फ्रांसीसी गृह युद्ध पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

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फ्रांसीसी गृह युद्ध – 17वीं और 18वीं शताब्दी में फ्रांस यूरोप का सबसे प्रबल राज्य था, और 14 वें लुई का शासनकाल राजसी निरंकुशता की चरम पराकष्ठा थी। यूरोप के अन्य राजाओं ने इस Sun king का अनुसरण करने का प्रयास किया। उसके तीन सक्षम पूर्वाधिकारियों- हेनरी चतुर्थ, रिशलू और मैजरिन ने सुई 14वें के लिए एक ठोस आधारशिला तैयार कर रखी थी।

1589 में हेनरी चतुर्थ फ्रांस का राजा बना। उस समय देश लगभग पचीस वर्षों के कदु धार्मिक युद्ध के कारण रक्तरंजित और द्वन्द्वग्रस्त था। कानून और व्यवस्था के प्रति सम्मान खत्म हो चुका था। कई सामन्तों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। केन्द्रीय सरकार की वित्तीय स्थिति अस्त-व्यस्त थी। सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त थे। यूरोप में फ्रांस की प्रतिष्ठा काफी घट गई थी। यहाँ तक कि पेरिस फिलिप द्वितीय के स्पेनी सैनिकों से पिए हुआ था।

फ्रान्सका पहला व शासक ‘नावार का हेनरी’ इन सारी परिस्थितियों को बदलने में लग गया 36 वर्षीय तेजस्वी हेनरी चतुर्थ मिलनसार और विनोदी, उत्साही, उदार, आशावादी और सामाजिक जीवन में लोकतंत्रवादी था। उसका नारा था “रविवारीय रात्रि भेज में हर किसान की थाली में चिकन” यह कम ही दिनों में फ्रांसीसी इतिहास का सबसे लोकप्रिय राजा बन गया। इस रूमानी हेनरी को सल्ली के डयूक के रूप में एक सक्षम, व्यवस्थित और मेहनती मंत्री मिल गया। हेनरी चतुर्थ के सामने सबसे अनिवार्य काम था।

केन्द्रीय सरकार की सत्ता को पुनर्स्थापित करना । इस उद्देश्य के लिए वह लूटमार का दमन करने तथा विधि-व्यवस्था लागू करने में तेजी से लग गया। प्रसिद्ध सामन्तों-बिरों, बरमेण्डी, बुइयों को एक-एक कर उसने नीचा दिखाया और फ्रांस के सामन्ती विरोध को नियंत्रित करने मैं सफलता पाई। छोटे-बड़े सभी सामन्तों को उसने केन्द्रीय सरकार की सत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

हेनरी और सल्ली ने आर्थिक पुनर्निर्माण का एक व्यापक कार्यक्रम चलाया जीवन और सम्पत्ति की अधिक सुरक्षा, सड़कों, पुलों और बन्दरगाहों की मरम्मत और आन्तरिक तथा बाह्य व्यापार को प्रतिबन्धों और कर सम्बन्धी बाधाओं से मिली मुक्ति के कारण कृकृषि और व्यवसाय का विस्तार हुआ। दलदलों को साफ कर जमीन को खेती के लायक बनाया गया। बेहतर किस्म की फसलें उगायी गई। कर्ज और कर के बदले किसानों के औजारों और जानवरों की जब्ती बन्द की गई। शीशा, पोर्सिलेन, फीता, दीवार-दरी (Tapestry), महीने चमड़े और वस्त्रोद्योग को राज्य की ओर से संरक्षण और आर्थिक सहायता मिली। रेशम उद्योग जिसके लिए आज भी फ्रांस प्रसिद्ध है, उसी समय बड़े पैमाने पर बढ़ा लिओ और नीस के नगर रेशम उद्योग के केन्द्र बन गए। 1608 ई. में अमेरिका के क्यूबेक में पहला फ्रांसीसी उपनिवेश स्थापित किया गया।

हेनरी के शासनकाल की दूसरी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी झूनों (Huguenot) अल्पसंख्यको को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना। रोमन कैथोलिक बहुल राष्ट्र का समर्थन प्राप्त करने के लिए उसने प्रोटेस्टेंट धर्म का परित्याग कर दिया था। परन्तु प्रोटेस्टैंट लोगों के प्रति वह अब भी सहिष्णु था। उसने 1598 ई. में धार्मिक सहिष्णुता की नीति के सम्बन्ध में नांत अध्यादेश (Edict of Nantes) की घोषणा की। इस अध्यादेश द्वारा पूजन लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ राजनीतिक और सिविल समानता भी मिली। दो सौ नगरों और तीन हजार किलों, जहाँ ह्यूजनों लोग बड़ी संख्या में रहते थे, उन्हें वहाँ सार्वजनिक रूप से भी अपने धर्म के अनुसार कार्य करने की आजादी दे दी गई। उनके स्कूलों को भी राजकीय देने का वायदा किया गया। प्रोटेस्टेंट पुस्तकों पर से प्रतिबन्ध उठा लिया गया। सूजन लोग अपनी पंचायतें चला सकते थे। इस घोषणा के प्रति पूजन लोग आश्वस्त हो पाएँ, इसलिए उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए नगरों और गढ़ों की किलाबन्दी करने और अपने को सुरक्षित करने का अधिकार दे दिया गया। नांत अध्यादेश धार्मिक स्वतंत्रता का एक अद्भुत नमूना है।

