रूस के पीटर महान् की गृहनीति और विदेश नीति का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

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रूस के पीटर महान् – राजवंश के संस्थापक माइकेल के पौत्र पीटर महान को ही वास्तव में आधुनिक रूस का निर्माता कहा जाता है। पीटर का जन्म क्रेमलिन नगर में 30 मई 1672 को हुआ था। बाल्यावस्था में उसे कोई नियमित शिक्षा प्राप्त न हुई, अतः उसे समकालीन साहित्य, व्याकरण, भूगोल और गणित का विशेष ज्ञान नहीं था। 1682 ई. में दस वर्ष की अल्पायु में वह अपने भाई इवान के साथ अपनी बहिन सोफिया के संरक्षण में सिंहासन पर बैठा। सन् 1682 ई. से 1689 ई. तक रूसी शासन की बागडोर उसकी बहिन सोफिया के हाथों में ही रही। 1689 ई. में सोफिया को शासनाधिकार से वंचित किया गया। सन 1696 ई. में इवान की मृत्यु के बाद शासन की सम्पूर्ण बागडोर पीटर के हाथों में आ गयी थी।

जिस समय पीटर का सिंहासनरोहण हुआ, उस समय रूस की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी। यूरोप के साथ उसका सम्पर्क न था और न ही एशिया में कोई स्थान स्पष्ट है कि रूस एक प्रकार से ‘पृथक् देश’ ही था। स्पष्ट है कि इस स्थिति में पीटर महान का सर्वप्रथम उद्देश्य राजा की शक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को समाप्त करना ही था। इसके अतिरिक्त वह यूरोप के प्रगतिशील देशों के साथ अपना सम्पर्क भी स्थापित करना चाहता था। उसका उद्देश्य अन्य उद्देश्य दक्षिण व पश्चिम में रूसी सीमाओं का विस्तार करना भी था। अतः सम्पूर्ण शासनकाल में वह इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा और अन्ततः उसे उसमें सफलता भी प्राप्त हुई।

पीटर महान् की गृह नीति

1. रूस को यूरोपीय राज्य में बदलना

पीटर महान् की गृहनीति का मुख्य उद्देश्य रूस को संपूर्ण तथा विभिन्न क्षेत्रों में विकसित करना था। उसने रूस में वैज्ञानिक प्रगति की अत्यधिक प्रोत्साहन प्रदान किया था। पोलैण्ड और स्वीडेन के पतन के परिणामस्वरूप रूस का पश्चिम में और भी अधिक विकास हुआ था, जिसका समस्त श्रेय रूस के जनक पीटर को ही है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार रूसी प्रशासन का केंद्रीयकरण आवश्यक था। पीटर महत्वाकांक्षी शासक था। उसका लक्ष्य रूस को वैभव प्रदान करना था। लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उसने रूस का यूरोपीयकरण करने का निश्चय किया। वह फ्रांस, इंग्लैण्ड तथा डचों की प्रगति से प्रभावित था। यूरोपीय सभ्यता का प्रसार करने के लिए उसने बाल्टिक सागर व काला सागर के माध्यम से व्यापार मार्ग खोल दिये थे, जिससे रूस के व्यापारिक विकास के साथ ही पश्चिम की संस्कृति भी रूस में विकसित हो सके। उसने स्वयं संपूर्ण यूरोप की यात्रा की थी, जहाँ कहीं भी उसे उन्नति के चरण दृष्टिगत को अपनाया तथा अनुकरण किया। विभिन्न देशों से कुशल कारीगरों को जो विभिन्न कलाओं, स्थानों आदि में सिद्धहस्त थे, अपने साथ रूस ते आया, क्योंकि वह रूस में आधुनिकतम कला के प्रसार को देखना चाहता था।

2. शासन पद्धति में सुधार

पीटर ने स्वीडेन की भाँति रूस के लिए एक नौकरशाही स्थापित की। उसने प्रशासन हेतु एक ‘सीनेट’ भी गठित की, जिसके सदस्यों की नियुक्ति वह स्वयं ही करता था। सीनेट का अधिकार क्षेत्र यद्यपि विस्तृत था, किन्तु वह कानून बनाने की अधिकारिणी नहीं थी। पीटर ने 1715 में ‘कालेजिया’ द्वारा शासन प्रणाली की। ‘कालेजिया’ मंत्रियों के विभागों का कार्य करते थे। प्रत्येक कालेजिया का कार्यक्षेत्र सीमित और निर्धारित था। उसने सम्पूर्ण शासन को प्रान्तों में बाँटा, जिसकी व्यवस्था पीटर द्वारा नियुक्त गवर्नर करते थे। उसने स्थानीय शासन को कोई महत्व नहीं दिया।

