भारत में प्रौढ़ शिक्षा के विकास पर एक निबन्ध लिखिए।

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प्रौढ़ शिक्षा के महत्व प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री डॉ. सरयुप्रसाद चौबे के अनुसार- ‘प्रौढ़ शिक्षा को सम्बन्ध सम्पूर्ण व्यक्तित्व की शिक्षा से होना चाहिए। राष्ट्र में स्थापित जनतन्त्र की सफलता के लिए इसका व्यापक प्रचार-प्रसार परमावश्यक है।’ इस क्रम में यह बताया जाना जरूरी है कि साधरणतः प्रौढ़ शिक्षा का सामान्य अर्थ निरक्षर प्रौढ़ों को अनौपचारिक रूप से साक्षर बनाने वाली शिक्षा से है, परन्तु इसका वास्तविक अर्थ तो ‘ऐसी शिक्षा देने से है, जो प्रौढ़ों के जीवन के प्रत्येक पहलू अर्थात् सामाजिक, भौगोलिक पर्यावरणपरक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक नैतिक व स्वास्थ्य-सफाई आदि क्षेत्रों में व्यावहारिक ज्ञान-विज्ञान और क्रियाओं के प्रशिक्षण द्वारा लाभ प्रदान करे। इस अभिमत की पुष्टि अनेक शिक्षा समाजशास्त्रियों- डॉ० रामशकल पाण्डेय, डॉ. कंचनलता सच्चरवाल, डॉ. सागर शर्मा, डॉ. एस. पी. कुलश्रेष्ठ, डॉ० एस० एस. श्रीवास्वत, श्रीमती विमला शर्मा, आदि ने प्रायः की है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने इसे पुनः साक्षरता का संस्कार देने एवं जीवन के विविध क्षेत्रों की आवश्यक. जानकारी देने/देते रहने की कार्य-योजना बनाया है। सारतः प्रौढ़ शिक्षा के नवीन कार्य-क्षेत्र में गरीबी तथा पिछड़ापन उन्मूलन के अन्तर्निहित

भारत में प्रौढ़ शिक्षा के विकास पर एक निबन्ध लिखिए।

उद्देश्य से अभिप्रेरित कार्यात्मक साक्षरता का, उत्पादन कौशलों को बढ़ाने वाला ऐसा आधारभूत शैक्षिक कार्यक्रम सम्मिलित माना जाता है, जिसे कार्यकारी सामुदायिक सहभागिता के जरिए, प्रौढ़ शिक्षा-केन्द्रों से आगे बड़कर, विभिन्न विकास कार्यक्रम आयोजनों में शामिल होने के अवसर प्रदान कर अनौपचारिक वन औपचारिक शिक्षा व्यवस्था द्वारा सफल बनाया जाये। इस शिक्षा योजना में लेखन, पढ़ाई और अंक ज्ञान के लिए शिक्षण की प्राचीन भारतीय मौखिक परम्परा एवं सूचना पद्धतियों का समुचित प्रयोग भी किया जाना चाहिए।

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