परमार वंश के प्रारम्भिक इतिहास को लिखिए।

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परमार वंश के प्रारम्भिक इतिहास

परमार वंश का प्रथम ऐतिहासिक पुरुष उपेन्द्र था। डॉ. ब्यूतर के अनुसार उपेन्द्र ने मालवा को विजित कर लगभग सन् 800 ई. में सिंहासन प्राप्त किया। उपेन्द्र के बाद उसका पुत्र वैरसिंह प्रथम परमार वंश का शासक था । उदयपुर प्रशस्ति में उसे शत्रुओं का विनाशक कहा गया है। वैरसिंह अत्यन्त बीर था, जिसने शत्रुओं को पराजित कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर जय स्तम्भ की प्रतिष्ठा की। चैरसिंह प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सीयक प्रथम उत्तराधिकारी हुआ। उदयपुर प्रशस्ति में उसे भी शत्रुओं का विनाशक एवं अवन्ति का शासक कहा गया है। सीयक प्रथम के बाद वाक्पति प्रथम शासक बना।

प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल प्रथम के साथ सामन्त के रूप में वाक्पति प्रथम ने प्रतिहार-पाल संघर्ष में सहायता की थी। वैरसिंह द्वितीय वाक्पति प्रथम के बाद परमार शासक बना। इसके काल में कोई विशेष घटना का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है। वैरसिंह द्वितीय के बाद उसका पुत्र सीयक द्वितीय, जिसका उपनाम हर्ष था, सन् 949 ई. में सिंहासन पर बैठा उसे ‘महाराजाधिपति महामाण्डलिक चूडामणि’ कहा गया है। नवशाहशांक चरित से ज्ञात होता है कि सीयक द्वितीय को ‘द्विपथवासिंह’ (शत्रु हाथियों को नष्ट करने वाला सिंह) कहा गया है। यह प्रथम शक्तिशाली परमार शासक था।

गुर्जर प्रतिहारों की उत्पत्ति

नवशाहशांक चरित से पता चलता है कि उसने हूणों पर विजय प्राप्त की थी। इसके समय में प्रतिहार वंश महीपाल प्रथम की मृत्यु के पश्चात् अत्यन्त निर्बल हो गया था। दूसरी ओर राष्ट्रकूट वंश भी पतन के कगार पर था। इस अवसर का लाभ उठाकर उसने परमार वंश को एक शक्तिशाली वंश बनाने में महान योगदान दिया।

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