निदर्शन से क्या तात्पर्य है? निदर्शन के विभिन्न प्रकारों एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।

निदर्शन से तात्पर्य – कुछ को देखकर सब के बारे में अनुमान लगा लेने की विधि की निदर्शन कहते हैं इन “कुछ” की विशेषताएँ “सव” की आधारभूत विशेषताओं का उचित प्रतिनिधित्व करती है यदि इस “कुछ” का चुनाव ठीक से किया जाए। सब की परीक्षा करना धन सापेक्ष और समय सापेक्ष हो सकता है। इसीलिए “कुछ” का अध्ययन करना ही उचित है। इस प्रविधि का प्रयोग जीवन में प्रत्येक व्यक्ति करता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि समग्र में से चुने गये “कुछ” को जो कि समग्र का उचित प्रतिनिधित्व करता है निदर्शन कहते हैं। गुडे एवं हॉट “एक निदर्शन जैसा कि नाम से स्पष्ट है। कि किसी विशाल सम्पूर्ण का छोटा प्रतिनिधि है।”

श्रीमती यंग “एक सांख्यकीय निदर्शन उस सम्पूर्ण समूह अथवा योग का एक अतिलघुचित्र है जिसमें से निदर्शन लिया गया है।”

बोगाईस– “निदर्शन एक चयन है जो कि पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार इकाइयों के समूह में से एक निश्चित प्रतीत होता है।”

निदर्शन के आधार-

(1) समग्र की विषमता के मध्य एकरूपता

दो सामाजिक घटनाएँ समान नहीं होतीं परन्तु गहन अध्ययन से ज्ञात होता है कि इसमें एकरूपता के स्पष्ट लक्षण होते हैं। यदि इन विविधताओं में अन्तर्निहित एकरूपता को ढूंढा जा सके और इसके आधार पर निदर्शन का चुनाव किया जाये।

(2) प्रतिनिधि चयन की सम्भावना

सम्पूर्ण समूह को गुण या गुण समूह के आधार पर कुछ वर्गों में विभाजित किया जाए और प्रत्येक वर्ग में कुछ का चुनाव किया जाए तो यह समग्र का उचित प्रतिनिधित्त्व कर सकता है।

(3) लगभग सही होना-

निदर्शन यथासम्भव प्रतिनिधिपूर्ण हो। यथासम्भव प्रतिनिधिपूर्ण निदर्शन वास्तविक स्थिति का लगभग चित्र होगा और हमारा निष्कर्ष भी लगभग ठीक होगा। सामाजिक अध्ययन में लगभग से ही संतुष्ट रहना पड़ता है।

निदर्शन के प्रकार

निदर्शन प्रविधि की सहायता से प्रतिनिधिपूर्ण निदर्शन का चुनाव किया जाता है। निष्कर्षो की यथार्थता के लिए आवश्यक है कि निदर्शन समग्र का उचित प्रतिनिधित्व करें। निदर्शन की निम्नलिखित प्रणाली है-

  1. देव निदर्शन,
  2. उद्देश्यपूर्ण निदर्शन,
  3. वर्गीकृत निदर्शन,
  4. अन्य निदर्शन।

(1) दैव निदर्शन प्रणाली

इस पद्धति में कौन-सी इकाइयों को निदर्शन के रूप में स्थान मिलेगा यह अनुसंधानकर्ता के विशिष्ट झुकाव व इच्छा पर नहीं अपितु पूर्णरूप से संयोग पर निर्भर करता है। अतः इस पद्धति में निदर्शन का चुनाव (संयोग) दैवयोग पर आधारित होता है। दैव निदर्शन को सानुपातिक निदर्शन भी कहा जाता है।

देवनदर्शन विधि में निदर्शन चुनने के कई तरीके हैं उनमें से कुछ निम्नवत् हैं-

(A) लाटरी विधि

समग्र की समस्त इकाइयों के नाम अथवा नम्बर कागज की चिटों या चौकोर कागज पर लिखकर उन्हें किसा बर्तन, बाक्स या झोले में रखकर हिलाया जाता है और फिर आँख बन्द करके आवश्यकतानुसार चिटें निकाली जाती हैं।

