सुमेरियन सभ्यता के लेखन कला और साहित्य पर प्रकाश डालिए।

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सुमेरियन सभ्यता के लेखन कला – लेखन कला विश्व सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में सुमेर के निवासी, लेखन कला का आविष्कार करने वाले पहले लोग थे। मानव की स्मृति भ्रमशील है अतः विवाद उत्पन्न होने पर स्थायी साक्षी की आवश्यकता पड़ी। धीरे-धीरे इन लोगों ने अनुभव किया कि मात्र किसी के कह देने से ही किसी वस्तु के स्वामित्व का निर्णय करना उचित नहीं अतः साम्पत्तिक अधिकारों के प्रत्यक्ष सहायक के रूप में प्रस्तुत करने लायक दस्तावेज अनिवार्य होते गये और एक क्रमशः जटिलता की ओर अग्रसर समाज में लेखन कला की सहज उत्पत्ति हुई। लेखन कला के उत्पन्न होने पर इतिहास का जन्म भी अपरिहार्य था। मिट्टी को पट्टिकाओं पर लिपि के प्राचीनतम प्रमाण किससे 3500 ई.पू. के मिले हैं। यह लिपि, विकास के विभिन्न स्तरों-भावचित्र, ध्वनिलिपि, शब्दांशलिपि, संकेत चिन्ह-से गुजरती हुई कीलाक्षर लिपि के रूप में उपलब्ध है। इस लिपि के अभाव में मेसोपोटामिया के इतिहास की रचना असम्भव नहीं तो मुश्किल अवश्य थी।

लिपि के अतिरिक्त सुमेर के लोगों ने ही कुम्हार के चाक और पहियों का आविष्कार किया था। ये दोनों खोजें भी क्रांतिकारी महत्व की थी। कल्पना कीजिये यदि आज बीसवी सदी की सभ्यता में से केवल पहिये को निकाल दिया तो क्या यह सभ्यता जड़ होकर पुन: नवपाषाण काल के दरवाजे पर खड़ी नहीं हो जायेगी ? वास्तव में सम्पूर्ण विश्व को की इस खोज के लिये आभार मानना चाहिये।

सुमेर के प्राचीन विद्वानों ने 30 दिन के एक महीन और 354 दिन के वर्ष का निर्धारण चन्द्रमा की गति के आधार पर किया। संवत् का उन्हें ज्ञान नहीं था। दो मौसमों गर्मी (इमिश) और जाड़ा (इन्तिन) के हिसाब से जीवन को गतिशील करते थे। गणना की सुमेरियन प्रणाली लगभग षड्दाशमिक थी- 1, 10, 60, 600, 3600 आदि। विद्यालयों में गणित के पाठ्यक्रम के गुणा, भाग, गुणनखण्ड, वर्ग, वर्गमूल, घन के सवाल पढ़ाये जाते थे तथा पाइथागोरियन संख्याओं, घनमूल और समीकरण भी शिक्षा के अंग थे।

चिकित्साशास्त्र का ज्ञान था जिसका विकास जादू मंत्र और अनुष्ठान से हुआ था। प्रायः दोनों की अभिन्नता दिखलाई पड़ती है। चिकित्सा में जल का महत्व सबसे ज्यादा था अतः चिकित्सक (अजू) को जलज्ञाता मानते थे। दुःख, पीड़ा और रोग को प्रायः अमंगलकारी आत्माओं का प्रकोप समझा जाता था और बीमारियों का उपचार अनुष्ठान और मत्रोच्चार द्वारा भी करने का प्रयास किया जाता था ताकि दुष्ट आत्मा शान्त हो जाय। फिर भी उल्लेखनीय है कि सुमेर के अनुभवी चिकित्सकों ने कुछ पशुओं, पौधों और खनिज तत्वों की औषधीय गुणवत्ता की जानकारी प्राप्त कर ली थी।

शिक्षा और साहित्य

सभ्यता के इतिहास में लिपि की तरह शिक्षा की औपचारिक प्रणाली का विकास भी सबसे पहले सुगेर के निवासियों ने ही किया तृतीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध तक सुमेर के शिक्षा केन्द्र परिपक्व और विकसित हो चुके थे। सुमेरियन भाषा में विद्यालय को इदुब्ब (पट्टिका भवन) कहा जाता था। संभवतः इसी शब्द से फारसी के ‘अदव’ की उत्पत्ति हुई है। राज्य की आर्थिक और प्रशासकीय जरूरतों को पूरा करने के लिये आवश्यक लिपिकों के प्रशिक्षण हेतु विद्यालयों की स्थापना की गई थी। ये आवश्यकतायें पहले मन्दिरों, राजमहलों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों से सम्बन्धित थीं। कालान्तर में सुमेर के ये शिक्षाकेन्द्र शिक्षा और संस्कृति के स्थलों के रूप में विकसित हुये ओर इनका धर्मेतर स्वरूप निखर का आया। यही विद्यालय सृजनात्मक लेखन-केन्द्र भी बने।

