फिरोजशाह तुगलक की गृहनीति का विस्तृत वर्णन कीजिए।

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फिरोजशाह तुगलक की गृहनीति (सुधार) फिरोजशाह तुगलक एक उदार प्रजा पालक और विद्वान शासक था। सिंहासन प्राप्त होते ही सबसे पहले उसने प्रशासन में ऐसे सुधार किये जिससे उसकी प्रजा के कष्टों का समाधान हो और वह सुख पूर्वक अपना जीवन-यापन कर सके। उसके सुधारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

( 1 ) राजस्व व्यवस्था में सुधार

मुहम्मद तुगलक के शासन काल में व्याप्त लूट खसोट से प्रजा अत्यधिक पीड़ित थी। पूर्व के सुल्तान ने आय बढ़ाने के लिए कर बढ़ाये थे। फिरोज ने यह उचित नहीं समझा। अतः उसने इसको हटाने का प्रयास किया और राज्य की आय-व्यय का स्थायी विवरण तैयार कराने की योजना बनाई। इतिहासकार अफीफ के अनुसार इसके निमित्त उसने एक आयोग का गठन किया तथा ख्वाजा हिसामुद्दीन जुनैदी को उसका अध्यक्ष नियुक्त किया। उसने इस काम में कई वर्ष तक तक भ्रमण कर अपने निरीक्षण के आधार पर राजस्व कर निर्धारित किया। अर्थात् भूमि की नाप के आधार पर राजस्व निर्धारित करने की वैज्ञानिक प्रणाली त्याग दी गई, परंतु इससे भी किसानों को लाभ ही हुआ। अब कृषक जानते थे कि उनको कितना कर देना है और राज्य कर्मचारी ये जानते थे कि उसको कितना कर लेना है।

(2) कष्टकारी करों की समाप्ति

फिरोजशाह तुगलक पहला सुल्तान था जिसने प्रजा पर से लगाये गये 24 कष्टकारी करों को समाप्त कर दिया जिसमें मकान कर तथा चारागाह कर विशेष रूप में उल्लेखनीय हैं। उसने कुरान के नियम के अनुसार, उसने केवल 4 ही कर लगाये खिराज, खम्स, जज़िया और जकात अधिकांश करों को हटा देने से राजकोष में धन की जो कमी हुई उसे अन्य साधनों से पूरा कर लिया गया। उसने उलेमाओं की स्वीकृति से सिंचाई कर भी लगाया जो उन कृषकों को देना पड़ता था जो अपने खेतों की सिंचाई के लिए पानी सरकारी नहरों से लेते थे। इसकी दर उपज का 1/10 भाग थी। उसके शासनकाल में राजस्व अधिकारी निर्धारित दर से अधिक कर नहीं ले सकते थे। आज्ञा की अवज्ञा करने पर अधिकारियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था। उसने राजस्व विभाग के अधिकारियों को नकद वेतन देने के स्थान पर जागीरें दे दीं। इसी प्रकार उसने सैनिकों को भी (नकद वेतन के स्थान पर) जागीरें स्वीकृत कीं। इसके अलावा उसने दिल्ली के आस-पास लगभग 120 बाग लगवाये जिनसे आमदनी बढ़ी। देश की आर्थिक व्यवस्था को उन्नात करने के लिए उसने व्यापार की ओर भी ध्यान दिया। उसने वे सब कर हटा दिये जो आंतरिक व्यापार में बाधा प्रस्तुत करते थे। उसकी इस नीति के कारण देश का व्यापार दिनों-दिन उन्नात होता गया। निःसंदेह फिरोज की इस राजस्व नीति से देश की सम्पन्नाता बढ़ी तथा साम्राज्य में वस्तुयें सस्ती हुई। प्रजा खुशहाल हुई। अनेक इतिहासकारों ने फिरोज की राजस्व नीति की प्रशंसा की है।

