सामाजिक संरचना के स्तर का वर्णन कीजिए।

0
81

सामाजिक संरचना के स्तर जानसन ने सामाजिक संरचना के दो स्तरों-फ्रकार्यात्मक उप-प्रणाली तथा संरचनात्मक उप-प्राणी का उल्लेख किया है।

(1) प्रकार्तम उप

प्रणालियों-प्रत्येक समाज को अपने अस्तित्व के लिए समस्याओं का निवारण या आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है। वे हैं-प्रतिमानों को बनाये रखना एवं तनावों को दूर करना अनुकूलन, उद्देश्य प्राप्ति एकीकरण ऐसा न होने पर वह समाज अपना अस्तित्व एवं विशिष्ट स्वरूप को खो देता है। इनमें से प्रत्येक समस्या के लिए एक प्रकार्यात्मक उप-प्रणाली है, जो समाज के अनुकूलन से सम्बन्धित है। अर्थ-व्यवस्था वस्तुओं एवं सेवाओं को उत्पन्न करती है और समूह एवं समितियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

परिवार रूपी प्रकार्यात्मक उप-प्रणाली समाज में समाजीकरण के द्वारा दिन-प्रतिदिन के तनावों को दूर करने एवं सामाजिक प्रतिमानों को बनाये रखने का कार्य करती है। शिक्षण संस्थाएँ, धार्मिक समूह, मनोरंजन प्रदान करने वाले समूह, अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य संगठन भी समाज में तनावों को दूर करने एवं प्रतिमानों को बनाये रखने में योगदान देते हैं। उद्देश्यों की पूर्ति में सरकार रूपी उपप्रणाली महत्त्वपूर्ण है। सरकार शक्ति के द्वारा समाज के उद्देश्यों की पूर्ति करती है। प्रजातंत्र में दबाव समूह जनमत तैयार करते हैं और संसद के लिए बिलों का मसौदा बनाते हैं और वे भी समाज के उद्देश्यों की पूर्ति में योगदान देते हैं। इस प्रकार राज्यव्यवस्था उद्देश्य प्राप्ति की महत्त्वपूर्ण उप-प्रणाली है।

इन सभी के एकीकरण एवं समन्वय स्थापित करने में वकालत का व्यवसाय, नेता,पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बहुलवाद एवं बहुल संस्कृतिवाद में अन्तर बताइए।

(2) संरचनात्मक उप प्रणालियाँ

समाज की प्रकार्यात्मक उप-प्रणालियाँ अमूर्त होती है, जबकि संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ मूर्त समूहों से बनी हुई होती हैं जैसे-नातेदारी तंत्र-परिवारों, गोत्र और वंश समूहों ससे बना होता है। इसके अतिरिक्त चर्च शिक्षा प्रणाली आदि भी संरचनात्मक उप प्रणालियाँ हैं। संरचनात्मक उप-प्रणालियाँ मूर्त एवं वास्तविक होती हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here