निकोलस श्नीडर के मतानुसार अधिकांश छात्र सम्पन्न परिवारों के होते थे क्योंकि शिक्षा में संभावित धन और समय के व्यय भार को वहन करने की क्षमता गरीबों में नहीं थी। सुमेर के विद्यालयों के प्रधान उम्मिया (विशेषज्ञ) कहलाते थे और वे ‘विद्यालय- पिता’ के रूप में आदरणीय समझे जाते थे। पाठ्यक्रम में शामिल विषय अर्द्धवैज्ञानिक, विद्वतापूर्ण साहित्यिक और सृजनात्मक थे।

सुमेरियन साहित्य के अंतर्गत पुराख्यान, कहाकाव्य-कथा, स्तोत्र, विलापगीत, निबन्ध, ऐतिहासिक दस्तावेज, नीतिवचन और लोकोत्तियाँ उल्लेखनीय है। प्रमुख काव्यात्मक पुराख्यानों में ‘एनकी और विश्व व्यवस्था, ‘एनलिल और निनलिल, ‘एनकी और निनहर्संग, ‘दुमुजि की मृत्यु’ और ‘गिलगमेश’ का महत्व है। सुमेरियन भाषा के प्राचीन काव्य में व्यवस्थित विशेषणों की भरमार है जो दीर्घ पुनरावृत्तिपरक स्तोत्रों से युक्त और विस्तृत कलेवर वाले हैं। कथोपकथन भी विस्तृत हैं जो विस्तृत भाषण की शक्ल अख्तियार किये हुये हैं। विश्व-विख्यात चरितनायक ‘गिल्गमेश’ की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है-

मिस्र में दास प्रथा की विवेचना कीजिए।

गिल्गर्मेश उरूक का राजा था जिसका क्रूर शासन अत्याचार की सरहदों को छूने लगा था प्रसिद्ध विजेता किन्तु आततायी गिलगमेश का विनाश करने के लिये देवताओं ने एक बनैले मानुष एनकिड का सृजन किया। गिल्गमेश ने एनकिडु को वश में करने के लिये एक अपूर्वयौवना भुवनमोहिनी वेश्या को भेजा। यह युक्ति काम कर गई और उसके प्रभाव से जंगली एनकिडु परिधान सज्जित होकर पशुओं को बचाने के लिये बाघों और भेड़ियों से भिड़ने को तत्पर हो गया। बाद में गिल्गमेश और एनकिडु दोनों ने मिलकर अनेक दुःसाहसी कारनामों को अंजाम दिया लेकिन एक नाजुक वक्त पर अपने स्वामी की चेतावनी को नजरअंदाज करके एनकिडु ने ईश्वर देवी का अपमान कर दिया जिसके फलस्वरूप उसकी कारूणिक मौत हो गई। गिलगमेश विलाप करता रहा लेकिन प्रकृतस्थ होने पर अमर- त्वप्रदायक जड़ी-बूटियों की खोज में निकल पड़ा। उसे उरनपिश्तिम ने उपाय सुझाया और सुनाया साथ में भीषण जल प्रलय की कथा गिलगमेश का अभिमान सफल रहा लेकिन एक सौंप ने उससे जड़ी झटक लिया अतः एनकिडु को पुनर्जीवन न मिल सका। इस कथा में गिल्गमेश को शौर्य के जीवंत प्रतिमान, दबंग अत्याचारी, चीखते हुए निराश मानव, मंत्रणाकारी संत, कृपालु स्वामी और जीवन तथा अधोलोक के बारे में सब कुछ जानने को आतुर मर्त्य प्राणी के रूप में चित्रित किया गया है। वह यदि एक ओर दुर्दान्त जिजीविषा का प्रतीक है तो दूसरी ओर कमजोरियों का पुतला भी इस पूरी कथा की पृष्ठभूमि में अदम्य आँसुओं और मृत्यु के दूषणयुक्त उपहारों के साथ सुमेरियन कामदेवी (रती) इनन्ना उपस्थित हैं।

सुमेरियन साहित्य के प्रमुख स्तोत्र समरसता, संगीत, नौकायन, वीरता और पशुचारण से सम्बन्धित हैं। विलापगीत पहले वर्ग में नगरों और नगर राज्यों के विनाश तथा दूसरे दुमुजि की मृत्यु से जुड़े हुए हैं। गरमी जाड़ा, पशु- अनाज पक्षी-मछली, और पेड़-सरकण्डे से जुड़े विवाद महत्वपूर्ण है। आधुनिक अर्थ में इतिहासलेखन तो सुमेर में नहीं हुआ लेकिन उनमें ऐतिहासक चेतना विद्यमान थी। लिपिकों, साहित्यकारों और राजाओं में इतिहास के प्रति अभिरूचि थी। बर्बर गूतियों द्वारा एगेद पर प्रलयंकर आक्रमण का विवरण ‘एगेद का अभिशापः एकुर से प्रतिशोध’ नामक रचना में सुरक्षित है।

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