सर्जनात्मकता और शिक्षा निर्देशन पर प्रकाश डालिए ।

सर्जनात्मकता और शिक्षा निर्देशन

सर्जनात्मकता और शिक्षा निर्देशन – सर्जनात्मकता का शिक्षण मनोविज्ञान तथा शिक्षण विधि से जुड़ा है चूंकि इसका उपयोग कक्षागत परिस्थितियों में किया जाता है, अतः शिक्षण का दायित्व और भी बढ़ जाता है। अध्यापक इन पदों का अनुसरण सर्जनात्मक चिन्तन के लिए कर सकता है।

(A) अध्यापक की भूमिका (Role of Teacher)

  1. अध्यापक जो भी कुछ पढ़ाए, उसमें समस्या के स्तरों की पहचान का शिक्षण अवश्य हो। छात्र यह अवश्य जान ले कि समस्या किस स्तर की है ? जे० स्टेनली ग्रे ने इस सम्बन्ध में कहा है समस्या समाधान की योग्यता दो पदों पर एक व्यक्ति की सीखने की या अधिगम पाने की बुद्धिवादी क्षमता या बुद्धि और दूसरा यह है कि क्या उक्त व्यक्ति ने क्षमता के भीतर अधिगम पा लिया है ?
  2. सर्जनात्मक शिक्षा के लिए समस्या समाधान के सन्दर्भ में तथ्यों का अधिगम कराया जाय। इसमें क्या किया जाना चाहिए ? आदि प्रश्नों के माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है।
  3. सर्जनात्मकता के शिक्षण के लिए मलिकता की उद्भावना विकसित करने के लिए शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। सर्जन तथा मौलिकता से अभिप्राय ज्ञान के तथ्यों को नवीन रूरूप से डालना है।
  4. अध्यापक को चाहिए कि वह छात्रों में सही मूल्यांकन करने की प्रवृत्ति विकसित करे। यह सर्जन शक्ति को अधिक विकसित करता है।
  5. छात्रों में चिन्तन की जाँच की विधि की कुशलता विकसित की जाय।

(B) विद्यालयों की भूमिका (Role of School)

विद्यालयों में सर्जनात्मकता के विकास की सर्वाधिक सम्भावनाएं तथा अवसर विद्यमान रहते हैं विद्यालय में सर्जनात्मकता का विकास पाँच कारकों के संगठन पर सम्भव है। यह पक्ष इस प्रकार हैं

(1) विद्यालय का वातावरण-

इसके अन्तर्गत अध्यापक तथा छात्र दोनों को ही कार्य करना पड़ता है। विद्यालय की स्वच्छता तथा उसका सौन्दयीकरण आवश्यक है। छात्रों में समूह बनाकर उसकी प्रतियोगिताएं कराई जा सकती है। विजेता समूह तथा छात्रों को विद्यालय की सभा के समक्ष प्रशंसा देनी चाहिए तथा पराजित समूह को सांत्वना देनी चाहिए।

(2) अनुशासन

संस्थान की प्रतिष्ठा छात्रों तथा अध्यापक मण्डल में अनुशासन पर निर्भर करती है। छात्रों को ऐसे अवसर दिये जाने चाहिए कि उनमें अनुशासन में रहने तथा अनुशासन में रहने देने की भावना विकसित हो। सेमीनार, सम्मेलन अध्यापक-अभिभावक संघ, काम देना, काम लेना, डांट फटकार आदि के माध्यम से अनुशासन का वातावरण उत्पन्न किया जाता है। छात्र संघ दिवस सदन प्रणाली, आचरण संहिता, समाज सेवा, सामूहिक खेल, आदि के द्वारा अनुशासन का विकास किया जा सकता है।

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(3) अध्यापक छात्र सम्बन्ध-

सर्जनात्मकता का उचित विकास तभी सम्भव है, जबकि अध्यापक तथा छात्रों के मध्य स्नेही तथा मधुर सम्बन्ध होंगे। अध्यापक को छात्रों की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि तथा उनकी समस्याओं का पता लगाना चाहिए। इस कार्य के लिए प्रधानाध्यापक के साथ भी सम्पर्क बनाए रखना आवश्यक है।

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