संविधान सभा का निर्माण किस प्रकार हुआ तथा अपने कार्य निष्पादन में इसे किन बाधाओं का सामना करना पड़ा ?

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संविधान सभा का निर्माण

संविधान सभा का निर्माण के लिए गठित प्रतिनिधि सभा को ‘संविधान सभा’ की संज्ञा दी जाती है। पूर्ण प्रभुता सम्पन्न लोकतन्त्रात्मक राष्ट्रों में जहाँ भी लिखित संविधान है उनका निर्माण जनता ने प्रायः संविधान सभाओं के माध्यम से किया है। संविधान सभा की प्रेरणा का स्रोत 17वीं और 18वीं शताब्दी की लोकतान्त्रिक क्रान्तियाँ रही हैं। इन क्रान्तियों ने इस विचार को जन्म दिया कि शासन के मूलभूत कानूनों का निर्माण नागरिकों की एक विशिष्ट प्रतिनिधि सभा द्वारा किया जाना चाहिए। इंग्लैण्ड के समतावादियों तथा हेनरी मेन ने संविधान सभा के विचार का प्रसार किया, किन्तु सर्वप्रथम अमरीका और फ्रांस में इस विचार को क्रियान्वित किया गया।

भारत में संविधान सभा की अवधारणा का उदय और विकास

भारत में संविधान सभा की माँग एक प्रकार से राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की मांग थी, क्योंकि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का यह स्वाभाविक अर्थ था कि भारत के लोग स्वयं अपने राजनीतिक भविष्य का निर्णय करें। संविधान सभा के सिद्धान्त के सर्वप्रथम दर्शन 1895 के स्वराज्य विधेषक’ (Swarajya Bill) में होते हैं जिसे तिलक के निर्देशन में तैयार किया था था। इसे तिलक की दूरदर्शिता कहा जाना चाहिए कि वे 19वीं सदी में इस सम्बन्ध में सोच सके 20वीं सदी में इस विचार की ओर सर्वप्रथम संकेत महात्मा गांधी ने किया, जब उन्होंने 1922 में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा।” 1924 में पं. मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख संविधान सभा के निर्माण की मांग प्रस्तुत की, किन्तु उस समय सरकार की ओर से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

इसके बाद औपचारिक रूप में संविधान सभा के विचार का प्रतिपादन एम. एन. राय ने किया और इस विचार को लोकप्रिय बनाने एवं इसे मूर्त रूप देने का कार्य पं. जवाहरलाल नेहरू ने किया। प्रमुखतया उन्हीं के प्रयत्नों से कांग्रेस ने औपचारिक रूप में घोषणा की थी कि “यदि भारत को आत्म-निर्णय का अवसर मिलता है तो भारत के सभी विचारों के लोगों की प्रतिनिधि सभा बुलायी जानी चाहिए, जो सर्वसम्मत संविधान का निर्माण कर सके। यही संविधान सभा होगी।” इस समय तक संविधान सभा के विचार ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त कर ली। अतः अनेक प्रान्तीय विधानसभाओं और केन्द्रीय विधानमण्डल द्वारा इस प्रकार के प्रस्ताव पारित किए गए।

दिसम्बर 1936 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में संविधान सभा के अर्थ और महत्व की व्याख्या की गयी और 1937 व 1938 के अधिवेशनों में इस मांग को दोहराते हुए इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया कि ” इस स्वतन्त्र देश के संविधान निर्माण का एकमात्र तरीका संविधान सभा है। सिर्फ प्रजातन्त्र ओर स्वतन्त्रता में विश्वास न रखने वाले ही इसका विरोध कर सकते हैं।”

भारतीय जनता की संविधान सभा की इस मांग का ब्रिटिश शासन द्वारा विरोध किया जाना तो स्वाभाविक था ही, देशी नरेशों और यूरोपवासियों जैसे कुछ निहित स्वार्थ वाले वर्गों द्वारा भी इस प्रस्ताव से अपने विशेषाधिकार खतरे में पड़ते देख इसका विरोध किया गया और उदारवादियों ने इसे अति प्रजातान्त्रिक बताया। शुरू में मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया, किन्तु 1940 में पाकिस्तान प्रस्तवाय के प्रतिपादन के साथ दो पृथक्-पृथक् संविधान सभाओं की मांग प्रारम्भ कर दी।

यद्यपि ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता की संविधान सभा की मांग को स्पष्टतया स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थी, किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध की आवश्यकताओं और राष्ट्रीय तथा अन्तराष्ट्रीय शक्तियों ने उसे ऐसा करने के लिए विवश कर दिया। अतः अगस्त, 1940 के प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने कहा कि “भारत का संविधान स्वभावतः स्वयं भारतवासी ही तैयार करेंगे।” इसके बाद 1942 की क्रिप्स योजना के द्वारा ब्रिटेन ने स्पष्टतया स्वीकार किया कि भारत में एक निर्वाचित संविधान सभा का गठन होगा, जो युद्ध के बाद भारत के लिए संविधान तैयार करेगी। लेकिन भारतीयों द्वारा अन्य महत्वपूर्ण आधारों पर क्रिप्स योजना को अस्वीकार कर दिया गया। अन्त में 1946 की कैबिनेट मिशन योजना में भारतीय संविधान सभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर इसे व्यावहारिक रूप प्रदान कर दिया गया।