(3) सिंचाई को प्रोत्साहन

फिरोज ने कृषि के उत्थान के लिए विशेष ध्यान दिया। वह नहीं चाहता था कि अनावृष्टि के कारण राज्य के किसी भाग में अकाल पड़े और जनता भूखी मर जाये। उसने 5 नहरें बनवायी। पहली नहर यमुना के पानी को हिसार तक ले जाती थी और उसकी लम्बाई 150 मील थी, दूसरी नहर जो 96 मील लम्बी थी, वह सतलज से निकलकर घाघरा तक जाती थी, तीसरी नहर सिरमौर की पहाड़ियों और हांसी के बीच के प्रदेश की सिंचाई करती थी, अन्य दो नहरें घाघरा व यमुना से निकल कर फिरोजाबाद तक पहुंचाती थीं। फिरोज ने इन नहरों की निगरानी के लिए कई अच्छे इंजीनियर नियुक्त किये। इन नहरों से भूमि की सिंचाई अच्छी होने लगी। नहरों के अतिरिक्त उसने अनेक कुये और बांध भी बनवाये। उसके इन प्रयासों से राज्य की कृषि पैदावार में बहुत वृद्धि हुई जिससे किसानों के साथ-साथ आम जनता को भी लाभ हुआ। उजड़े कृषक पुनः सम्पन्ना होने लगे। सिंचाई साधनों की व्यवस्था की वजह से ही केवल दोआब में 52 नई बस्तियां आबाद हो गई थीं। निःसंदेह यह फिरोज की महान सफलता थी।

( 4 ) दासों का रख-रखाव

सुल्तान को दासों से विशेष लगाव था। उसने दासों के – रखरखाव के लिए एक अलग विभाग खोला। फिरोज के शासनकाल में इस प्रथा को बहुत प्रोत्साहन मिला। फिरोज के सरकारी इतिहासकार अफीफ के अनुसार, उस समय दासों की संख्या 180,000 थी जिनमें लगभग 40 हजार सुल्तान के महल में सेवा कार्य करते थे। करीब 12 हजार गुलाम अच्छे कारीगर थे।

(5) सैन्य-व्यवस्था में सुधार

फिरोजशाह ने सेना का संगठन जागीदारी प्रथा के आधार पर कर दिया। उसने यह नियम भी बनाया कि जागीरदारों के घोड़ों और सैनिकों का प्रतिवर्ष सरकारी निरीक्षण हुआ करेगा। जागीरदारी प्रथा की वजह से सेना में सैनिक अधिक संख्या में स्वेच्छा से भरती होने लगे। इसके अलावा उसने पद वंशानुगत कर दिया। पुत्र न होने पर दामाद, गुलाम या अन्य रिश्तेदार को भी पद दे दिया जाता था। इस प्रकार फिरोजशाह ने सैनिकों को विशेष सुविधायें प्रदान की।

(6) मुद्रा प्रणाली में सुधार

सुल्तान ने साधारण जनता की सुविधा के लिए कई मूल्य वाले छोटे-छोटे सिक्के चलाये। उसने ‘शासगानी’ नामक एक सिक्का चलाया जिसका मूल्य 6 जीतल के बराबर था। उसने आधी और चौथाई जीतल के सिक्के भी चलाये जो ‘आधा’ और ‘बीख’ कहलाते थे। उसने तांबा व चांदी मिलाकर कुछ इस ढंग के सिक्के बनवाये कि जाली सिक्के नहीं बनवाये जा सकते थे।

(7) फिरोज की धार्मिक नीति

फिरोजशाह ने शासन में धर्म को पशतमिकता दी। उसने शासन के कार्यों में उलेमाओं से सलाह ली। उसने इस्लामी कानूनों के अनुसार शासन करने का पूरा प्रयास किया। चूंकि वह धर्म को पशतमिकता देता था अतः कुछ लोगों ने उसे धार्मिक असहिष्णु बताया है। परंतु यह आरोप सही नहीं है। इसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगाया जो इस्लामी कानून के अनुसार सही था। फिरोज एक सहय और उदार व्यक्ति था वह प्रजा हितैषी शासक था वह अपनी प्रजा के हितों का सदैव ध्यान रखता था। इसी कारण उसने 24 कष्टकारी करों को समाप्त कर दिया। यह कार्य भी उसने इस्लामी कानून के ही अनुसार द किये थे। वास्तव में उस पर जो धर्मिक असहिष्णुता के आरोप लगाये हैं वह बाद के यूरोपीय इतिहासकारों ने लगाये हैं। तत्कालीन किसी भी इतिहासकार ने उस पर ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया। निःसंदेह वह एक प्रजा हितकारी उदार और धार्मिक व्यक्ति था जिसे अपनी सभी प्रजा समान रूप से प्रिय थीं।

