स्कन्द गुप्त का जीवन एवं उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।

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स्कन्द गुप्त का जीवन – स्कन्दगुप्त कुमारगुप्त प्रथम का पुत्र था। कुमारगुप्त प्रथम के तीन पुत्र थे प्रथमः स्कन्दगुप्त द्वितीय पुरुगुप्त एवं तृतीय बुद्धगुप्त स्कन्दगुप्त ने 455 ई. से 467 ई. तक राज्य किया। गढ़वा अभिलेख से जो चाँदी के सिक्के प्राप्त हुए है उसमें 467 ई. की तिथि दी हुयी है, ऐसा प्रतीत होता है कि ये सिक्के उसके शासन के अन्तिम समय के है।

उत्तराधिकार युद्ध

डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार का यह मत है कि स्कन्दगुप्त को राज्यसिंहासन प्राप्त करने के लिए गृह-युद्ध करना पड़ा था। डॉ. मजूमदार का कथन है कि कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात् गुप्तवंश का वास्तविक उत्तराधिकारी पुरुगुप्त था। स्कन्दगुप्त ने वास्तविक उत्तराधिकारी की हत्या करके राज्यसिहांसन प्राप्त किया। अपने मत के समर्थन में उनका सबसे बड़ा तर्क यह है कि स्कन्दगुप्त के किसी भी शिलालेख में उनकी माता का नाम नहीं मिलता है। भितरी स्तम्भ लेख में पुरुगुप्त की माता का नाम अनन्तदेवी कहा गया है जो महादेवी’ थी। मितरी शिलालेख में एक श्लोक मिलता है जिसके अनुसार ‘पिता की मृत्यु के बाद वंश लक्ष्मी चंचल हो गयी। इसको (स्कन्दगुप्त ) अपनी भुजाओं के बल से पुनः प्रतिष्ठित किया। शत्रुओं का नाश कर प्रेम अश्रुयुक्त से अपनी माता के पास गया, जिस प्रकार शत्रुओं का नाश करने वाले कृष्ण अपनी माता देवकी के पास गए थे। इस स्तम्भ लेख से यह विदित होता है कि स्कन्दगुप्त अपने मशत मुरुगुप्त को मार कर राज्य सिंहासन पर बैठा था क्योंकि वंश लक्ष्मी राजकुमारों के आन्तरिक विद्रोह के कारण चंचल होने लगी थी। परन्तु अधिकांश इतिहासकार डॉ. मजूमदार के इस मत से सहमत नहीं है। उनका यह कथन है कि भितरी स्तम्भ लेख में वंश लक्ष्मी क

हूण आक्रमण

पूर्वी शाखा के श्वेत हूणों का भारत में सर्वप्रथम आक्रमण स्कन्दगुप्त के शासन काल में हुआ, जिसका उल्लेख मितरी स्तम्भ लेख से होता है। हूणों के साथ युद्ध क्षेत्र में उत्तर आने पश्चात उसकी भुजाओं के प्रताप से सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। इस युद्ध में हूण बुरी तरह पराजित हुए और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा। हुणों के आक्रमणों को रोकने के लिये उसने उत्तर- पश्चिम और पश्चिम के पूरे क्षेत्र में सैनिक शासन लागू किया और इसके व्यय को पूरा करने के लिये उसे इस समय घटिया सोने के सिक्के जारी करने पड़े। जूनागढ़ अभिलेख में इन हूणों को ‘म्लेच्छ’ के नाम से पुकारा गया है। जूनागढ़ अभिलेख में हूणों के पराजय तिथि गुप्त संवत् 136 उत्कीर्ण है। अभिलेखीय साक्ष्यों के अतिरिक्त हूण आक्रमण का वर्णन साहित्यिक प्रमाणों से भी होता हैं। सोमदेव के कयासरिल नामक ग्रन्थ से विदित होता है कि उज्जैनी नरेश महेन्द्रादित्य के पुत्र विक्रमादित्य ने म्लेच्छों पर विजय प्राप्त किया था।

