फिरोज तुगलक के राज्यारोहण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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फिरोज तुगलक के राज्यारोहण – 20 मार्च, 1351 को मुहम्मद-बिन-तुगलक की सिंध (थट्टा) में मृत्यु हो गई। इतिहासकार बरनी और शम्स-ए-सिराज अफीफ का मत है कि मृत्यु के पूर्व मुहम्मद तुगलक ने अपने चचेरे भाई फीरोजशाह तुगलक को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था, परन्तु इस • आशय का कोई लिखित वसीयतनामा नहीं था। अतः, सुलतान के निर्वाचन का प्रश्न उठ खड़ा हुआ। इस समय गद्दी के दो दावेदार थे-

फीरोजशाह तुगलक तथा मृत सुल्तान का भांजा खुदावंदजादा अमीर और उलेमा वर्ग ने फीरोजशाह को सुलतान माना, यद्यपि कुछ अमीरों ने खुदावंदजादा का साथ दिया। उलेमा के सहयोग से 22 मार्च, 1351 को थट्टा में ही फीरोज का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ। खुदाबंदजादा ने भी यह फैसला स्वीकार कर लिया। अब सुलतान दिल्ली की तरफ बढ़ा। रास्ते में ही उसे मुहम्मद तुगलक के वजीर ख्वाजाजहाँ के विद्रोह की खबर मिली।

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उसने एक बालक को गद्दी पर बिठा दिया था तथा घोषणा कर दी थी कि वही सुलतान का असली वारिस है। फीरोज जब दिल्ली पहुँचा, तब वजीर ने क्षमा माँग ली। उसे जागीर देकर समाना भेज दिया गया। मार्ग में सिंध से दिल्ली तक फीरोजशाह मस्जिदों, दरगाहों और खानकाहों को दान देता हुआ एवं उनकी दुआएँ लेता हुआ दिल्ली पहुँचा था। दिल्ली पर अब निर्विरोध फीरोज तुगलक का अधिकार हो गया।

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