संघर्ष का सिद्धान्त (डेहरनडार्फ) की व्याख्या कीजिए।

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संघर्ष का सिद्धान्त – डेहरेनडॉर्फ की मान्यता है कि संघर्ष का बीज प्रत्येक सामाजिक संरचना में सन्निहित होता है एवं समाज का प्रत्येक भाग निरन्तर परिवर्तित हो रहा है। सामाजिक संरचना में परिवर्तन वर्गों के बीच होने वाले संघर्षो के फलस्वरूप होते हैं। डेहरेनडार्फ के अनुसार- “संरचना में होने वाले परिवर्तन के विभिन्न ढंग वर्ग संघर्ष के विभिन्न ढंगों के साथ बदलते रहते हैं। वर्ग संघर्ष जितना तीव्र होगा उतना ही तीव्र परिवर्तन घटित होगा।

वर्ग संघर्ष जितना अधिक हिंसात्मक होगा संरचना में उसके परिणामस्वरूप परिवर्तन में उतने आकस्मिक होंगे। सत्ता परिवर्तन में गदैव ही शासक और शासित के सम्बन्ध निहित होते हैं यह सत्ता संरचना अधिकार तथा कर्तव्यों को परिभाषित करती है, दण्डों को निर्धारित करती है तथा अनुरूपता को लागू करती है। डेहरेनडॉर्फ के शब्दों में “जहाँ कहीं भी सत्ता सम्बन्ध होते हैं। वहीं शासक वर्ग से सामाजिक तौर पर यह आशा की जाती है कि वह शासित वर्ग के व्यवहारों को आदेशों तथा मांगों चेतावनी तथा निषेधों द्वारा नियंत्रित करें।”

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वास्तव में संघर्ष की शुरुआत वहीं से होती है जहाँ इसका दुरुपयोग होता है। डेहरेनडार्फ का मत है कि सत्ता संरचना में सत्ता का सदैव असमान बटवारा होता है जिसके पास अधिक सत्ता होती है वह प्रभुत्त्व सम्पन्न व शासक बन बैठते हैं जबकि सत्ताहीन या कम सत्ता वाले मातहत की स्थिति में होते हैं। प्रभुत्त्व सम्बन्ध कुछ लोगों को वैज्ञानिक अधिकार प्राप्त होता है कि वे अपने अधीनस्थ लोगों पर शासन करें और उन पर नियंत्रण रखे। सत्ता के इस प्रकार के बटवारे से समाज में स्वतः ही दो विरोधी समूहों का जन्म प्रधानता और अधीनता की दो स्थितियों के अनुरूप होता है एक तो थे जो आदेश देते हैं दूसरे वे जो आदेशों का पालन करते हैं इन दोनों में संघर्ष की सम्भावना सदा बनी रहती है।

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