राजकीय सर्वोच्चता, आर्थिक स्वास्थ्य और धार्मिक सहिष्णुता की आधारशिला रखने के बाद हेनरी चतुर्थ ने अपने अन्तिम वर्षों में वैदेशिक मामलों की ओर ध्यान दिया। वह स्थायी शांति के लिए राष्ट्रसंघ जैसी संस्था के निर्माण की बात करता था, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। वह सबसे पहले फ्रांस को सुरक्षित और बाद में स्पेनी और ऑस्ट्रियन हैप्सबर्ग राज्यों को कमजोर कर पूरे यूरोप में फ्रांस को सर्वोच्च बनाना चाहता था। उसने आक्रमण के लिए सेना को तैयार किया। अब वह युद्ध के लिए तैयार ही हो रहा था कि 1610 ई. में एक विक्षिप्त कैथोलिक ने उसकी हत्या कर दी।

कार्डिनल रिश्तू ने हेनरी चतुर्थ की इटालियन पत्नी मेरी द मेडिसी और उसके युवा एवं अयोग्य पुत्र लुई तेरहवें के चौदह वर्षों की अधोगति के बाद मंत्री के रूप में फ्रांस की सरकार की बागडोर संभाली। प्रभावशाली रिशल ने अपने को इतना अपरिहार्य बना डाला कि अठारह वर्षों तक (1624-42) उसने फ्रांसीसी मामलों पर अपना दृढ़ नियंत्रण बनाए रखा। तराशी हुई शक्ल, राजसी ठाट-बाट और लाल यस्व वाला खूबसूरत रिशत सही अर्थ में मेकियावेलियन था उसका दिल पत्थर की तरह कठोर था। उसकी दो ही नीतियाँ थी जिनसे वह कभी नहीं भटका। ये थीं फ्रांस में राजसी शक्ति को सर्वोच्च बनाना और यूरोप में फ्रांस की सर्वोच्चता स्थापित करना।

यद्यपि रिशलू रोमन कैथोलिक चर्च में कार्डिनल था, किन्तु वह प्रोटेस्टेंटों के पक्ष में फ्रांस को तीस वर्षीय युद्ध में झोंक देने में नहीं हिचकिचाया। उसका असल उद्देश्य हैप्सवर्गो को कमजोर करना था जो यूरोप में सर्वोच्चता के संघर्ष में बूर्वो वंश के मुख्य प्रतिद्वन्द्वी थे। रिशलू के हस्तक्षेप के कारण जर्मनी में रोमन कैथोलिक के हाथों प्रोटेस्टेंटों का उन्मूलन रोका गया। 1642 ई. में जब वह मरा इस समय तक हैप्सवर्ग साम्राज्य की नींव हिल चुकी थी। अपनी मृत्यु के समय तक रिशलू फ्रांस में राजा के निरंकुश अधिकार और यूरोप में फ्रांस का प्राधान्य कायम करने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुका था। परन्तु, रिशलू ने सामान्य लोगों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया। उनकी रिश के निरंकुश और निष्ठुर काल में और भी बदतर हो गई, यही कारण है कि गरीबों ने रिशलू की मृत्यु पर खुशियाँ मनायीं। रिशल ने जिस केन्द्रीकृत नौकरशाही की स्थापना की थी उसकी छाप फ्रांस में आज भी दिखाई देती है।

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रिश का स्थान उसके शिष्य कार्डिनल मैजरिन ने लिया यह रिशल के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए सर्वथा उपयुक्त था। रिशलू की मृत्यु के एक वर्ष के अन्दर ही लुई तेरहवे की भी मृत्यु हो गई। उसका उत्तराधिकारी लूई, जो तुईश के नाम से फ्रांस के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध बुब राजा हुआ, केवल चार वर्ष का था। मैजरिन ने लुई चतुर्दश के आरम्भिक शासनकाल में यही भूमिका निभायी, जो रिशलू ने तेरहवें लुई के लगभग पूरे शासनकाल में निभाई थी। 1642 से 1661 ई. में अपनी मृत्यु तक मैजरिन ने रिशलु की नीतियों को जोरदार रूप में आगे बढ़ाया। तीस वर्षीय युद्ध का अन्त फ्रांस के पक्ष में हुआ। उन सारी शक्तियों को कुचल दिया गया जो राजा के निरंकुश अधिकारों का विरोध करते थे या चुनौती देते थे।

यद्यपि दोनों की नीतियाँ समान थी, परन्तु उन्हें लागू करने के तरीके अलग थे। रिश अपने अत्यन्त खतरनाक दुश्मनों के सामने भी निर्भीक और स्पष्टवादी था, किन्तु मैजरिन धोखेबाज, धूर्त और कुटिल था। लोग उससे रिश से भी अधिक घृणा करते थे। उसके ‘अत्याचार के विरुद्ध सामन्तो द्वारा दो बार विद्रोह हुआ जिसे फ्रांद के नाम से जाना जाता है। फोंद केन्द्रीय सरकार की लगातार बढ़ती हुई शक्ति के विरुद्ध असंतुष्ट कुलीनों का विद्रोह था जिसे कई और विद्रोही शक्तियों का समर्थन प्राप्त था यह विद्रोह पौध वर्षों तक चला। कभी-कभी ऐसा लगता था कि यह विद्रोह सफल हो जाएगा। लेकिन, अन्ततः मैजरिन विद्रोहियों के लिए भारी पड़ गया। फ्राँद की असफलता 1789 ई. की क्रान्ति के पूर्व निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध अन्तिम खुले विद्रोह को रेखांकित करता है। जब 1661 ई. में मैजरिन की मृत्यु हुई उस समय उसने युवा चौदहवें सुई के लिए ऐसी राजसी शक्ति छोड़ी जो निरंकुश थी और एक ऐसा राष्ट्रीय राज्य प्रदान किया जो यूरोप में सबसे शक्तिशाली था।

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