सन्त थॉमस एक्वीनास के समन्वयवाद की व्याख्या कीजिए।

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थॉमस एक्वीनास के समन्वयवाद – सन्त थॉमस ने युनानी राजनीतिक चिन्तन और ईसाई धर्म की मौलिक मान्यताओं में समन्वय स्थापित करने का सफल प्रयास किया। अरस्तू आदि यूनानी चिन्तक दर्शन और ज्ञान का साधन विवेक तथा बुद्धि को मानते थे सन्त थॉमस इसे स्वीकार करते हुए इससे आगे बढ़ता है। और अपनी मान्यता प्रतिपादित करता है कि बुद्धि द्वारा प्राकृतिक विषयों के सम्बन्ध में उपलब्ध होने वाला ज्ञान सम्पूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

इससे भी ऊपर एक और ज्ञान है जो हमें धर्मशास्त्र की सहायता से अन्तर्दृष्टि और श्रद्धा के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है। उसका कथन है कि दर्शन और धर्म में बुद्धि और विश्वास में, विवेक और श्रद्धा में आपस में कोई विरोध नहीं हैं। सेवाइन के कथनानुसार, “विज्ञान और दर्शन जिस पद्धति को प्रारम्भ करते हैं, धर्मशास्त्र उसे पूर्ण करता है। श्रद्धा विवेक की पूर्णता है। ये दोनों मिलकर ज्ञान के मन्दिर का निर्माण करते हैं किन्तु कहीं भी वे एक-दूसरे से नहीं टकराते, एक-दूसरे के विरूद्ध कार्य नहीं करते।”

सिसरो की रचनाओं का वर्णन कीजिए।

सन्त थॉमस अरस्तू की बातों को सत्य मानते हुए भी उन्हें अन्तिम सत्य नहीं मानता। उसकी मान्यता थी कि ईसाई धर्म द्वारा प्रदत्त सत्य ज्ञान की पूर्णता प्रदान करने वाला है। उसके अनुसार ईसाई धर्मशास्त्र सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास की पराकाष्ठा का प्रतीक हैं। वह सम्पूर्ण मानव ज्ञान को पिरामिडाकार मानता था जिसका आधार विभिन्न ज्ञान-विज्ञानों से मिलकर बना है तथा जिसके शीर्ष पर दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र है। इस प्रकार एक्वीनास से यूनान को बुद्धिजीवी विचारधारा का अन्तर्ज्ञान और श्रद्धा पर बल देने वाली ईसाई विचारधारा के साथ समन्वय किया।

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