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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (N.C.E.R.T.)

इसे राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान भी कहते हैं। तृतीय पंचवर्षीय योजना, 1961-66 के तह स्वायत्तशासी इकाई के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में एक केन्द्रीय अभिकरण को स्थापित करने के लिए गठित विचार को मूर्त रूप देने के लिए इस परिषद् की स्थापना सन् 1967 में की गई। इसके चार क्षेत्रीय महाविद्यालय-अजमेर, मैसूर, भुवनेश्वर तथा भोपाल में है। इसका मुख्यालय दिल्ली में है जिसके कोई विभाग है। इसके अन्तर्गत शिक्षा में शोध व प्रक्षण कार्य किया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में यह राष्ट्रीय स्तर का संगठन है। विभिन्न राज्यों में इसके केन्द्र भी स्थापित किये गये हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के तहत् विभिन्न इकाइयाँ कार्य करती हैं। इनमें मनोविज्ञान आधार, विज्ञान शिक्षा, अध्यापक शिक्षा, दार्शनिक आधार, क्षेत्रीय सेवा, शोध पत्रिका तथा शैक्षिक शोध एवं नवाचारिक प्रकोष्ठ, पाठ्य पुस्तक एवं पाठ्यक्रम प्रारम्भिक और प्राथमिक शिक्षा, श्रव्य दृश्य शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा एवं साक्षरता, केन्द्रीय विज्ञान कार्यशाला शैक्षिक सर्वेक्षण इकाई कार्यानुभव एवं व्यावसायिक शिक्षा, परीक्षा एवं मूल्यांकन, निर्देशन व परामर्श, विकलांग शिक्षा केन्द्रीय शैक्षिक तकनीकी संस्थान अनेक विभाग तथा अवयवी इकाइयाँ सक्रिय हैं।

उद्देश्य

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं

  1. शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न स्तरीय शोध कार्यक्रमों का संगठन व क्रियान्वयन करना।
  2. उच्च स्तरीय सेवा पूर्वकालीन एवं सेवाकालीन अध्यापकीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों कासंचालन करना।
  3. अध्यापक, शिक्षा संस्थानों में विस्तार सेवा कार्यक्रमों का प्रबन्धन राज्य सरकारों की सहायता से नवीन शिक्षण विधि एवं तकनीकियों के अनुप्रयोग हेतु करना।
  4. विद्यालयीय स्तर पर पाठ्यक्रमानुसार पाठ्य-पुस्तकों तथा शिक्षा सम्बन्धी शोध पत्रिका व अन्य साहित्यों का प्रकाशन करना।
  5. राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान की स्थापना करते हुए शैक्षिक प्रशासक एवं प्राध्यापकों हेतु उच्च प्रशिक्षण व अनुसंधान के लिए विकासात्मक प्रयत्न करना।
  6. शिक्षण उद्यम में स्तरोन्नयन हेतु प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना करना।
  7. मंत्रालय के साथ ही अन्य इकाइयों को भी निर्देशन एवं परामर्श सेवा प्रदान करना।

कार्य

  1. राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान और क्षेत्रीय महाविद्यालयों का संचालन एवं प्रशासन करना।
  2. सेवारत शिक्षक व पूर्व सेवा शिक्षकों को नेतृत्व प्रदान करना, नवीन परिवर्तन और आयामों से अवगत कराना व प्रशिक्षण देना।
  3. प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा के सुधार हेतु शोध करना और शोध कार्यो को अनुदान देना।
  4. उत्तम प्रकार की अनुदेशन सामग्री का प्रकाशन करना जो प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को निर्देशन प्रदान कर सके और वे इसे उपयोग भी करें।
  5. प्रतिभाशाली छात्रों के चयन करने हेतु परीक्षाएँ करना व उन्हें छात्रवृत्तियाँ देना।
  6. प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं हेतु शोध कार्यों के लिए सहायता देना।

क्षेत्रीय विद्यालय

अध्यापक शिक्षा के विकास में क्षेत्रीय महाविद्यालयों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इन महाविद्यालयों के मुख्य कार्य है

  1. अध्यापक शिक्षा में विशिष्टता व श्रेष्ठता प्राप्त करना।
  2. प्रशिक्षण संस्थानों को प्रचार सेवा प्रदान करना व अपने क्षेत्र व विद्यालयी शिक्षा में सुधार लाना

इस हेतु निम्न कार्यक्रमों का आयोजन परिषद् के द्वारा किया जाता है

  1. राज्य केन्द्रों के द्वारा सेवाकालीन प्रशिक्षण, शैक्षिक नियोजन व प्रशासन के क्षेत्र में आने वाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी देना।
  2. विज्ञान, सामाजिक विज्ञान व अन्य विषयों के शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए उपयुक्त शिक्षण सहायक सामग्रियों (चार्ट, प्रतिरूप, मानचित्र, श्रव्य दृश्य सामग्री) का निर्माण करना।
  3. बेसिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा व साक्षरता कार्यक्रम को अग्रसारित करना ।
  4. विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान आदि के क्षेत्र में विशेषकर पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधि में सुधार हेतु शैक्षिक पाठ्यक्रम, उपकरण, पाठ्य सामग्री का निर्माण करना।
  5. प्रादेशिक शिक्षा संस्थानाधीन ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम व सेवाकालीन कार्यक्रम आयोजित करना।

राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली के माध्यम से भी पाठ्यक्रम, अध्यापक तैयारी, अनुदेशनात्मक सामग्री निर्माण, मूल्यांकन, सेवा विस्तार आदि के क्षेत्र में विविध कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं। राज्य शिक्षा संस्थान के द्वारा भी शैक्षिक गतिविधियों में उचित तालमेल समन्वय, सहयोग आदि को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता है।

शिक्षा पर नवीन राष्ट्रीय नीति के 1986 के निर्माण के बाद परिषद के द्वारा ‘विद्यालयी शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा’ नामक पुस्तक सन् 2000 में तैयार की गई जिसमें 1988 के दस्तावेज का आधुनिकीकरण किया गया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् एक ऐसा अभिकरण है जो अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य और विद्यालयी स्तर पर विशेष रूप से कार्य कर रही है और शिक्षा में स्तरोत्रयन हेतु कटिबद्ध है।

विस्तार एवं प्रकाशन

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के शिक्षण में वृहत् विस्तार कार्यक्रम हैं। इसमें इसके क्षेत्रीय सलाहकार कार्यालय, क्षेत्रीय शिक्षा कॉलेज और राष्ट्रीय शिक्षा आदि के विभाग सम्मिलित हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् कक्षा 1 से 12 तक के विभिन्न विषयों, अध्यापक शिक्षा की पाठ्य-पुस्तकें, कार्य पुस्तकें, मार्ग दर्शिकाएँ, अनुसंधान साहित्य आदि सभी पर प्रकाशन का कार्य

  1. जनरल ऑफ इण्डियन एजूकेशन
  2. इण्डियन एजूकेशनल रिव्यू
  3. The Primary Teacher
  4. School Science
  5. भारतीय आधुनिक शिक्षा
  6. प्राइमरी शिक्षक।

पर्यावरण शिक्षा की प्रकृति बताइये?

इसके अलावा प्रत्येक क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय अपनी-अपनी पत्रिका प्रकाशित करते हैं। परिषद् की कार्यालय पत्रिका राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् न्यूज लैटर व परिषद् की आन्तरिक प्रसार गतिविधियों के लिए शैक्षिक दर्पण प्रकाशित करती है।

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