समाज की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।

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समाज की उत्पत्ति के सामाजिक समझौते सिद्धान्त-राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सामाजिक समझौता सिद्धान्त बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। 17वीं और 18वीं सदी की राजनीतिक विचारधारा में तो इस सिद्धान्त का पूर्ण प्राधान्य था। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य दैवीय न होकर एक मानवीय संस्था है, जिसका निर्माण व्यक्तियों द्वारा पारस्परिक समझौते के आधार पर किया गया। है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक मानव इतिहास को दो भागों में बाँटते हैं (1) प्राकृतिक अवस्था का काल, तथा (2) नागरिक जीवन के प्रारम्भ के बाद का काल ।

सिद्धान्त का विकास

समझौता सिद्धान्त राजनीतिक दर्शन की तरह ही पुराना है। तथा इसे पूर्व और पश्चिम दोनों ही क्षेत्रों से समर्थन प्राप्त हुआ है। महाभारत के ‘शान्ति पर्व’ में इस बात का वर्णन मिलता है कि पहले राज्य न था, उसके स्थान पर अराजकता थी। ऐसी स्थिति में तंग आकर मनुष्यों ने परस्पर समझौता किया और मनु को अपना शासक स्वीकार किया। आचार्य कौटिल्य ने भी अपने ‘अर्थशास्त्र‘ में इस मत को अपनाया है कि राज्य ने राजा को चुना और राजा ने प्रजा की सुरक्षा का वचन दिया।

यूनान में सबसे पहले सोफिस्ट वर्ग ने इस विचार का प्रतिपादन किया। उनका मत था कि राज्य एक कृत्रिम संस्था और एक समझौते का फल है। इपीक्यूरियन विचारधारा वाले वर्ग ने इसका समर्थन किया और रोमन विचारकों ने भी इस बात पर बल दिया कि “जनता राजसत्ता का अन्तिम स्रोत है।” मध्युग में भी यह विचार काफी महत्वपूर्ण था और मैनगोल्ड तथा थॉमस एक्वीनास के द्वारा इसका समर्थन किया गया।

16वीं और 17वीं सदी में यह विचार बहुत अधिक लोकप्रिय हो गया और लगभग सभी विचारक इसे मानने लगे। रिचार्ड हूकर ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक रूप में समझौते की तर्कपूर्ण व्याख्या की और डच न्यायाधीश ग्रोशियश पूफेण्डोर्फ तथा स्पिनोजा ने इसका पोषण किया, किन्तु इस सिद्धान्त का वैज्ञानिक और विधिवत रूप में प्रतिपादन हॉब्स, लॉक और रूसो द्वारा किया गया, जिन्हें ‘संविदावादी विचारक’ कहा जाता है।

थॉमस हॉब्स (1588-1679)

थॉमस हाब्स का विश्वास था कि शक्तिशाली राजतन्त्र के बिना देश में शान्ति और व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती। अपने इस विचार का प्रतिपादन करने के लिए उसने 1651 में प्रकाशित पुस्तक ‘लेवायथन’ में समझौता सिद्धान्त का आश्रय लिया। इस सिद्धान्त के अनुसार मानव स्वभाव स्वार्थी, अहंकारी और आत्माभिमानी है, जो सदैव शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। प्राकृतिक अवस्था ‘ शक्ति ही सत्य है’ पर आधारित थी अतः मानव जीवन में असुरक्षा और भय व्याप्त था जिसके अन्त हेतु समझौता किया गया।

हॉब्स के मतानुसार यह समझौता प्रत्येक व्यक्ति ने शेष व्यक्ति समूह से किया, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक दूसरे व्यक्ति से कहता है कि “मैं इस व्यक्ति अथवा सभा को अपने अधिकार और शक्ति का समर्पण करता हूँ जिससे कि वह हम पर शासन करे, परन्तु इसी शर्त पर कि आप भी अपने अधिकार और शक्ति का समर्पण इसे इसी रूप में करें और इनकी आज्ञाओं को मानें।”

इस प्रकार सभी व्यक्तियों ने एक व्यक्ति अथवा सभी के प्रति अपने अधिकारों का पूर्ण समर्पण कर दिया और यह शक्ति या सत्ता उस क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ता बन गयी। यही राज्य का श्रीगणेश है। इस समझौते के अन्तर्गत शासक कोई पक्ष नहीं है और यह समझौता सामाजिक है, राजनीतिक नहीं। यह सत्ता इस समझौते का परिणाम है और इस प्रकार उसका पद समझौते से कही अधिक उच्च है। राजसत्ता पूर्ण, निरंकुश, अटल तथा अखण्ड है।

जॉन लॉक (1632-1704)

जॉन लॉक इंग्लैण्ड का ही एक अन्य दार्शनिक था, जिसने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन 1690 में प्रकाशित पुस्तक Two Treaties on Govern- ment’ में किया है। लॉक ने अपनी पुस्तक में सीमित या वैधानिक राजतन्त्र का प्रतिपादन किया। लॉक के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसमें प्रेम, सहानुभूति, सहयोग एवं दया की भावनाएँ विद्यमान थीं। मानव स्वभाव की इस सामाजिकता के कारण प्राकृतिक अवस्था संघर्ष की अवस्था नहीं हो सकती थी वरन् यह तो सदिच्छा, सहयोग और सुरक्षा की अवस्था थी। लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था नियमविहीन नहीं थी, वरन् उसके अन्तर्गत यह नियम प्रचलित था-“तुम दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करो जैसा व्यवहार तुम दूसरों से अपने प्रति चाहते हो।” प्राकृतिक अवस्था में मनुष्यों को प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे और प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का आदर करता था। इसमें मुख्य अधिकार जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के थे।