स्कन्दगुप्त एवं हूणों के मध्य युद्ध कहाँ पर हुआ था, विद्वानों में मतभेद है परन्तु अधिकांश विद्वानों का अनुमान है कि यह युद्ध गंगा नदी की घाटी के आस-पास हुआ था। हूणों पर सफलता प्राप्त करना स्कन्दगुप्त की महान उपलब्धि है। K.M. Panikar लिखते हैं कि स्कन्दगुप्त की हूणों पर विजय विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। चीन के सम्राटों ने हूणों को जिसे प्रकार चीन की ओर बढ़ने से रोक दिया उसी प्रकार स्कन्दगुप्त ने हूणों के भीषण विध्वन्सकारी आक्रमण को भारत में प्रवेश करने से रोक दिया और यह बर्नर प्रलयकारी समूह पश्चिम में यूरोप की ओर बढ़ने पर विवश हुआ।

वाकाटकों के साथ युद्ध

कालाघाट ताम्रपत्र में वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को मालवा का अधिपति कहा गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने यह मत प्रतिपादित किया है कि जिस समय स्कन्दगुप्त पुष्यमित्रों एवं हूणों के विरुद्ध लड़ रहा था तो इस अवसर का लाभ उठा कर वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन ने गुप्त साम्राज्य के मालवा प्रान्त पर अधिकार कर लिया। परन्तु यह मत उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि इस समय वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन स्वयं वस्तर राज्य के नरेश भवदत्त वर्मन के आक्रमणों से परेशान था। दूसरे गुप्त अभिलेख पुष्यमित्रों एवं हूणों के आक्रमण का तो वर्णन करते हैं, परन्तु वाकाटकों के साथ युद्ध का कहीं उल्लेख नहीं मिलता।

साम्राज्य विस्तार

स्कन्दगुप्त को अपने पिता एवं पितामह से जो एक विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था उसने अपने बाहुबल से उसे अक्षुण्ण बनाये रखा। इतना ही नहीं बर्बर एवं म्लेच्छ हूणों को पराजित कर देश से बाहर निकलने के लिये विवश कर दिया। स्कन्दगुप्त का साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण नर्मदा नदी तक फैला हुआ था। स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात गुप्त वंश के कोई ऐसे शासक न हुए जो इस विस्तृत साम्राज्य की रक्षा कर सके।

मूल्यांकन

(1) महान शासक

स्कन्दगुप्त एक महान शासक था। अपने विस्तृत साम्राज्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए केन्द्र को कई प्रान्तों में विभक्त कर दिया था। प्रत्येक प्रान्त में एक गोष्ट (राज्यपाल होता था। वह अपनी प्रजा के हित के लिये सदैव तत्पर रहता था।

समुद्रगुप्त के आर्यावर्त अभियान का विवरण दीजिए।

( 2 ) महान विजेता

स्कन्दगुप्त अपने पिता एवं पितामह के समान एक महान विजेता भ था। उसने हूणों को परास्त कर अपने देश की रक्षा की। वासुदेव उपाध्याय ने लिखा है कि ‘सम्राट स्कन्दगुप्त केवल नाम से ही स्कन्द नहीं था परन्तु इसने अपने अलौकिक कार्यों से भी ‘स्कन्द (स्वामी कीर्तिकेय) की समानता प्राप्त की थी। यह स्कन्द की भांति जन्मतः सेनानी था। रणांगण में उतरकर मतवाली शत्रु सेनाओं का क्षण में नाश करना तथा अपनी असंख्य सेना का संचालन करना इस जन्मतः सेनानी का ही काम था। इन्हीं गुणों के कारण उसे ‘विक्रमादित्य’ आदि उपाधियों से • विभूषित किया गया था।

( 3 ) महान लोकोपकारी शासक

स्कन्दगुप्त सदैव प्रजा के हित के लिये तत्पर रहता था। जूनागढ़ अभिलेख से विदित होता है कि भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील टूट गयी थी जिससे जनता को बड़ी परेशानी हो रही थी। स्कन्दगुप्त ने पर्णदत्त नामक व्यक्ति को भेजकर अतुल धनराशि व्यय करके सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया।

(4) धर्म सहिष्णु शासक

स्कन्दगुप्त विजेता एवं प्रशासक के साथ ही साथ एक धर्म सहिष्णु शासक था। यह अपने पूर्वजों के समान वैष्णव मतवलम्बी था, परन्तु अन्य धर्मों के प्रति उदार था। स्कन्दगुप्त ने ‘परमभागवत’ की उपाधि धारण की थी। कहोम लेख से विदित होता है कि स्कन्दगुप्त के शासन काल में मद्र नामक एक व्यक्ति ने जैन तीर्थकरों की प्रतिमाओं का निर्माण किया था।

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