प्राच्य पाश्चात्य विवाद क्या था? इसका अन्त कैसे हुआ ?

प्राच्य-पाश्चात्य विवाद- शिक्षा के क्षेत्र में 1813 से 1853 तक का समय प्राच्य एवं पाश्चात्य संस्कृति के महत्व से सम्बन्धित विवाद का था।

प्राच्य शिक्षावादी विचारधारा के समर्थक वारेन हेस्टिंग्ज, एच०टी० प्रिन्सेप, लॉर्ड मिण्टो तथा एच. एच. विल्सन थे। इसके नेता बंगाल के शिक्षा सचिव थे वे भारतीय भाषाओं संस्कृत, फारसी, अरबी के साहित्य को पाश्चात्य साहित्य से श्रेष्ठ मानते थे।

पाश्चात्य शिक्षावादी विचारधारा- उसके समर्थक नवयुवक अंग्रेज अधिकारी थे जो संख्या में भी प्रौढ अंग्रेज अधिकारियों से अधिक थे। ये युवक भारतीय संस्कृति, भाषा और साहित्य को हेय दृष्टि से देखते थे। इनके अनुसार ज्ञान का प्रसार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से हो सकता है।

प्राच्च पाश्चात्य विवाद- प्राच्यवादियों के एक दल का आरोप था कि अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य ज्ञान की शिक्षा राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित है। उनका कहना था कि अंग्रेजी पढ़ाकर क्लर्क उत्पन्न होंगे जो अंग्रेजी शासन के समर्थक बनेंगे और कम खर्च पर प्रशासन के कार्यों में सहयोग देंगे। पाश्चात्य शिक्षावादियों का विचार था कि भारतीय जनता यूरोपीय ज्ञान को एकत्रित करना चाहती है। राज राममोहन राय जैसे भारतीय विद्वान भी अंग्रेजी पढ़कर भारत का उद्धार चाहते हैं। प्राच्य विचारधारियों के अनुसार अरबी, फारसी, संस्कृत साहित्य पर आधारित शिक्षा भारतीयों को धर्मों और जातियों में बाँटे रखेगी। उनका अलग-अलग रहना ब्रिटिश शासन के हित में होगा।

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विवाद का अन्त-सॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाकर शिक्षा नीति पाल विचारधारा के पक्ष में निर्धारित की। गवर्नर जनरल विलियम बैटिंक ने फरवरी, 1835 ई. को मैकाले द्वारा प्रतिपादित प्रतिवेदन के साथ इस विवाद का अन्त कर दिया यह विवाद चलता रहा. प्राच्यवादी असन्तुष्ट रहे। विलियम बैटिक के इंग्लैण्ड चले जाने पर जब लॉर्ड ऑकलैण्ड भारत के गवर्नर जनरल बनकर आये, तब उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि विवाद की जड़े आर्थिक सहायता में कमी किया जाना है। अतः उसने दोनों पक्षों को आर्थिक सहायता बढ़ाकर इस विवाद का अन्त किया।

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