सल्तनत काल के सैन्य संगठन की विस्तृत विवेचना कीजिए।

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सल्तनत काल के सैन्य संगठन – सल्तनत कालीन सुल्तानों की शक्ति का आधार उनकी सेना थी उनकी सेनायें सल्तनत की स्थापना के पूर्व विद्यमान भारतीय नरेशों की सेनाओं से कई मामलों में भिन्न थी। जहाँ भारतीय नरेशों की सेनाओं में पैदल सेना एवं हस्थी सेना को महत्व दिया जाता था, वहीं सुल्तानों की सेना में अश्वारोहियों का ही बोल-बाला था। भारतीय नरेशों की सेनाओं में अनुशासन हीनता देखने को मिलती है। जबकि सुल्तानों की सेनाओं ये चीजें कम देखने को मिलती है। वास्तव में इन सुल्तानों में साम्राज्य विस्तार में अश्वारोही सेनाओं की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। सल्तनत काल में सैन्य व्यवस्था में विभिन्न सुल्तानों के समय में नये-नये प्रयोग किये गये।

सेना सुल्तान की शक्ति का प्रमुख स्रोत ही नहीं गरन उसके साम्राज्य का आधार स्तम्भ भी बिना कुशल सेना के न तो अविजित प्रदेश को विजित कर साम्राज्य की सीमा में विस्तार हो सकता था और न ही आन्तरिक विद्रोहों का दमन करके साम्राज्य की रक्षा की जा सकती थी, क्योंकि साम्राज्य को आन्तरिक विद्रोहियों से उतना ही भय रहता था जितना की बाह्य आक्रमण से। सल्तनत काल में बाहय आक्रमणों खास तौर पर मंगोलों का भय होने से सेना की भूमिका बहुत बढ़ गई थी। वास्तव में यदि यह कहा जाय कि सब कुछ सेना पर ही आधारित था और सल्तनत कालीन प्रशासन सैन्य तन्त्र था तो इसमें कोई अतिश्योक्ति न होगी। चाहे राजकीय आदेशों को लागू करना हो या उत्तराधिकार का मसला तय करना हो, राजस्व की वसूली हो या शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखना सेना की भूमिका सर्वव्यापक थी सल्तनत कालीन सैन्य तन्त्र का प्रधान सुल्तान ही होता था अर्थात वही प्रमुख सेना नायक होते थे। वे अपनी सेना पर अधिक से अधिक ध्यान देते थे। उनकी सेना विशाल होती थी और उसमें देशी और विदेशी सैनिक होते थे।

सेना के संगठन एवं प्रशासन के लिए एक पृथक मन्त्रालय होता था जिसे दीवार-ए-आरिज कहा जाता था। इसका अध्यक्ष ‘आरिज-ए-ममालिक कहलाता था। आरिज-ए-ममालिक ही सेना के रखरखाव उसके प्रशिक्षण, उसकी दक्षता और उसके प्रशासन के लिए उत्तरदायी था। उसका मुख्य कार्य सैनिकों को भर्ती करना और उनका वेतन निर्धारित करना था। भर्ती के लिए आने वाले व्यक्तियों की योग्यता, दक्षता शारीरिक शक्ति आदि को देखकर ही उन्हें भर्ती किया जाता था, आरिज-ए-ममालिक वर्ष में कम से कम एक बार सैनिकों, उनके मोड़ों व अस्त्र-शस्त्रों का निरीक्षण करता था। यह सैनिकों की पदोन्नति या पदावनति भी कर सकता था, वेतन का वितरण भी उसी के माध्यम से होता था। अस्तु वेतन में वृद्धि या कटौती यह कर सकता था। सैनिकों को भूमि दिये जाने तथा नगद दिये जाने का अनुमोदन यह करता था। यह युद्ध की तैयारी करता था किसी अभियान के लिए सैनिकों का चयन करना उसका कार्य था।

सुल्तान सेनानायक की नियुक्ति स्वयं करता था। सभी महत्वपूर्ण अभियानों में आरिज-ए- ममालिक स्वयं भाग लेता था। यदि वह नहीं जा सकता था तो अपने नायब को भेज देता था। वही बोझा ढोने वाले जानवरों तथा सैन्य सामानों का प्रबन्ध करता था। युद्धोपरान्त लूट के माल को एकत्र करता था और सेनाध्यक्ष की उपस्थिति में उसे बँटवाता था। उसे कठिन दायित्व निभाना पड़ता था। अतएवं उसकी सहायता के लिए उसके सहायक अधिकारी हुआ करते थे। दीवान-ए- आरिज प्रत्येक सैनिक का हुलिया रखता था। अलाउद्दीन खिलजी ने घोड़ों को दागने की प्रथा जारी की ताकि सभी सैनिक राज्य द्वारा दिये गये घोड़ों का ही प्रयोग करें तथा निरीक्षण के समय दाग लगे घोड़े को ही प्रस्तुत करें, फिरोजशाह तुगलक ने दाग व हुलिया प्रथा को बन्द कर दिया, जिसके कारण उसकी सेना दुर्बल व अनुशासन हीन हो गई। सुल्तान सिकन्दर लोदी ने हुलिया पर बल दिया ताकि सही सैनिक को ही वेतन मिल सके व अन्य लोग धोखाधड़ी न कर सके। सभी महत्वपूर्ण सामरिक स्थानों, साम्राज्य के विभिन्न भागों एवं किलों में पर्याप्त सेना रखी जाती थी।

