फिरोज तुगलक कौन था? वह दिल्ली का शासक कैसे बना?

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फिरोज तुगलक कौन था? – फिरोज सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के छोटे भाई रज्जब का पुत्र था। रज्जब का विवाह एक राजपूत राजा रनमल की पुत्री से हुआ था। फिरोज उसी का पुत्र था जिसका जन्म 1306 ई. में हुआ। फिरोज की शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध कया गया परन्तु वह ज्यादा योग्य नहीं बन सका। उसने अपने जीवन में न किसी सफल सैनिक अभियान में भाग लिया और न उसने अच्छे शासन प्रबन्ध की योग्यता का परिचय दिया। परन्तु मुहम्मद तुगलक अपने इस भाई से विशेष प्रेम करता था। सम्भवतया फिरोज का सबसे बड़ा गुण अपने भाई की आज्ञा का पालन करना था। इस कारण फिरोज को शासन में महत्वपूर्ण पद प्राप्त होते रहे।

जिस समय मुहम्मद तुगलक की मृत्यु हुई। उस समय फिरोज उसके साथ था। सरदारों की सम्मति से 23 मार्च 1351 ई. को फिरोज दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुआ।

सिंहासन प्राप्त के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद फिरोज के सिंहासन पर बैठने में दो बातें विचारणीय हैं। प्रथम फिरोज स्वयं सिंहासन पर बैठने के लिए उत्सुक था अथवा नहीं? साधारणतया यह मत प्रचलित है कि वह स्वयं सिंहासन पर बैठने के लिए उत्सुक नहीं था बल्कि सरदारों के कहने पर उसने सिंहासन स्वीकार किया था। आधुनिक समय में इसके बारे में शंका स्कट की गयी। ऐसा नहीं माना जा सकता कि वह महत्वाकांक्षाओं से रहित था बल्कि सुल्तान मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात सिंहासन के उत्तराधिकार के समर्थन में बने हुए विभिन्न गुटों में से एक गुट में वह भी सम्मिलित था। प्रभावशाली उलेमा वर्ग और इस्लाम के समर्थक साधु-संत तथा सरदार जो मुहम्मद तुगलक की नीति से असन्तुष्ट होकर उस नीति में परिवर्तन चाहते थे, फिरोज के समर्थक बने और स्वयं फिरोज निरन्तर उनसे सम्पर्क बनाता रहा, बड़ी सावधानी से उनका समर्थन प्राप्त करता रहा तथा उसे गुट के प्रभाव को बढ़ाने का अवसर देता रहा।

थट्टा से दिल्ली तक के मार्ग में वह सभी सुन्नी संतों के मजारों पर होता हुआ आया, सभी जीवित धर्माधिकारियों को वह सम्मान प्रदान करता आया और उसने सर्वथा कट्टर सुन्नी समुदाय के सिद्धांतों में विश्वास प्रकट किया। जिस समय उसे सिंहासन पर बैठने के लिए आमंत्रित किया ग्या, उस अवसर पर यद्यपि उसके समर्थकों की संख्या अधिक थी परन्तु तब भी उसकी स्थिति सुनिश्चित न थी। यही उसके संकोच का कारण रहा था। अन्यथा उसने कट्टर सुन्नी वर्ग का समर्थन प्राप्त करके सिंहासन को प्राप्त करने की लालसा की थी। इसी कारण डॉ. डे ने लिखा है। “उसकी अरुचि और संकोच का कारण राज्य के सभी वर्गों से अपने लिए समर्थन प्राप्त करने की अनिश्चितता का परिणाम था।” वह पुनः लिखते है न उसे सुल्तान बनने की पूर्ण इच्छा थी और उसने इस प्रकार कार्य किया कि वे उसे सफलता प्राप्त हो जाय।” डॉ. डे ने अपने समर्थन में बदायूँनी का एक विवरण दिया है जिसमें उसने लिखा है कि ‘सुल्तान मुहम्मद के एक पुत्र था।

