पर्यावरण संरक्षण में विद्यालय की भूमिका का वर्णन कीजिये।

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पर्यावरण संरक्षण में विद्यालय की भूमिका

प्राथमिक, उच्च प्राथमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षण संस्थाओं में चल रहे पाठ्यक्रमों के अंतर्गत पर्यावरण संबंधी अध्ययन-अध्यापन करवाया जाना वांछित है। मानवीय एवं राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप ही शिखा के दर्शन एवं पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाना चाहिए। पर्यावरण संतुलन एक राष्ट्रीय समस्या है, अतः इसके संबंध में भावी पीढ़ी को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान प्रदान कराना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। कालांतर में यही पीड़ी पर्यावरण संतुलन के कार्य को अपना कर्तव्य समझकर उत्तरदायी ढंग से पर्यावरण से संरक्षण में पहल करने की मनोवृत्ति को सहज ही स्वीकार कर सकेगा। अतः पारिस्थितिकी प्रणाली एवं पर्यावरण को पाठ्यक्रम के अभिन्न अंग के रूप में तैयार करने की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकता है।

भावी पीढ़ी को ऐसी पारस्थितिकी प्रदान की जाये, जिससे शुद्ध पर्यावरण से होने वाले लाभों का अवबोधन करते हुए उसमें पर्यावरणीय अभिवृत्तियों का विकास हो सके। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आजकल शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा हुआ है। इन शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संतुलन बनाये रखने एवं उसके असंतुलित होने से समाज पर पड़ने वाले दुष्षभावों के बारे में ज्ञान देकर जागरूकता पैदा करने जैसे कार्य किये जा सकते हैं। आज पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। पारिस्थितिकी प्रणाली के असंतुलित होने के तीन प्रमुख कारण है

  1. विवेकहीन तकनीकी प्रगति,
  2. निर्बाध गति से जनसंख्या की वृद्धि तथा
  3. जनचेतना की कमी एवं पर्यावरण के बारे में अनभिज्ञता ।

अतः विद्यालयों का दायित्व है कि पर्यावरण के अभिज्ञान द्वारा व्यक्तिगत, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण का गुणात्मक सुधार करते हुए उसके संरक्षण के प्रति छात्रों में जागृति पैदा करें।

वर्तमान अर्थप्रधान युग में शीघ्र लाभ की मनोवृत्ति का होना स्वाभाविक है। व्यकितगत लाभ को शीघ्र प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक साधनों का दोहन नहीं, बल्कि क्रूरतापूर्ण ढंग से उनका विध्वंस ही किया है। मानव इस कुकृत्य के फलस्वरूप विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की भांति ही वर्तमान सभ्यता का भी अस्तित्व कहीं खतरे में तो नहीं पड़ जायेगा। इस प्रश्न ने अनेक आशंकाएं उपत्र कर दी हैं। अतः समय की मांग है कि हम अपने बालकों, बालिकाओं तथा वयस्कों को पर्यावरण पाठ्यक्रम में प्रस्तावित विभिन्न विषयों के साथ एकीकृत करके पर्यावरण के प्रति सजग बनाने की भरपूर चेष्टा करें। सामाजिक फिजीशियन एवं सामाजिक अभियंता के रूप में विद्यालय उचित ढंग से समाहित पर्यावरण संबंधी विषयवस्तु द्वारा इस गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है।

क्या भारतवर्ष में जनाधिक्य है विवेचना कीजिए।

वर्तमान अर्थप्रधान युग में शीघ्र लाभ की मनोवृत्ति का होना स्वाभाविक है। व्यकितगत लाभ को शीघ्र प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक साधनों का दोहन नहीं, बल्कि क्रूरतापूर्ण ढंग से उनका विध्वंस ही किया है। मानव इस कुकृत्य के फलस्वरूप विश्व की प्राचीन सभ्यताओं की भांति ही वर्तमान सभ्यता का भी अस्तित्व कहीं खतरे में तो नहीं पड़ जायेगा। इस प्रश्न ने अनेक आशंकाएं उपत्र कर दी हैं। अतः समय की मांग है कि हम अपने बालकों, बालिकाओं तथा वयस्कों को पर्यावरण पाठ्यक्रम में प्रस्तावित विभिन्न विषयों के साथ एकीकृत करके पर्यावरण के प्रति सजग बनाने की भरपूर चेष्टा करें। सामाजिक फिजीशियन एवं सामाजिक अभियंता के रूप में विद्यालय उचित ढंग से समाहित पर्यावरण संबंधी विषयवस्तु द्वारा इस गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है।

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