समाज सुधारक : राजा राममोहन राय का जीवन परिचय (निबंध)

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प्रस्तावना – भारतवर्ष में प्राचीनकाल से ही अनेक धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएँ ऐसी चली रही हैं, जिनका भारतीयों के जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। इन मान्यताओं में कुछ ऐसी है जिनसे हमारी संस्कृति तथा सभ्यता का उज्ज्वल पक्ष प्रदर्शित होता है तथा जिनको मानने से किसी की भी क्षति नहीं होती, किन्तु कुछ ऐसी भी मान्यताएँ है, जो कुरीतियाँ बनकर हमारे समाज को डस रही है। अंधविश्वास, बाल-विवाह, विधवा-विवाह निषेध, सती प्रथा जैसी अनेक कुरीतियों से अभिशप्त भारतीय जनमानस को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले महापुरुषों में राजा राममोहन राय का नाम अग्रणी है।

जन्म परिचय एवं शिक्षा

भारतीय विभूतियों के दैदीप्यमान नक्षत्रों में से एक राजा राम मोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान जिलान्तर्गत ‘राधा नगर’ गाँव में 22 मई, 1774 को एक रुढ़िवादी बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आपके पिताश्री का नाम रमाकान्त राय तथा माताश्री का नाम तारिनी मुखर्जी था। आपके पिता भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे वहीं आपकी माँ भी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी।

प्रारम्भिक शिक्षा के रूप में आपने संस्कृत तथा बंगाली की शिक्षा प्राप्त की एवं 12 वर्ष की आयु में आप फारसी तथा अरवी की सेवा में 14 वर्षों तक लगे रहे। इसी बीच आपने अंग्रेजी भाषा भी सीख ली तथा ईसाई धर्म ग्रन्थों के अध्ययन हेतु ग्रीक, लेटिन तथा ‘हिब्रु’ भाषा भी सीखी।

सन् 1803 ई. मेंराजा राममोहन राय को ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ में नौकरी मिल गई। आपने जैन धर्म, ईसाई धर्म तथा बौद्ध धर्म का गहनता से अध्ययन किया। ईसाई मिशनरियों ने आपको कई बार ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया किन्तु आपने बिनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। राजा राममोहनराय ईस्ट इंडिया कम्पनी से त्यागपत्र देकर 1815 में कलकत्ता लीट आए। उनके नाम के साथ प्रयुक्त शब्द ‘राजा’ वंशानुगत न होकर बहुआयामी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व से अर्जित उपाधि था, जिसे इंग्लैण्ड जाते समय मुगल सम्राट ने प्रदान किया था। ब्राह्माडम्बर, पारस्परिक वैमनस्यता, अस्पृश्यता, गुलामी, सामाजिक व धार्मिक कुप्रथाओं की भयानक काली कोठरी में जागरण दीप प्रज्वलित कर उस तम को भगाने एवं भारत को एक नवयुग के पथ पर अग्रसर करने हेतु प्रयत्नशील आप प्रथम महापुरुष थे। नन्दलाल चटर्जी ने आपके विषय में ठीक ही कहा है, “राजा राममोहनराय प्रतिक्रिया तथा प्रगति के मध्य बिन्दु थे। वस्तुतः वे भारतीय पुनर्जागरण के प्रभात तारा थे।”

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राममोहनराय : महान समाज सुधारक

राजा राजा राममोहन राय एक अत्यन्त भावुक हृदय के स्वामी थे तथा हिन्दू समाज में फैली कुरीतियों से बहुत व्यथित थे। आपने बचपन में अपनी भाभी को आपके भाई की चिता के साथ जलते हुए देखा था, इसी कारण आप ‘सती प्रथा’ के कट्टर विरोधी बन गये थे।

प्राचीन काल में पत्नी अपने पति की चिता के साथ स्वेच्छा से जलती थी क्योंकि वह जानती थी कि विधवा बनकर हिन्दू समाज में जीना कितना मुश्किल है। विधवा को न अच्छा खाने का अधिकार था न अच्छा पहनने का। उसे तो कलंकिनी तथा अशुभ माना जाता था। परन्तु बाद में न चाहते हुए भी स्त्रियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध उनके पति की चिता के साथ ही जबरदती जला दिया जाता था। यही ‘सती प्रथा’ थी। राजा राममोहनराय जैसे युग प्रवर्तक तथा समाज सुधारक ने इस प्रथा को समाप्त करने का बीड़ा उठाया तथा साथ ही अन्य सामाजिक सुधारों को लाने के लिए भी भरपूर प्रयास किए। इन्हीं सब कार्यों के लिए आपने 1828 ई. में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समस्त सामाजिक बुराईयों को दूर करना तथा लोगों में कुरीतियों के प्रति चेतना तथा जागरुकता लाना था।