यदि कहीं विद्रोह हो जाय तो सर्वप्रथम स्थानीय सेना विद्रोह दबाने का प्रयास करती थी। किन्तु यदि वह प्रयास असफल रहता तो निकटवर्ती क्षेत्र से उसकी सहायता करने के लिए सेनायें आती थी। यदि आवश्यकता होती थी तो केन्द्र या राजधानी से सेनायें विद्रोह दबाने के लिए भेज दी जाती थी। राजधानी में सदैव दो प्रकार की सेनायें रहती थी- 1. जिसमें घरेलू दास अंगरक्षक या जानदार, अमीरों के अन्तर्गत कुछ चुने हुये विशेष सैनिक होते थे ये सीधे राजकीय नियन्त्र में होते थे। 2. दिल्ली में विद्यमान से सेना जो मन्त्रियों एवं बड़े बड़े अमीरों की होती थी। इन दोनों ही श्रेणियों से मिलकर सुल्तान की सेना बनती थी जिसे हश्म-ए-कल्ब कहते थे। सल्तनत काल में सेना के कई महत्वपूर्ण अंग होते थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अंग अश्वारोही सेना होती. थी। प्रत्येक अश्वारोही के पास दो तलवारे एवं खंजर, तुर्की कमान व तीर होते थे। इस काल में अरब, तुर्किस्तान, रूस तथा अन्य देशों से घोड़े आयात किये जाते थे। सुल्तान भारत में ही घोड़ों की नस्ल सुधारने में रूचि लिया करते थे। अलाउद्दीन खिलजी के समय दिल्ली व उसके निकटवर्ती प्रदेश से सत्तर हजार घोड़ों को रखने की व्यवस्था थी। सेना का दूसरा महत्वपूर्ण अंग हाथी थे।

दिल्ली के सुल्तान अत्यधिक संख्या में हाथी रखते थे। बलबन का विचार था कि युद्ध में एक हाथी पाँच सौ घुड़सवारों के बराबर होता है। मुहम्मद बिन तुगलक के पास तीन हजार हाथी थे। फिरोज शाह जब बंगाल अभियान पर गया तो उसके पास चार सौ पचहत्तर हाथी थे। हाथियों की व्यवस्था शाहना-ए-फील किया करता था। साधारणतः दो शाहरा, एक दाहिने व दूसरे बायें के लिए होता था। सेना का तीसरा महत्वपूर्ण अंग पदातिका था। ये पैदल सैनिक होते थे जो पायक महाते थे। अधिकांश पायक हिन्दू होते थे शेष भारतीय मुसलमान और दास होते थे। वे भाले और धनुष बाणों से लैस होते थे। तीरंदाजों को धनुक कहा जाता था। सेना की सहायता करने के हेतु बंजारा होते थे जो खाद्यान्न एवं चारे का प्रबन्ध करते थे। इनके अतिरिक्त सेना के साथ लकड़हारे खाई खोदने वाले तथा अन्य व्यक्ति होते थे। सेना का संगठन ‘दशमलव प्रणाली के आधार पर होता था। उसमें सर-ए-खेल के अन्तर्गत दश अश्वारोही, सिपाहसालार के अन्तर्गत सर-ए-खेल, अमीर के अन्तर्गत दस सिपहसालार तथा मलिक के अन्तर्गत दस अमीर व खाने के अन्तर्गत दश मलिक होते थे। खान के अन्तर्गत दस हजार या उससे अधिक सैनिक रहते थे। मलिक के अन्तर्गत एक हजार, अमीर के अन्तर्गत एक सौ और सिपाहसालार के अन्तर्गत उससे भी कम सैनिक होते थे।

मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा राजधानी परिवर्तन के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।

सल्तनत काल के आरम्भ में वेतन के बदले अनुदान में भूमि या गाँव या कुछ क्षेत्र प्रदान किये जाते थे इससे वे अपना भरण-पोषण व सैनिकों का वेतन व रख रखाव किया करते थे। अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों का वेतन 234 टंका प्रतिवर्ष निर्धारित किया। यदि कोई सैनिक एक अतिरिक्त घोड़ा रखता था तो उसे 78 टंका प्रतिवर्ष दिया जाता था। मुहम्मद तुगलक के समय प्रत्येक सैनिक को 500 टंका प्रतिवर्ष दिया जाता था। युद्ध के समय उसे मुफ्त में भोजन व चारा दिया जाता था। सुबह अल अशा के अनुसार एक खान को दो लाख टंका, मलिक को पचास हजार टंका तथा मामूली अधिकारी को 1000 से 10,000 टंका प्रतिवर्ष वेतन मिलता था। सैनिकों को राजकोष से वेतन प्राप्त होता था सल्तनत काल में अधिकांश अमीरों को अक्तायें दी जाती थी। परन्तु साधारण सेना को नकद वेतन दिया जाता था।

सैनिकों की संख्या सल्तनत काल में भी असमान रही। अलाउद्दीन खिलजी के समय चार लाख पचास हजार अश्वारोही थे। मुहम्मद तुगलक के समय यह संख्या नौ लाख हो गई। फिरोजशाह के समय दासों को छोड़कर नब्बे हजार सैनिक थे। इनमें से अनेक सार्वजनिक कार्यों में लगे थे। उसके समय में इससे भी अधिक सैनिक रहे होंगे। जब वह दूसरी बार बंगाल अभियान पर अग्रसर हुआ तो उसके शिविर में अस्सी हजार सैनिक थे। इस काल में जब भी आन्तरिक विद्रोह हुए बाहय आक्रमण हुये अविजित प्रदेशों को विजित किया गया तो केन्द्र को संगठित सेना के कारण ही लक्ष्य प्राप्त हुये सेना में कबायली जातियों व कबीलों जैसा कि खास तौर पर लोदी काल में देखने को आया, के रहते हुये भी सुल्तान का उस पर पूरा नियन्त्रण बना रहा।

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