3. धार्मिक सुधार-

पीटर ने धार्मिक क्षेत्र में भी सुधार किए थे। धार्मिक क्षेत्र वह प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा का पक्षपाती था। पीटर का पालन-पोषण आर्थोडक्स पद्धति द्वारा हुआ था। परन्तु पीटर का उद्देश्य चर्च को राज्य की निम्नतम् संस्था बनाना था जिसके कारण चर्च एवं राज्य के मध्य संघर्ष का सूत्रपात हो गया था। उसके सुधारों की मुख्य बाधा रूढ़िवादी चर्च ही था। चर्च पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए उसने एक ओर कैथोलिक धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रगट की और दूसरी ओर रूढ़िवादी चर्च पर नियंत्रण किया 1700 ई. में रूसी चर्च के धर्माध्यक्ष की मृत्यु हो गयी, किन्तु पीटर ने उसके स्थान पर कोई धर्माध्यक्ष नियुक्त नहीं किया, अपितु धर्माध्यक्ष के स्थान पर पवित्र नामक धार्मिक समिति की स्थापना की थी। इस समिति का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं पीटर ही था। सभी समिति के सदस्यों की नियुक्ति भी स्वयं पीटर करता था। रूस के चर्च को राज्याधीन बनाना पीटर की बहुत बड़ी सफलता थी।

4. सामाजिक आर्थिक सुधार

पीटर ने 1724-25 में चर्च तथा राज्य की व्यवस्था का पुनर्निर्माण किया था। आर्थिक तथा सामाजिक सुधारों को व्यापक बनाया। देश के विकास की ओर राज्य के अधिकारियों को संलग्न किया। व्यापार को प्रगतिशील बनाने हेतु आधुनिक यातायात साधन अपनाये। समस्त प्रजा पर समान कर पद्धति स्थापित की थी। आर्थिक समृद्धि पाने के लिए व्यापार को विशेष संरक्षण दिया। इसीलिए पीटर की आर्थिक नीति को व्यापारिक नीति कहा जाता है। उसने पच्चीस वर्ष तक लगातार देश के औद्योगीकरण प अत्यधिक ध्यान दिया था एवं विदेशी व्यापार को उच्चता के शिखर पर पहुँचा दिया था।

5. विरोधियों का दमन

पीटर ने गृहनीति के अंतर्गत संपूर्ण रूस में व्यवस्था एवं शान्ति स्थापित की थी, प्रगति के लिए यह आवश्यक था अराजक तत्वों तथा विद्रोहियों का पूर्ण उन्मूलन कर दिया गया। विरोधी तत्वों को क्रूरता से नष्ट कर दिया गया। पीटर स्वेच्छाचारी शासक था अतः उसने बर्बरता का परिचय दिया तथा हजारों की संख्या में अपने विरोधियों को मृत्यु के घाट उतार दिया।

6. स्ट्रेल्सी और बोयरों का दमन

1697 ई. में पीटर ने तुर्कों के विरुद्ध सहायता पाने और पश्चिम यूरोप के साथ धनिष्ठ सम्बन्ध बनाने के उद्देश्यवंश अनेक ईसाई राज्य का भ्रमण किया। रूस में उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसके ‘स्ट्रेल्सी’ नामक अंगरक्षकों ने मास्को में विद्रोह कर दिया। सूचना पाते ही पीटर ने रूस लौटकर उनका दमन कर दिया तथा उनके स्थान पर एक शाही सेना गठित करके इस समस्या से मुक्ति प्राप्त की।

पीटर की निरंकुश शक्ति के विकास में एक अन्य बाधा ‘बोयरो’ अर्थात् सामन्तों की एक सभा ‘ड्यूमा’ थी। इसके सदस्य अत्यन्त रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी थे। सन् 1700 ई. में पीटर ने ड्यूमा’ को समाप्त कर ‘चैसेरी’ की सहायता से शासन करना प्रारम्भ किया।