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जो उस समय शिकार पर गया हुआ था और जिसका फिरोज ने अमीरों की सहायता से वध कराकर सिंहासन पर अधिकार कर लिया। डॉ. डे का कथन अत्यधिक तर्क संगत प्रतीत होता है। फिरोज में सैनिक प्रतिभा नहीं थी फिर भी अमीरों ने उस संकट के अवसर पर उसे ही सुल्तान चुना। बाद के समय में भी वह निरन्तर उलेमा वर्ग पर निर्भर करता रहा और उसकी धार्मिक नौति कठोर रही। ये सभी बातें इस ओर संकेत करती है कि फिरोज ने धार्मिक वर्ग और मुहम्मद तुगलक की नीतियों से असन्तुष्ट वर्ग से गठबंधन करके सिंहासन प्राप्त करने का प्रयत्न किया और उसमें सफल हुआ। बरनी और अफीफ ने लिखा है कि सुल्तान मुहम्मद ने फिरोज को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। परन्तु इस बात के कोई अन्य प्रमाण प्राप्त नहीं होते। यह बात अवश्य मानी जाती है कि सिन्धु के विद्रोहियों और मंगोलों के शाही खेमों तक दावा करने के कारण ऐसी परिस्थिति बन गयी थी जिनमें सुल्तान का शीघ्र चुनाव करना आवश्यक था और राज्य की परिस्थितियों यह मांग कर रही थी कि एक बच्चे के स्थान पर वयस्क और सर्वमान्य व्यक्ति को सिंहासन प्राप्त होना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में फिरोज ने कुशलतापूर्वक कार्य किया और बहुसंख्यकों का समर्थन प्राप्त करके सुल्तान बनने में सफलता प्राप्त की।

द्वितीय विचारणीय बात यह है कि क्या फिरोज सिंहासन का अपहरणकर्ता था अथवा क्या सिंहासन पर उसका न्यायोचित अधिकार न था । सर वुल्जले हेग ने लिखा है कि वजीर ख्वाजा- ए-जहाँ ने जिस बच्चे को दिल्ली में सुल्तान घोषित किया वह मुहम्मद तुगलक का जायज पुत्र था। इस कारण सिंहासन पर अधिकार उसी का था। ऐसी स्थिति में उस बच्चे को सिंहासन से हटाकर स्वयं सुल्तान बनाना न्यायपूर्ण न था। अतः फिरोज अपहरणकर्ता था। आधुनिक इतिहासकारों में डॉ. आर. सी. जौहरी ने फिरोज को राज्य का अपहरणकर्ता माना है। उसके अनुसार बरनी के अतिरिक्त किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा कि मुहम्मद तुगलक ने फिरोज को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, यदि मुहम्मद तुगलक फिरोज को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता तो मुहम्मद की बहिन खुदाबन्दजादा अपने पुत्र दाबर मलिक के सिंहासन पर बैठने के अधिकार की मांग न करती और ऐसी स्थिति में सरदारों को सुल्तान चुनने की आवश्यकता ही न होती। इस पक्ष में यह भी कहा गया कि बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद तुगलक का एक पुत्र था।

ऐसी स्थिति में सिंहासन पर अधिकार उसी का था। परन्तु अधिकांश इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते। प्रथम वजीर द्वारा प्रस्तुत बच्चा, मुहम्मद तुगलक का ही बच्चा था। इसके स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। द्वितीय मुसलमानों में शासकों के लिए वंशानुगत अधिकार मान्य नहीं था। अनेक बार मुसलमान सुल्तान निर्वाचित किए गए थे। इस्लामी कानून और परम्परा भी सुल्तान के निर्वाचन के विरुद्ध नहीं है। ऐसी परिस्थिति में फिरोज का निर्वाचन नियम के विरुद्ध नहीं था और इस कारण उसे सिंहासन का अपहरणकर्ता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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