन में तपस्या करें। शवर को कष्ट देकर ही उसकी आत्मा शुद्ध हो सकती है। जब आत्मा शुद्ध हो जाती है तब मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

इन सब बातों का उत्तर वैदिक काल की धार्मिक दशा पर गहरा प्रभाव पड़ा और साधारण जनता धर्म का असली रूप नहीं देख सकी।

उत्तर वैदिक धार्मिक विश्वास-

इस युग के लोगों को स्वर्ग और नरक के सिद्धान्त पर विश्वास था। जैसा हमें डॉदू बेनी प्रसाद के शब्दों से भी ज्ञात होता है, इस पर मनन करते-करते विश्व के आदि कारण की कल्पना हुई। विश्व चक्र में संसार क्षण भंगुर प्रतीत होता है, अतएव इसमें स्थायी सुख नहीं हो सकता था। दुःख तो बहुत सा है, इस सारे जंजाल को छोड़कर शान्ति पाने की चेष्टा करनी चाहिए। इसी के द्वारा निम्नांकित भावनाओं का जन्म हुआ।

(अ) तप की भावना

इसी बात से तप की परिपाटी चल पड़ी। स्वर्ग पाने के लिए तप करना आवश्यक समझा गया। ब्राह्मणों ने भी इस पर अधिक बल दिया।

(ब) यज्ञ-

ऋग्वैदिक काल में भी यज्ञ होते थे जिसकी विधि कठिन थी परन्तु उसकी प्रक्रिया सरल थी। उत्तर वैदिक काल में यज्ञ विधि ऋग्वैदिक काल के मुकाबले में अधिक जटिलतम तथा सूक्ष्म हो गयी थी। एक यज्ञ को करने में सोलह-सत्रह पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती थी। इन यज्ञों में घी, लकड़ी, दूध, हवन सामग्री, पशु एवं वस्त्र आदि की आवश्यकता पड़ती थी। जिसके लिए अधिक धन की आवश्यकता होती थी।

(स) भक्ति सम्प्रदाय का जन्म

भक्ति का सम्बन्ध आमतौर से दिल से तथा धर्म का सम्बन्ध सदाचार से होता है। इस विचार के अनुसार कर्म की शुद्धता तथा पवित्रता पर बल दिया गया था। शैव सम्प्रदाय तथा वासुदेव सम्प्रदाय इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर टिके हुए थे। भक्ति सम्प्रदाय के विचारों की दाग बेल इस युग में आ चुकी थी, जो धर्म दर्शन की एक प्रमुख देन कही जाती है।

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(द) मूर्ति पूजा

मूर्तिपूजा के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस समय तक मूर्तिपूजा का प्रचलन हो चुका था, जबकि कुछ विद्वान इस बात को मानने से इन्कार करते हैं। पाणिनी की अष्टाध्यायी में वर्णन है कि इस समय देवालयों में मूर्तियों का प्रतिष्ठापन शुरू हो गया था।

(य) कर्मकाण्ड-

इस समय यह विचार तेजी से जोर पकड़ रहा था कि यज्ञों के सम्पादन द्वारा ही समस्त इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है। ऋग्वैदिक काल में तो परिवार का मुखिया स्वयं यज्ञ कर लेता था। परन्तु उत्तर वैदिक काल में ऐसा नहीं था। अब यज्ञ ब्राह्मणों के द्वारा होते थे। एक यज्ञ के लिए सोलह सह पुरोहित बुलाये जाते थे जो केवल मन्त्र पढ़ा करते थे। यह बात भी कही जाती थी कि यदि बलि नहीं दी जायेगी तो सुर्योदय नहीं होगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक जीवन की ठेकेदारी पुरोहितों के हाथों मैं थी। उनका ही दबदबा इस क्षेत्र में था।

(र) पुरोहितों तथा ब्राह्मणों का प्रभुत्व-

यज्ञ तथा हवन तथा तप की पेचीदा पद्धति के कारण पुरोहितों तथा ब्राह्मणों का महत्व बढ़ गया था। इन लोगों ने धर्म को इस तरह से छुपा दिया कि उसके असली रूप का पता तक नहीं चल पाया और उसको साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर कर दिया। हवन, यज्ञ, तप, आदि अनिवार्य हो गये जिसने जजमानी प्रथा को जन्म दिया। एक-एक पण्डे के पास काफी संख्या में लोग जजमान हो गये। ये पण्डे धर्म के नाम पर साधारण व्यक्तियों की जे खाली कराने लगे।

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(ल) विविध धार्मिक विश्वास

उत्तर वैदिक काल में ऐसे तन्त्र-मन्त्रों का भी उल्लेख हमें देखने को मिलता है जिनका प्रयोग जादू टोने के लिए किया जाता था इसका परिणाम यह हुआ कि अन्धविश्वास धार्मिक जीवन को एक अंग बन गया, जो हमें अनार्य प्रभाव के समान दिखायी देता है।

(ब) देवी-देवता

इस काल में इन्द्र, वरुण, सूर्य, अग्नि, वायु, सोम, इन्द्र, ऊषा, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है। इन्हीं के साथ-साथ शिव-पार्वती, रुद्राणि भवानी, आदि शैव सम्प्रदाय के देवी-देवताओं के नाम भी देखने को मिलते हैं। इस काल के महत्वपूर्ण प्रन्थों में वासुदेव का भी नाम मिलता है। उनके अध्ययन से पता चलता है कि वासुदेव सम्प्रदाय का जन्म इसी काल में हुआ था। उत्तर वैदिक काल की अनेक पुस्तकों में भी यह नाम देखने को मिलता है। इस काल में देवता मानव रूपधारी प्रकृति के प्रतिनिधि मात्र न रहकर वे तो प्रकृति के भिन्न रूप में माने जाने लगे थे।

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