कोई भी परिवर्तन आसानी से नहीं आ जाता, अपितु इसके विरोध में कई आवाजें उठती हैं। जब राजा राममोहनराय ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई तो आपको कट्टरवादी हिन्दुओं के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा। उन लोगों का मत था कि ‘सती प्रथा’ तो सदियों से चली आ रही ऐसी प्रथा है जो हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग है, जिसे समाप्त करना असंभव है। किन्तु युगपुरुष राममोहनराय ने किसी के भी विरोध की चिन्ता नहीं की तथा सती प्रथा के विरुद्ध अपनी आवाज को दबाने के स्थान पर उसे और तीव्र कर दिया। कुछ रूढ़िवादियों ने तो आपकी हत्या करने का भी प्रयास किया, किन्तु इन सब घटनाओं से आपका मनोबल टूटा नहीं। राममोहनराय जानते थे कि बिना सरकारी शक्ति के हस्तक्षेप के इस बुराई को पूर्णरूपेण समाप्त नहीं किया जा सकता इसीलिए आपने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियन बेंटिक को इस अमानवीय प्रथा से अवगत कराया और इसे कानूनन बन्द कराने का आग्रह किया।

परिणामस्वरूप ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सन् 1829 ई. में अपने पूरे शासन क्षेत्र में सती प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त करने का ऐलान कर दिया। जो व्यक्ति किसी को भी सती होने पर विवश करेगा, वह अपराधी माना जाएगा तथा उन्हें न्यायालय द्वारा दण्डित करने की भी घोषणा कर दी गयी। इस प्रकार राजा जी के अथक प्रयासों के फलस्वरूप सती प्रथा का पूर्णतः अन्त हो गया तथा समाज इस प्राणघातक प्रथा से सदा के लिए मुक्त हो गया।

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महान देश भक्त

राजा जी एक महान देशभक्त थे, जिनकी रगों में देशभक्ति की पवित्र धारा सदा प्रवाहित रहती थी। निर्धनों तथा अशिक्षितों की जर्जर दशा देखकर वह दयार्द्र हो उठते थे तथा उनके हृदय सागर में कल्याणार्य संकल्प की लहरें हिलोरे मारने लगती थी। इसी भावना के वशीभूत आपने 1830 में माफी की भूमि तथा दान स्वरूप दी गई भूमि को पुनः हड़प लेने के विरोध में आन्दोलन चलाया। वे पवित्र हृदय से भारतवासियों की सर्वतोन्मुखी स्वतन्त्रता एवं भलाई के पक्षधर थे। उनमें राजनैतिक जागरण लाने के लिए ही उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ तथा ‘मिशन उल अखबार’ का सम्पादन किया तथा प्रशासन में सुधार लाने के लिए आन्दोलन चलाया।

राजा राममोहन राय एक महान शिक्षा शास्त्री भी थे। वे भारत के विकास के लिए पाश्चात्य शिक्षा तथा अंग्रेजी को आवश्यक मानते थे। परन्तु उन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य व भाषा से भी पूर्ण लगाव था जिसका परिचायक ‘सम्वाद कौमुदी’ का सम्पादन है। 1825 ई. में कलकत्ता में आपने हिन्दू कॉलेज की स्थापना भी की जो इसी का परिचायक था।

उपसंहार

आज से लगभग 190 वर्ष पूर्व राजा राममोहनराय ने एक ऐसी संस्था की कल्पना की थी, जिसके माध्यम से विभिन्न देश अपने आपसी व अन्तर्राष्ट्रीय मसलों को सुलझा सकें। उन्हीं की सोच बाद में ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना द्वारा पूर्ण हुई। 27 सितम्बर, 1833 को इंग्लैण्ड के ‘ब्रिस्टल’ शहर में आपकी मृत्यु हो गई। जिस स्थान पर आपकी मृत्यु हुई वहाँ पर एक स्मारक बनाया गया तथा एक पत्थर भी लगाया गया, जिस पर आपके बारे में महत्त्वपूर्ण बातें लिखी थी। सन् 1997 में उसी स्थान पर आपकी मूर्ति भी स्थापित की गई।

निसन्देह राजा राममोहनराव भारत में नव जागरण के अग्रदूत थे। यद्यपि आज वे दैहिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं फिर भी उनका स्मृति दीपक आज भी हमारे हृदय में प्रज्वलित हो रहा है। मैकनिकोल ने ठीक ही लिखा है- “राममोहनराय एक नए युग के प्रवर्तक थे और उन्होंने समाज सुधार की जो ज्योति जलाई, वह आज भी अनवरत जल रही है।”

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