राधाकृष्णन आयोग (1949) की मुख्य सिफारिशों पर प्रकाश डालिए।

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राधाकृष्णन आयोग (1949) की सिफारिशये –

राधाकृष्णन आयोग (1949) की सिफारिशये – स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात् जब भारतीय शासकों का ध्यान भारत के नव निर्माण की ओर गया, तब यह भी स्वाभाविक था कि भारत में शिक्षा के नव निर्माण की दशा में निश्चित की जाय। 1937 के पश्चात् देश में उच्च शिक्षा का पर्याप्त विकास हुआ परन्तु यह वृद्धि उच्च शिक्षा के आकार में ही थी। सार्जेन्ट योजना में विश्वविद्यालय शिक्षा के अनेक दोषों की ओर हमारा ध्यान दिलाया गया तथा न दोषों को दूर करने के लिए अनेक उपर्युक्त सुझाव भी दिये परन्तु अस्थिर राजनीतिक स्थिति के कारण कोई भी निश्चित कदम नहीं उठाया जा सका। देश को स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात् पुनः शिक्षा विद्वानों ने विश्वविद्यालय शिक्षा प्रचलित दोषों से मुक्त करने तथा उसे देश की नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया। अन्तर्विश्वविद्यालय बोर्ड तथा केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड ने भी तत्कालीन विश्वविद्यालय शिक्षा की स्थिति पर विचार किया और यह प्रस्ताव भी पास किया। भारतीय विश्वविद्यालयों के कार्यों का मार्गदर्शन करने के लिए भारत सरकार इंटर कमीशन के आधार पर एक ऐसे आयोग की नियुक्ति करे जो विश्वविद्यालय शिक्षा पर देश की वर्तमान तथा भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सुधार और विकास के लिए सुझाव है।” इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने नवम्बर 1948 में डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में आयोग की नियुक्ति की।

आयोग के निम्नलिखित पदाधिकारी थे

  1. डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन अध्यक्ष
  2. डॉ० लक्ष्मण स्वामी मुद्रालियर
  3. डॉ० जाकिर हुसैन
  4. डॉ० ताराबन्द
  5. डॉ० मेघनाद शाह
  6. डॉ० आर्थन मोर्गन
  7. डॉ० बहल
  8. डॉ० जेम्स उप
  9. डॉ० जौन टिगर्ट

श्री निर्मल कुमार सिद्धान्त

आयोग के सचिव आयोग ने अगस्त 1949 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की और डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को निम्न बिन्दुओं पर विचार करके संस्तुतियों देने का कार्य सौंपा गया।

  1. भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा तथा अनुसंधान के उद्देश्य ।
  2. विश्वविद्यालयों के वित्त व्यवस्था।
  3. विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम।
  4. विश्वविद्यालयों में प्रवेश के मानक ।
  5. विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम।
  6. विश्वविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा।
  7. उच्च अनुसंधान ।
  8. छात्र अनुशासन के छात्रावास।
  9. अखिल भारतीय स्तर की संस्थाओं की समस्या ।

1.विश्वविद्यालय शिक्षा के उद्देश्य:

आयोग ने उच्च शिक्षा के उद्देश्यों पर विचार करते हुए ऐसे शिक्षित नागरिक तैयार करने पर बल दिया जो विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान कर सके, प्रजातान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करें। सांस्कृतिक धरोहर व मूल्यों को बनाये रखें नैतिक चरित्र उच्च आदर्शों से युक्त हों, राष्ट्रीय एकता व अनुशासन में सहायक हो तथा स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना व भाई-चारे के लिए समर्पित कर सकें।

2. अध्यापक कल्याण :

अध्यापकों के महत्व को स्वीकार करते हुए आयोग ने अध्यापकों के वेतनमान व सेवा शर्तों में सुधार करने तथा उन्हें भविष्य निधि जीवन बीमा पेंशन, व आवास की सुविधायें देने की सिफारिस की ।

३. उच्च शिक्षा का स्तर

उच्च शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने के लिए आयोग ने विश्वविद्यालय कालेजों में छात्रों की संख्या नियन्त्रित करने, विश्वविद्यालयी शिक्षा से पूर्व 12 वर्ष की शिक्षा प्राप्त करने, माध्यमिक शिक्षकों के लिए अभिन्न व पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करने, कम से कम 180 दिन कार्य दिवस रखने प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण करने उत्तीर्ण प्रतिशतांक बढ़ाने का सुझाव दिया।

4. अध्ययन पाठ्यक्रम

विशिष्टी करण की अति को दूर करने के लिए आयोग ने सामान्य शिक्षा के सिद्धान्त को अविलम्ब अपनाने का सुझाव दिया।

5. धार्मिक शिक्षा :

आयोग ने सभी धर्मों की शिक्षा व महापुरुषों के जीवन वृत्तान्तो को पाठ्यक्रम में स्थान देने का सुझाव दिया जिससे छात्रों में सभी धर्मों के प्रति आदर्श उत्पन्न हो सके।

6. ग्रामीण विश्वविद्यालय :

कृषि शिक्षा के विकास के लिए आयोग ने ग्रामीण विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की। आयोग ने कहा कि इनमें भूमि सुधार अभियन्त्रण, जल नियन्त्रण अभियन्त्रण, ग्रामीण उद्योग, ग्राम्य कलायें, ग्राम चिकित्सा, ग्राम्य प्रशासन, ग्राम्य नियोजन जैसे पाठ्यक्रम चलाये जायें।

7. नारी शिक्षा

आयोग ने नारी शिक्षा का विकास करने की सिफारिस की तथा कहा कि लड़कियों के लिए गृह अर्थशास्त्र नर्सिंग व ललितकला जैसे विषयों की शिक्षा व्यवस्था की जानी चाहिए।

8. परीक्षा प्रणाली :

आयोग ने शिक्षा प्रणाली में आमूल्य-चूल परिवर्तन करने तथा वस्तुनिष्ठ परीक्षा का आयोजन करने की महत्वपूर्ण सिफारिश की थी। आयोग ने कहा कि कम से कम 5 वर्ष का अनुभव प्राप्त शिक्षकों को परीक्षक नियुक्त किया जाय तथा प्रथम श्रेणी 70% द्वितीय श्रेणी 55% व तृतीय श्रेणी 40% पर रखने तथा कृपांक प्रणाली बन्द करने का सुझाव दिया।

भारत में विविधता के कारण ?

इसके अतिरिक्त आयोग ने शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में स्नाकोत्तर शिक्षा तथा अनुसंधान के सम्बन्ध में अर्थव्यवस्था में सुधार लाने आदि के बारे में सिफारिश की।

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