( 8 ) फिरोजशाह की न्याय व्यवस्था

सुल्तान की न्याय व्यवस्था उदार थी जो कि इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित थी। उसने इस्लामी विद्वानों और काजियों को पुनः विशेषाधिकार दिये। फिरोज के शासनकाल में अमानवीय दण्डों जैसे हाथ-पैर काट देना, आंख निकाल लेना, पिघला शीशा पिला देना, नाक-कान काट लेना, शरीर पर कीले ठोकना आदि को समाप्त कर दिया। उसके इन कार्यों ने आम जनता में उसे और लोकप्रिय शासक बना दिया।

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(9) सुल्तान के लोक हितकारी कार्य

फिरोजशाह को लोक निर्माण का बहुत शौक था। इस मामले कोई भी अन्य शासक से उसकी तुलना नहीं की जा सकती। उसने 50 बांध, 40 मस्जिदें, 30 विद्यालय, 20 महल, 100 सराय, 100 स्नानागार, 30 तालाब आदि बनवाए और करीब 1200 बाग लगवाये। सुल्तान फिरोजशाह ने फतेहाबाद, हिसार, जौनपुर, फिरोजपुर, फिरोजाबाद आदि नगर भी बसाये। फिरोजाबाद नगर आज भी उसकी स्थापत्य कला के प्रति प्रेम का परिचायक बना हुआ है। आजकल इसे फिरोज शाह कोटला कहते हैं। इसमें तीन मंजिल की इमारत आज भी शेष है। उसकी तीसरी मंजिल पर एक पाषाण स्तम्भ आज भी खड़ा है। दिल्ली में लाये गये के समय के स्तम्भ यह बतलाते हैं कि उसे स्तम्भों के प्रति लगाव था। ऐसा भी माना जाता है कि उसने प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों को धराशायी होने से बचाया। उसने अपने पूर्वजों की कब्रों की भी मरम्मत करवाई।

लोकहित में फिरोजशाह का एक प्रमुख कार्य था बेरोजगार व्यक्तियों के लिए रोजगार कार्यालय की स्थापना। यह सम्भवतः भारत का प्रथम रोजगार कार्यालय था। इस कार्यालय में बेकार आदमियों का पूर्ण विवरण रखा जाता था तथा लोगों को उसकी योग्यता के अनुसार रोजी दिलाने की व्यवस्था की जाती थी। अधिकारियों को उसने आदेश दिये कि वे समय-समय पर बेरोजगारी की जांच पड़ताल करें। बेरोजगारी समस्या दूर करने के लिए एक अलग विभाग स्थापित कर दिया था। इसके अलावा उसने एक दान विभाग ? दीवान-ए-खैरात’ खोला। इसका मुख्य कार्य विधवाओं और अनाथों की देख-रेख करना तथा उन मुस्लिम लड़कियों की सहायता करना था जिनके मां-बाप गरीबी के कारण उनका विवाह नहीं कर पाते थे। सुल्तान ने बीमारों के निःशुल्क उपचार के लिए एक सरकारी अस्पताल या ‘दारूलशफा भी खोला था। उसमें कुशल हकीम नियुक्त किये गये थे और मरीजों को मुफ्त भोजन दिया जाता था।

उपरोक्त विचरण से स्पष्ट है कि फिरोज शाह ने जनता के लाभ के लिए अनेकानेक महत्वपूर्ण कार्य किया। उसके शासन काल में जनता खुशहाल थी, कृषि की दशा उच्चात थी, अपराध कम होते थे देश में शांति थी निःसंदेह इसका श्रेय फिरोजशह की शान्तिपूर्ण, प्रजाहितकारी, लोक कल्याणकारी गृहनीति को ही है।

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