इस आदर्श प्राकृतिक अवस्था में कालान्तर में व्यक्तियों को कुछ ऐसी असुविधाएँ अनुभव हुई कि इन असुविधाओं को दूर करने के लिए व्यक्तियों ने प्राकृतिक अवस्था का त्याग करना उचित समझा। लॉक के अनुसार ये असुविधाएँ निम्नलिखित थी:

  • प्राकृतिक नियमों की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी,
  • इन नियमों की व्याख्या करने के लिए कोई योग्य सभा नहीं थी,
  • इन नियमों को मनवाने के लिए कोई शक्ति नहीं थी।

समझौता- हॉब्स के सिद्धान्त के अन्तर्गत राज्य का निर्माण करने के लिए केवल एक ही समझौता किया गया, परन्तु लॉक के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि दो समझौते किये गये। पहले समझौते द्वारा प्राकृतिक अवस्था का अन्त करके समाज की स्थापना की गयी। इसी समझौते का उद्देश्य व्यक्तियों के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति की रक्षा है। पहले समझौते के बाद शासक और शासित के मध्य एक दूसरा समझौता सम्पन्न हुआ, जिसमें शासित वर्ग के द्वारा शासक को कानून बनाने, उनकी व्यख्या करने और उन्हें लागू करने का अधिकार दिया जाता है, परन्तु शासक की शक्ति पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि उसके द्वारा निर्मित कानून अनिवार्य रूप से प्राकृतिक नियमों के अनुकूल और अनुरूप होंगे तथा वे जनता के हित में ही होंगे।

जीन जेक्स रूसो (1712-1767)

रूसो ने अपने सामाजिक समझौता सिद्धान्त का प्रतिपादन 1762 में प्रकाशित पुस्तक ‘The Social Contract’ में किया है। हॉब्स और लॉक के समान रूसो के द्वारा इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किसी विशेष उद्देश्य से नही किया गया था, लेकिन, रूसो ने जिस प्रकार से अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है उससे वह प्रजातन्त्र का अग्रदूत बन जाता है।

रूसो अपनी पुस्तक ‘सामाजिक समझौता’ में लिखता है, “मनुष्य स्वतन्त्र पैदा होता है, किन्तु वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है।” इस वाक्य से रूसो इस तथ्य का प्रतिपादन करता है कि “मनुष्य मौलिक रूप से अच्छा है और सामाजिक बुराइयाँ ही मानवीय अच्छाई में बाधक बनती है।” प्राकृतिक अवस्था के व्यक्ति के लिए रूसो ‘आदर्श बर्बर’ शब्द का प्रयोग करता है। यह आदर्श बर्बर अपने में ही इतना सन्तुष्ट था कि न तो उसे किसी साथी की आवश्यकता थी और न किसी का अहित करने की उसकी इच्छा थी। इस प्रकार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति एक भोले और अज्ञानी बालक की भाँति सादगी और परमसुख का जीवन व्यतीत करता था। इस प्रकार प्राकृतिक अवस्था पूर्ण स्वतन्त्रता एवं समानता और पवित्र तथा कपट रहित जीवन की अवस्था थी. परन्तु इस प्राकृतिक अवस्था में विवेक का नितान्त अभाव था।

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समझौते के कारण

प्राकृतिक अवस्था आदर्श अवस्था थी, लेकिन कुछ समय बाद ऐसे कारण उत्पन्न हुए जिन्होंने इस अवस्था को दूषित कर दिया। कृषि के आविष्कार के कारण भूमि पर स्थायी अधिकार और इसके परिणामस्वरूप सम्पत्ति तथा मेरे तेरे की भावना का विकास हुआ। जब प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक भूमि पर अधिकार करने की इच्छा करने की इच्छा करने लगा, तो शान्तिमय जीवन नष्ट हो गया और समाज की लगभग वही दशा हुई जो हॉब्स की प्राकृतिक दशा में थी। रूसो सम्पत्ति को समाज की स्थापना के लिए उत्तरदायी मानता है। प्राकृतिक दशा का आदर्श रूप नष्ट होकर युद्ध, संघर्ष और विनाश का वातावरण उपस्थित हो गया। युद्ध और संघर्ष के वातावरण का अन्त करने के लिए व्यक्तियों ने पारस्परिक समझौते द्वारा समाज की स्थापना का निश्चय किया।

रूसो के शब्दों में, समझौते के अन्तर्गत ‘प्रत्येक अपने व्यक्तित्व और अपनी पूर्ण शक्ति को सामान्य प्रयोग के लिए, सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशक के अधीन समर्पित कर देता है तथा एक समूह के रूप में अपने व्यक्तित्व तथा अपनी पूर्ण शक्ति को प्राप्त कर लेता है।”

इस प्रकार रूसो के समझौते द्वारा उस लोकतन्त्रीय समाज की स्थापना होती है जिसके अन्तर्गत सम्प्रभुता सम्पूर्ण समाज में निहित होती है और यदि सरकार सामान्य इच्छा के विरुद्ध शासन करती है तो जनता की ऐसी सरकार को पदच्युत करने का अधिकार प्राप्त होता है।

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