न्यायिक सक्रियता का उदय एवं सहायक तत्वों की विवेचना कीजिए।

न्यायिक सक्रियता का उदय और विकास (न्यायिक सक्रियता न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति का ही विस्तार है )-भारतीय संविधान द्वारा भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना की गई है तथा संविधान संविधानवादी में करता है संविधानवादी शासन की मूल मान्यता यह है कि शासन को मर्यादित शक्तियाँ ही प्राप्त होनी चाहिए। संविधानवादी शासन की इस धारणा के अनुरूप ही भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था की गई है। न्यायिक पुनर्विलोकन के आधार पर न्यायपालिका ऐसे किसी भी को अवैध कर सकती है जो संविधान का उल्लंघन करता है। कालान्तर में न्यायपालिका ने यह अनुभव किया कि उसे यह शक्ति भी प्राप्त होनी चाहिए कि यदि कार्यपालिका अकर्मण्यता के कारण अपने कर्तव्यों की अनदेखी करे अथवा वह मनमाना आचरण करने की प्रवृत्ति को अपनाये तो न्यायपालिका उसे कर्तव्य पालन के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश दे अथवा मनमाना आचरण करने की स्थिति में उसे ऐसा करने से रोक दे। इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन व्यवस्थापिका के मनमाने कानून निर्माण पर रोक लगाने का साधन है तो न्यायिक सक्रियता कार्यपालिका को कर्तव्य पालन की दिशा में प्रवृत्त करने या मनमाना आचरण करने से रोकने का साधन है।

न्यायिक सक्रियता न्यायिक पुनर्विलोकन से आगे का एक चरण है, एक ऐसा चरण जिसे व्यवस्था में निहित गतिशीलता, शासन की कमजोरियों एवं दोषों तथा बदलती हुई परिस्थतियों ने जन्म दिया है। न्यायिक सक्रियता की स्थिति को न्यायपालिका द्वारा उसी देश में अपनाया जा सकता है, जिस देश में न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था है। पिछले पांच दशक में अमरीकी न्यायपालिका ने भी कुछ सीमा तक न्यायिक सक्रियता की स्थिति को अपनाया है। इस प्रकार न्यायिक सक्रियता न्यायिक पुनर्विलोकन से आगे का चरण है तथा यह कथन सत्य है कि ‘न्यायिक सक्रियता न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति का ही विस्तार है’ (Judicial Activisim is only an extension of the power of Judicial Review) 1

संविधान लागू किये जाने के बाद लगभग तीन दशक तक न्याय की परम्परागत धारणा को स्वीकार किया जाता रहा, लेकिन गतिशीलता राज-व्यवस्था का प्राण है। राज-व्यवस्था का प्रत्येक तत्व, प्रत्येक अंग और प्रत्येक संस्था स्वयं में गतिशीलता लिये हुए होती है। 1970 के बाद से ही निरन्तर ऐसी स्थितियाँ बन जिनके आधार पर न्यायाधीशों और समस्त न्याय व्यवस्था से जुड़ा वर्ग यह सोचने के लिए प्रेरित हुआ कि कानून और संविधान के शब्दों की तुलना में संविधान की भावना और आत्मा को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए और संविधान की आत्मा की रक्षा करने के लिए आवश्यक होने पर तंग कानूनी प्रक्रियाओं के दायरे से बाहर निकलकर संविधान की रचनात्मक व्याख्या का मार्ग अपनाया जाना चाहिए।

न्यायिक सक्रियता की धारणा के उदय और विकास में सहायक तत्व (प्रेरक तत्व)

न्यायिक सक्रियता की धारणा के उदय में प्रमुख रूप से इन स्थितियों का योग रहा है-

(1) अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुरू किये गये जनहित अभियोग

अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे जनहित अभियोगों की शुरूआत की थी, जिनमें पीड़ित • पक्ष की कमजोर स्थिति को दृष्टि में रखते हुए पीड़ित पक्ष (एक व्यक्ति या वर्ग) की ओर से किसी अन्य व्यक्ति ने न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की और न्यायालय ने उसे विचार के लिए स्वीकार किया। यह ‘जनहित अभियोग’ की स्थिति थी।

(2) राजनीतिक दलों और दलीय नेताओं के आचरण में गिरावट

गत तीन दशकों से यह बात अनुभव की जा रही थी कि राजनीतिक दल और राजनीतिक दलों के नेता, जो व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में स्थान पाते हैं बहुत ऊंचे स्वर और नारेबाजी के रूप में आर्थिक सामाजिक न्याय के प्रति लगाय की बातें निरन्तर कह रहे थे, लेकिन व्यवहार में उन्होंने सामान्य जन और उनके हितों के प्रति घोर उदासीनता की स्थिति को अपना लिया था। यह स्थिति न्यायाधीशों सहित समाज के सभी संवेदनशील तत्वों को उद्विग्न कर रही थी।