पीटर महान की विदेश नीति

पीटर महान की दिपेश नीति का प्रमुख उद्देश्य पश्चिमी यूरोप की ओर ‘खुली ‘खिड़की’ अर्थात् अधिकाधिक समुद्र तक क्षेत्र प्राप्त करना था। वह किसी ऐसे बन्दरगाह पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता था जो पूरे वर्ष व्यापार के काम आ सके, क्योंकि रूस का समुद्र तट बर्फ से ढँका रहता था। काले सागर, बाल्टिक सागर पर प्रभुत्व स्थापित करना उसका लक्ष्य बन गया था, जो जहाजरानी के लिए वर्ष भर उपयुक्त थे। काले सागर पर आधिपत्य प्राप्त करने का अर्थ था, तुर्की से युद्ध और बाल्टिक तट पर आधिपत्य प्राप्त करने का अर्थ स्वीडन से युद्ध 1695 में पीटर का तुर्की के साथ युद्ध आरम्भ हुआ और तुर्की से एजोव बन्दरगाह प्राप्त करने में सफल हो गया। 1709 ई. में पीटर ने, जिसने अपनी सेना का नवीनीकरण कर लिया था, स्वीडेन को पराजित किया। ओटावा के युद्ध में पीटर को निर्णायक विजय प्राप्त हुई और रूस का अधिकार इप्रिया, तथा फिनलैण्ड के दक्षिण क्षेत्र पर हो गया।

1703 ई. में पीटर ने अपनी राजधानी का निर्माण आरम्भ किया, जो 1712 ई. में पूर्ण हुई। इसका नाम सेंट पीटर्सबर्ग रखा गया। राजनीति का केन्द्र मास्को ही बना रहा। पीटर ने सम्राट की उपाधि धारण की। इस प्रकार पीटर महान ने रूस को अंतर्राष्ट्रीय गौरव प्रदान किया।

गौरवपूर्ण क्रान्ति के राजनैतिक परिणाम बताइए।

पीटर महान का मूल्यांकन

पीटर महानू के सुधार शीघ्रतापूर्वक बनाये गए नियमों की एक श्रृंखला मात्र थे, किसी नियोजित या समन्वित नीति के परिणाम नहीं। इस कारण भी रूस को यूरोपीय ढंग का एक शक्तिशाली राज्य बनाने में सफल रहे। पीटर महान के सुधारों का प्रभाव एक छोटे से वर्ग पर ही पड़ा, क्योंकि वे प्रायः प्रशासनिक वर्गों तक ही सीमित रहे।

उसके सुधार कुछ अंशों तक सफल और कुछ अंशों तक विफल भी रहे, फिर भी उसके उद्देश्य की महत्ता में कोई भी सन्देह नहीं है। यह सर्वप्रथम रूसी जार था, जिसने रूस का मुंह पश्चिम की ओर मोड़ दिया और रूस में पाश्चात्य सभ्यता का प्रसार किया। उसकी ‘खुली खिड़की’ की नीति भी पूर्णतः युक्तिसंगत थी उसकी साम्राज्यवादी विदेश नीति के कारण ही उसे ‘आधुनिक रूस का जन्मदाता’ कहा जाता है। रूस के सैन्यवादी शासन का निर्माण, रूसी चर्च की स्वतंत्रता और उसकी सत्ता का अन्त, रूसी समाज का कायाकल्प, रूसी रहन-सहन व्यवहार व परम्पराओं का यूरोपीयकरण, सुदृढ़ निरंकुश जारशाही की स्थापना, साम्राज्यवादी विस्तार आदि कार्यों का श्रेय पीटर महान को ही दिया जाता है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि मात्र एक शासक के शासनकाल में केवल एक व्यक्ति के अदम्य साहस कार्यों तथा उत्साह के द्वारा रूस का कायाकल्प हो गया। जहाँ पहले रूस अज्ञात और अर्द्ध-मृत अवस्था में था, अब वह यूरोपीय राज्यों में महत्वपूर्ण स्थान पर आसीन हो गया। इस प्रकार पीटर महान् ने अपने अथक प्रयासों से रूस को यूरोप के प्रथम श्रेणी के राज्यों में ला खड़ा किया। निःसंदेह यह उसका महान कार्य था।

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