संस्कृतिकरण की व्याख्या कीजिए।

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संस्कृतिकरण – इस अवधारणा का प्रतिपादन सर्वप्रथम भारतीय समाजशास्त्रीय प्रो० एम० एम० श्रीनिवास ने किया था। “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई नीच हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विजजाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन पद्धति को परिवर्तित करते हैं।”

संस्कृतिकरण की विशद् व्याख्या करते हुए श्रीनिवास लिखते हैं कि “संस्कृति का अर्थ केवल नए रिवाजों एवं आदतों को ग्रहण करना नहीं, अपितु नए विचारों तथा मूल्यों को अभिव्यक्त करना भी हैं। पाप-पुण्य, माया, संसार एवं मोक्ष सामान्य संस्कृति धार्मिक विचारों के उदाहरण है और जब कोई समाज संस्कृत बन जाता है तो यह शब्द उनकी दैनिक प्रक्रिया में प्रायः दृष्टिगोचर होने लगते हैं।”

डॉ० एम० एन० श्रीनिवास के अनुसार सामान्य रूप से संस्कृतिकरण एक जाति को जातीय स्तरीकरण में उच्चपद प्राप्त करने के योग्य बनाता है इस प्रक्रिया के अन्तर्गत केवल मात्र ऊँची जातियों के रीति-रिवाज तथा आदतों की ही नहीं बल्कि उनके विचारों आदर्श मूल्यों को भी ग्रहण करना सम्मिलित है। वंश-समूह के क्षेत्र में यह संस्कृतिकरण वंश के महत्त्व पर बल देता है तथा इसीलिए उच्च वंश के साथ समरूपता स्थापित करना भी इस प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है। इस प्रक्रिया को बहुधा निम्न जातियों अथवा जनजातियों को ऊपर की ओर गतिशीलता के रूप में देखा जाता है जिसके फलस्वरूप जातीय या सामाजिक व्यवस्था में स्थिति सम्बन्धी या पद मूलक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं।

शोध या अनुसंधान प्रारूप का अर्थ परिभाषा एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।

संस्कृतिकरण की इस प्रक्रिया में जाति विशेष को “आदर्श” मान लिया जाता है और निम्न जाति या जनजाति उसे आदर्श मान कर उस आदर्श जाति के रीति-रिवाज, प्रथा, परम्परा, कर्मकाण्ड, विचारधारा जीवन शैली को अपनाने का प्रयत्न करता है। | बहुधा ये आदर्श जातियाँ द्विजनजातिया जैसे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होते हैं। जिनका की यज्ञोपवित संस्कार होता है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में एक स्थानीय स्वरूप भी होता है। ब्राह्मणों की तुलना में क्षत्रिय वैश्य एवं शुद्रों की संस्कृति में स्थानीय सांस्कृतिक तत्त्व अधिक देखने को मिलते हैं। इसीलिए देश के विभिन्न भागों में क्षत्रिय या वैश्य होने का दावा करने वाली जातियों में परस्पर गहरी मित्रताएँ मौजूद हैं। यह बस शुद्रों के विषय में और भी स्पष्ट रूप से लागू होती है। इसलिए शुद्रों में कुछ उपजातियों की जीवन पद्धति का संस्कृतिकरण स्थानीय स्वरूप के अनुसार हुआ है। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में प्रमुख जाति की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।

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