सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ, परिभाषा एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।

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सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ एवं परिभाषा – सामाजिक स्तरीकरण वह सामाजिक व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत समाज के विभिन्न समूहों को क्रमशः उच्च से निम्न तक की स्थिति, पद या स्थान प्राप्त होते हैं और उसी के अनुसार एक समूह विशेष कुछ विशेषाधिकारों अथवा निर्योग्यताओं का भी हकदार होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सामाजिक स्तरीकरण समाज को विभिन्न उच्च एवं निम्न वर्गों में विभाजित करने की और उसी के अनुसार सामाजिक सरंचना में उनकी स्थिति व भूमिका को निर्धारित करने की एक सामाजिक व्यवस्था है।

रेमण्ड मूरे के अनुसार, “स्तरीकरण उच्चतर एवं निम्नतर सामाजिक इकाइयों में समाज का क्षैतिज विभाजन है।”

डेविस तथा मूरे (Davis and Moore) के शब्दों में, “सामाजिक स्तरीकरण अपेक्षतया कम सामाजिक गतिशीलता की दशा में पूर्व स्थिति को बनाये रखने का एक महत्त्वपूर्ण तरीका है।

आगबर्न तथा निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “स्तरीकरण वह प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति और समूह एक स्थिर स्थिति को क्रमबद्धता में विभाजित किये जाते हैं।

इस प्रकार सामाजिक स्तरीकरण वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत कुछ सामाजिक मूल्यों अथवा नियमों के अनुसार समाज अनेक उच्च एवं निम्न समूहों में विभक्त हो जाता है। यह समूह एक-दूसरे से पूर्णतया पृथक न रहकर कार्यात्मक रूप से एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं तथा अपने-अपने कार्यों द्वारा सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में योगदान देते हैं।

सामाजिक स्तरीकरण की आवश्यकता

किसी भी समाज में सामाजिक स्तरीकरण इसलिए आवश्यक होता है कि विभिन्न कार्यों के सफलतापूर्वक सम्पादन के लिए विभिन्न योग्यतम, बुद्धि एवं प्रशिक्षण वाले व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। समाज विभिन्न कार्यों के महत्व को ध्यान में रखते हुए व्यक्तियों को उनकी योग्यतानुसार अलग-अलग परिस्थितियां प्रदान करता है। प्रत्येक समाज यह चाहता है कि प्रत्येक पद पर ऐसे व्यक्ति आसीन होने चाहिए कि जो पदों के अनुरूप योग्यता रखते हों तथा उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से अपने कर्तव्य का पालन कर सके। समाज में अधिक महत्वपूर्ण समझे जाने वाले पदों के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं विशेष योग्यता की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिए प्रत्येक समाज अधिक पुरस्कार की व्यवस्था करता है तथा समाज व्यक्तियों की क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें विभिन्न पदों पर आरूढ़ कर देता है।

इस प्रकार करने से समाज को योग्य एवं प्रतिभाशाली व्यक्तियों की सेवाओं का पूर्णतया लाभ मिल जाता है तथा समाज विकास के मार्ग की ओर आगे बढ़ता है। समाज व्यक्तियों को आर्थिक प्रोत्साहन मनोरंजनात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रकृति की वस्तुयें और आत्मसम्मान तथा अहम् की सन्तुष्टि प्रदान करने वाले साधन प्रदान करता है। विभिन्न पदों के अनुसार इन पुरस्कारों का असमान वितरण आवश्यक है। इसी प्रकार लोगों को विभिन्न दायित्वों को परिश्रम एवं अध्यवसाय के साथ निभाने की प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सामाजिक स्तरीकरण प्रत्येक समाज में अनिवार्यतः पाया जाता है।

समाज यह विश्वास दिलाता है कि सबसे महत्वपूर्ण पदों पर चेतन रूप से सबसे योग्यतम व्यक्तियों को रखा गया है। व्यक्ति की योग्यता एवं बुद्धि के अनुसार विभिन्नता प्रत्येक समाज की आवश्यक विशेषता है। सभी समाजों में स्तरीकरण अवश्य पाया जाता है।

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सामाजिक स्तरीकरण का प्रस्थिति, मूल्यों और संस्कृति के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव अथवा उच्चता एवं निम्नता के क्रम से ही सामाजिक स्तरीकरण पनपता है। समाज में कौन सा पद या प्रस्थिति कितना महत्वपूर्ण है इसका निर्धारण समाज विशेष के मूल्य करते हैं। एक समय भारतीय समाज के सामाजिक मूल्य, ज्ञान, परम्परा को आगे बढ़ाने और धार्मिक कार्यों के सम्पादन को सबसे अधिक महत्व प्रदान करते थे। यहां पुरोहित एवं विद्वानों की प्रस्थिति को सर्वाधिक उच्च एवं महत्वपूर्ण समझा जाता था। आज सामाजिक मूल्य बदल गये हैं, धनशक्ति एवं सत्ता का महत्व बढ़ गया है। परिणामस्वरूप आज समाज में उन पदों या प्रस्थिति को उच्च माना जाता है जिसके साथ धन एवं सत्ता जुड़ी है। प्रत्येक समाज में किसी न किसी पद को विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी समाज में एक पद को तो दूसरे समाज में दूसरे पद को महत्व दिया जाता है। कारण यह है कि विभिन्न समाजों में सामाजिक मूल्यों सम्बन्धी मित्रताएं पायी जाती हैं। इन सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण ही विभिन्न समाजों में सामाजिक मूल्य अलग-अलग होते हैं। मूल्यों का यही अन्तर ही इस बात का निर्धारण करता है कि किस समाज में किस प्रस्थिति या पद का कितना महत्व है और पद विन्यास के क्रम में उनका क्या स्थान होगा। प्रस्थिति सम्बन्धी उच्चता एवं निम्नता पर ही सामाजिक स्तरीकरण निर्भर होता है।

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