संविधान सभा का गठन

चुनाव कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई 1946 में संविधान सभा के चुनाव हुए। संविधान सभा के लिए कुल 389 सदस्यों में से, प्रान्तों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिए ही ये चुनाव हुए। चुनावों के परिणामस्वरूप संविधान सभा में जो दलीय स्थिति उत्पन्न हुई, उसे इस प्रकार थी

कांग्रेस- 208; मुस्लिम लीग- 73; यूनियनिस्ट पार्टी 1; यूनियनिस्ट मुस्लिम – 1; यूनियनिस्ट शिड्यूल कास्ट – 1: कृषक प्रजा पार्टी – 1; अछूत जाति संघ – 1; सिख (कांग्रेस के अतिरिक्त) – 1; साम्यवादी 1; स्वतन्त्र (निर्दलीय) 8 कुल 296

संविधान सभा में अपनी स्थिति निर्बल देखकर मुस्लिम लीग ने संविधान सभा के बहिष्कार का निश्चय किया और 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं हुए। अब लीग ने पाकिस्तान के लिए बिल्कुल पृथक संविधान सभा की मांग प्रारम्भ कर दी। कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार ने इस बात के प्रयत्न किए कि लीग व्यर्थ का हठ छोड़ दे और संविधान सभा के कार्य में सहयोग करें, किन्तु सभी प्रयत्न विफल हुए।

वस्तुतः भारत की संविधान सभा का गठन तीन चरणों में पूरा हुआ। सर्वप्रथम, “कैबिनेट मिशन योजना” के अनुसार संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन हुआ और संख्या 389 निश्चित की गयी थी। द्वितीय चरण की शुरुआत जून, 1947 की विभाजन योजना कुल सदस्यों की से होती है और संविधान सभा का पुनर्गठन किया गया, जिसके अनुसार 324 प्रतिनिधि होते थे। तृतीय चरण देशी रियासतों से सम्बन्धित था और उनके प्रतिनिधि संविधान में अलग-अलग समय में सम्मिलित हुए। हैदराबाद ही एक ऐसी रियासत थी जिसके प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं हुए।

संविधान सभा के सम्मुख समस्याएँ

संविधान सभा ने अपना कार्य बड़ी कठिनाइयों में सम्पन्न किया। एक ओर उसे संविधान बनाया था और दूसरी ओर भारत के शासन के लिए समय-समय पर कानून भी बनाने थे। संक्षेप में, संविधान सभा के सामने आयी कठिनाइयों का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

1, संविधान सभा को संसार के सबसे बड़े प्रजातन्त्र के लिए संविधान बनाना था। जिसकी तत्कालीन जनसंख्या 36 करोड़ थी। फिर ये 36 करोड़ लोग एक समान भी नहीं थे। देश में भिन्न-भिन्न धर्म, जाति, संस्कृति, भाषा विद्यमान थी जो आज भी हैं। इस ‘अनेकता में एकता’ (Unity in diversity) स्थापित करना सरल कार्य नहीं था।

2. संविधान निर्माताओं के सामने एक बड़ी समस्या देशी रियासतों के सम्बन्ध में थी। कैबिनेट मिशन योजना और माउण्टबेटन योजना के अन्तर्गत देशी नरेशों को पूर्ण स्वतंत्रता दे दी गई थी कि वे चाहें तो भारत में सम्मिलित हो सकते हैं, चाहें तो पाकिस्तान में और चाहें तो स्वतन्त्र भी रह सकते हैं। परिणामस्वरूप कई नरेश स्वतन्त्र होने की प्रबल अभिलाषा रखते थे और उन्होंने इस सम्बन्ध में प्रयत्न भी किये। इसके अतिरिक्त बहुत से नरेश प्रजातन्त्रात्मक शासन पद्धति के भी विपरीत थे, क्योंकि उनके अधिकार सीमित होते थे।

3. संविधान निर्माताओं के सामने एक गम्भीर साम्प्रदायिकता थी। सन् 1946 तक यह अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी। पाकिस्तान के निर्माण से भी साम्प्रदायिकता की समस्या हल नहीं हुई है। संविधान निर्माताओं के सामने पृथक् चुनाव प्रणाली (Separate Electorate) जैसी बाते थीं जिनको समाप्त करना था, वह सभी जातियों व वर्गों की सहमति से।

4. अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों, कबायली जातियों के हितों की रक्षा-व्यवस्था भी एक समस्या थी।

5. संघ व इकाइयों के लिए एक ही संविधान बनाना था।

6. देश की राष्ट्रीय भाषा व प्रादेशिक भाषाओं का भी जटिल प्रश्न था।

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आलोचना (Criticism)

संविधान सभा के संगठन तथा कार्य-करण के सम्बन्ध में कुछ मुख्य आलोचनाएँ इस प्रकार हैं

  1. संविधान सभा का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था। अतः इसे सच्ची प्रतिनिधिक सभा नहीं कहा गया है।
  2. सभा में कांग्रेस दल का एकाधिकार था।
  3. संविधान निर्माण के कार्य को शुरू से ही कानूनी सुझाव दिया गया। अत: कानून वेत्ताओं का इसके निर्माण में प्रमुख हाथ रहा था। प्रत्येक संशोधन पर पूर्णतया विचार न हो सका।
  4. केवल नेहरू, पटेल, अम्बेडकर आदि कुछ प्रमुख व्यक्तियों का इसके निर्माण में मुख्य हाथ रहा।

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