(3) विधायी संस्थाओं में व्याप्त घोर अव्यस्था और कार्यपालिका की अक्षमता

इस सदी के सातवें दशक से ही विधायी संस्थाएं घोर अव्यवस्था और शोर-शराबे का प्रतीक बनती जा रही थी, ‘राजनीतिक उठा घर पटक’ की स्थितियां थीं, सत्तारूढ़ वर्ग की रुचि केवल इस बात में थी कि ‘येक केन प्रकारेण’ स्वयं को सत्ता में बनाये रखा जाय सत्ता पक्ष और विपक्ष निरन्तर टकराव और कुछ परिस्थितियों में खुले और भद्दे टकराव की स्थिति में थे। विधायी और कार्यपालिका संस्थाओं की इस अक्षमता के कारण राज व्यवस्था में एक रिक्तता की स्थिति पैदा हो गई थी। स्वाभाविक रूप से न्यायपालिका को प्रेरणा मिली कि वह इस रिक्तता को भरने के चेष्टा करे।

(4) सर्वोच्च कार्यपालिका की अपने दायित्व से बचने की प्रवृत्ति

इस सदी के अन्तिम दशक में सर्वोच्च कार्यपालिका ने दायित्व से बचने की चेष्टा करते हुए न्यायपालिका को कुछ ऐसे काम सौंपने की चेष्टा की, जो अपनी प्रकृति में राजनीतिक थे। कार्यपालिका जय ‘मण्डल विवाद’ को हल नहीं कर पाई, तब उसने सर्वोच्च न्यायालय की ओर देखा। इसी प्रकार जब अयोध्या में विवादास्पद ढाँचा ढहा दिया गया, तब ऐतिहासिक प्रश्न की आड़ में यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श के लिए भेज दिया गया। चाहे आरक्षण का प्रश्न हो या नदी जल विवाद, हर किसी विवाद को हल करने के लिए न्यायपालिका की ओर देखा जाने लगा।

(5) राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार

इस अन्तिम दशक में ही कार्यपालिका का कोई ऐसा पदाधिकारी नहीं बचा, जिस पर भ्रष्ट आचरण के आरोप न लगे हों ये सभी आरोप करोड़ों-अरबों रुपयों की धनराशि के सम्बन्ध में थे दूसरी ओर महामारियों की रोकथाम का प्रश्न हो या पर्यावरण की रक्षा अथवा कानून और व्यवस्था का प्रश्न कार्यपालिका सभी मामलों में घोर अकर्मण्यता का परिचय दे रही थी। ऐसी स्थिति में न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने जरूरी समझा कि कार्यपालिका को कर्तव्य पालन के लिए निर्देश दिये जाय। 1980 के लगभग न्यायिक सक्रियता का उदय हुआ और समय के साथ-साथ यह धारणा विकसित होती गई। 20वीं सदी के अन्तिम दशक और 21वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में तो ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ भारतीय संविधान और राजव्यवस्था एक प्रमुख तत्व बन गया।

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प्रारम्भ में ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाया गया। सर्वोच्च न्यायालय से उच्च न्यायालयों को प्रेरणा प्राप्त हुई और उनके द्वारा ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ को अपना लिया गया। इसके बाद कुछ विशेष न्यायालयों और जिला न्यायालयों के द्वारा भी भारी उत्साह भाव से न्यायिक सक्रियतावाद को अपनाने की सफल-असफल चेष्टाएं की गई। न्यायिक सक्रियता की इस स्थिति को दृष्टि में रखते हुए ही अमरीका की पत्रिका ने भारत की न्यायपालिका को ‘दुनिया की सबसे सक्रिय न्यायपालिका’ करार दिया है।

न्यायिक सक्रियतावाद का आशय

न्यायिक सक्रियतावाद का आशय है: “संविधान, कानून और अपने दायित्वों के प्रसंग में कानूनी व्याख्या से आगे बढ़कर सामाजिक-आर्थिक परिस्थतियों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए संविधान और कानून की रचनात्मक व्याख्या करते हुए जन साधारण के हितों की रक्षा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना।” इसके अन्तर्गत यह बात सम्मिलित है कि जन सामान्य के हित की दृष्टि से आवश्यक होने पर शासन को निर्देश देना और शासन की स्वेच्छाचारिता पर रोक लगाना न्यायपालिका का दायित्व है। न्यायिक सक्रियतावाद के एक पक्षघर न्यायाधीश पी. एन. भगवती ने 1982 में कहा था, “सर्वोच्च न्यायालय ने विगत दो वर्षों से देश में विद्यमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थतियों को दृष्टि में रखते हुए समस्त व्यवस्था में सक्रिय दृष्टिकोण अपना लिया है।” 1980-2012 ई. के काल में न्यायिक सक्रियता में निरन्तर वृद्धि ही हुई है। मई 2010 में एच. एच. कपाड़िया के मुख्य न्यायाधीश के पद को किये जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अधिक सक्रिय भूमिका तथा भ्रष्टाचार को लेकर अधिक गंभीर रुख का परिचय दिया। फरवरी 2012 ई. में तो सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा दूरसंचार के क्षेत्र में दिये गये 122 लाइसेंस रद्द कर दिये और सरकार को निर्देश दिया कि “खुली नीलामी की प्रक्रिया’ को अपनाते हुए नये लाइसेंस जारी किये जाएं।

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