प्रौढ़ शिक्षा का महत्त्व पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

0
61

प्रस्तावना – प्रजातन्त्र की मूल भावना इसी बात पर टिकी होती है कि किसी हुए भी राष्ट्र की जनता कितनी पढ़ी-लिखी तथा चेतनाशील है। ये विशेषताएँ एक शिक्षित राष्ट्र में ही प्राप्त की जा सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो के ठीक ही कहा था कि प्रजातन्त्र की सफलता के लिए देशवासियों का सुशिक्षित होना आवश्यक है। किन्तु खेद का विषय है कि अपनी निरक्षरता तथा अज्ञानता के रहते जनता की अदम्य शक्ति भी बौनी साबित हो जाती है। भारतवर्ष तो विश्व का सबसे बड़ा प्रजातान्त्रिक देश है किन्तु यहाँ भी बहुत कम लोग शिक्षित हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में निरक्षरों की संख्या 20 से 25 करोड़ के बीच में है जबकि स्वयंसेवी संस्थाएँ एवं निजी आँकड़ों के अनुसार इनकी संख्या इससे भी अधिक है। इतनी निरक्षता के कारण ही आज हमारा देश भुखमरी, बेरोजगारी, अधिक जनसंख्या, निर्धनता, बाल-विवाह जैसी जटिल समस्याओं का सामना कर रहा है। अतः इस निरक्षरता को दूर करने के उद्देश्य से ही ‘राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा योजना’ का कार्यक्रम तैयार किया गया है तथा इसे लागू करने के लिए अनेक प्रबन्ध किए गए हैं।

प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ

प्रौढ़ शिक्षा से अभिप्राय उन लोगों की शिक्षा से है, जो इस समय प्रौढ़ है। आज 15-16 वर्ष से लेकर 40 वर्ष तक आयु वाले व्यक्तियों को प्रौढ़ माना जाता है। प्रौढ़ शिक्षा का तात्पर्य ऐसे निरक्षर लोगों को शिक्षा प्रदान करना है जो पारिवारिक परिस्थितियों के चलते शिक्षा ग्रहण करने से वंचित रह गए और आज छोटा-मोटा काम करके अपना तथा अपने परिवार का पेट भर हैं। प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य ऐसे निरक्षर नागरिकों को तकनीकी एवं व्यवसायिक ज्ञान देकर नागरिकों को उनके अधिकारों एवं उनके कर्त्तव्यों का बोध कराना भी है।

प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता

प्रौढ़ शिक्षा का महत्त्व वैसे तो हर वर्ग, आयु तथा जाति के व्यक्ति के लिए है किन्तु अत्यधिक निर्धन वर्ग, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों, दलित वर्गों के लिए तो यह एक वरदान के समान है। भारतवर्ष एक विकासशील देश है तथा सबसे बड़ा प्रजातान्त्रिक देश भी भारत ही है। एक साक्षर व्यक्ति ही अपने मताधिकार का समुचित प्रयोग कर सकता है। वह ही सही अर्थों में प्रजातान्त्रिक मूल्यों को समझ सकता है और इसके द्वारा ही प्रजातन्त्र में गैर-प्रजातान्त्रिक और अप्रासंगिक मूल्यों के मिश्रण को रोककर उसका विरोध भी किया जा सकता है। देश की ज्वलन्त समस्याओं जैसे बेरोजगारी, निर्धनता, महँगाई, निम्नजीवन-स्तर, तकनीकी ज्ञान का अभाव आदि का समाधान करने के लिए हर नागरिक का साक्षर होना बेहद आवश्यक है।

प्रौढ़ शिक्षा का जन्म

इस शिक्षा का जन्म तो हमारी स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व ही हो चुका था। इसके पक्ष में अनेक समाज सेवियों, राजनैतिक कार्यकर्त्ताओं ने आवाज बुलन्द की थी, जिसे व्यवहार में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् ही लाया जा सका क्योंकि तब इस कार्य के प्रति प्रतिबद्धता तो थी परन्तु आवश्यक स्रोत उपलब्ध नहीं थे। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तथा डॉ. राममनोहर लोहिया प्रौढ़ शिक्षा के मुख्य पक्षघरों में से थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों का तेजी से प्रचार-प्रसार किया गया। 1949 में केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय ने राज्य मन्त्रियों के एक सम्मेलन में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम की पूर्ण योजना प्रारम्भ की। सन् 1950 में ‘शेक्षणिक कारवाँ योजना’ के अधीन गाँव-गाँव में प्रौढ़ शिक्षा या प्रचार-प्रसार किया गया। 15 दिसम्बर 1969 को एक प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के प्रौढ़ साक्षरता मण्डल की स्थापना की गई तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया गया। पंचवर्षीय योजनाओं में प्रौढ़ कार्यक्रमों को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। 5 अप्रैल, 1977 को भारत सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा सम्बन्धी एक नई नीति की घोषणा की। तत्पश्चात् 2 अक्तूबर 1979 को देश भर में प्रौढ़ शिक्षा का एक विराट कार्यक्रम लागू किया गया। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत देश भर के 15 से 35 वर्ष के प्रौढ़ों को साक्षर बनाकर उन्हें राष्ट्रीय विकास की योजना से जोड़ना था। प्रौढ़ शिक्षा के कार्य को गति प्रदान करने के लिए मई 1988 में भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ की स्थापना की। इसके अन्तर्गत सन् 1990 तक 3 करोड़ निरक्षर प्रौढ़ों को एवं सन् 1995 तक शेष 6 करोड़ प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा गया।

कविवर सूरदास का जीवन परिचाए (निबन्ध)

राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा योजना

राष्ट्रीय वोर्ड की स्थापना प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को गतिशील बनाने के लिए की गई है, जिसके सदस्यों के तौर पर केन्द्रीय मन्त्री व योजना आयोग के अध्यक्ष को चुना गया। इसके अन्तर्गत प्रौद – शिक्षा का पाठ्यक्रम, शिक्षा प्रणाली, शिक्षण केन्द्र आदि बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है। कार्यक्रम के अनुसार प्रौढ़ शिक्षा का पाठ्यक्रम 10 से 12 माह की अवधि में पूरा किया जाएगा। यह शिक्षा पाने के लिए व्यक्ति को कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है और न ही समय की पावन्दी का कोई प्रश्न पैदा होता है। उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था ऐसे समय में आयोजित की गई है कि वे अपना दैनिक कार्य भी कर सके तथा खाली समय का सदुपयोग पढ़-लिखकर कर सकें।

उपसंहार – आज का युग विज्ञान का युग है, जिन्हें जानने समझने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का शिक्षित होना आवश्यक है। एक शिक्षित माता-पिता ही बच्चे की सही परवरिश कर सकते हैं। विशेषकर स्त्री का शिक्षित होना तो और भी जरूरी है। माँ के शिक्षित होने से बच्चों के पालन-पोषण तथा प्रारम्भिक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आज तो नारी शिक्षा केन्द्रों में व्यवसायिक शिक्षा की भी व्यवस्था कर दी गई है। स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ धनार्जन भी कर सकती हैं। इन केन्द्रों में शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाती है, यहाँ तक की पुस्तकें, कॉपी, पेन्सिल आदि भी बिना पैसे दिए उपलब्ध है।

इस अभियान को और भी अधिक कारगर बनाने के लिए प्रशासन के कार्यों में सुदृढ़ता, संचार साधनों का समुचित विकास, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति तथा वित्तीय मामलों का समुचित प्रयोग एवं इनकी पारदर्शिता प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को और भी अधिक सफल बना सकती है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here