(B) कार्ड या टिकट प्रणाली

एक ही आकार, रंग, मोटाई वाले कार्ड अथवा टिकटों पर समस्त इकाइयों के नाम या नम्बर अंकित कर दिये जाते हैं। इन सब को एक ड्रम में डालकर हिलाया जाता है और आवश्यकतानुसार कार्ड निकालकर निदर्शन का चयन किया जाता है। कार्ड निकालते वक्त आँखे खुली रखता है जबकि लाटरी में आँखें बंद रहती हैं।

(C) नियमित अंकन प्रणाली

समग्र की इकाइयों पर क्रम डालकर सूची बना ली जाती है फिर जितनी इकाइयों का चयन करना है उसके अनुसार वर्ग-अन्तराल पर निदर्श का चुनाव किया जाता है। उदाहरण- 50 बालक में से 5 बालक का चुनाव करना है तो प्रत्येक 10वाँ बालक हमारे चयन में आता जाएगा।

(D) अनियमित अंकन प्रणाली

इसमें समस्त इकाइयों की सूची बनाकर अनियमित तरीके से उतने निदर्श का चुनाव कर लेंगे जितने हमें निदर्शन के लिए चुनाव करना है। इस विधि में पक्षपात की सम्भावना रहती है।

(E) गिड प्रणाली

किसी क्षेत्र का सैम्पल बनाने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है। अनुसंधान क्षेत्र का मानचित्र लेकर उस पर पारदर्शक ग्रिड को रखते हैं और चुने हुए वर्गों के नीचे पड़ने वाले क्षेत्र में निशान लगा लेते हैं। यही निदर्शन की इकाइयाँ होती हैं।

(F) टिपेट प्रणाली

प्रो० टिपेट ने चार अंकों वाली 10400 संख्याओं को एक पुस्तक के विभिन्न पृष्ठों पर लिखा। इन विभिन्न पृष्ठों से आवश्यकतानुसार नम्बर ले लिये जाते हैं। टिपेट की यह विधि आजकल बहुत प्रचलित है।

(2) उद्देश्यपूर्ण निदर्शन प्रणाली

जब समग्र में से विशेष उद्देश्य से कुछ इकाइयों का चयन किया जाता है तो उसे उद्देश्यपूर्ण निदर्शन प्रणाली कहा जाता है।

(3) वर्गीकृत निदर्शन प्रणाली

समग्र को सजातीय वर्गों में बाँटकर प्रत्येक वर्ग में से निश्चित संख्या में इकाइयाँ दैव निदर्शन पर चयनित की जाती है। वर्गीकृत निदर्शन के कुछ और प्रकार हैं-

  • समानुपातिक,
  • असमानुपातिक,
  • भारयुक्त,
  • वर्गीय निदर्शन।

(4) अन्य निदर्शन प्रणाली

निदर्शन के कुछ अन्य प्रकार भी प्रचलित हैं-

  1. अभ्यंश निदर्शन,
  2. क्षेत्रीय निदर्शन,
  3. पुनरावृत्ति निदर्शन,
  4. बहुस्तरीय निदर्शन,
  5. स्वयं चयनित निदर्शन प्रणाली,
  6. सुविधाजनक निदर्शन प्रणाली।

निदर्शन प्रणाली का महत्त्व

समय की बचत

निदर्शन प्रणाली में समग्र में से कुछ इकाइयों का चयन करके उनका

अध्ययन किया जाता है इसलिए इसमें समय की बड़ी बचत होती है। धन की बचत निदर्शन में कम इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। अतः इससे धन की पर्याप्त बचत होती है।

श्रम की बचत

चूँकि निदर्शन में कम इकाइयों का चयन कर अध्ययन किया जाता है। अतः अधिक श्रम और कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार निदर्शन श्रम की बचत को प्रोत्साहन देता है।

गहन अध्ययन

संगणना विधि में क्षेत्र विस्तृत एवं इकाइयाँ बिखरी हुयी होती है अतः उनके बारे में मोटी-मोटी बातें ही ज्ञात की जा सकती है। निदर्शन में कम इकाइयों का अध्ययन किये जाने के कारण उनके बारे में सूक्ष्म एवं गहन जानकारी प्राप्त करना सम्भव है।

परिणामों की परिशुद्धता

निदर्शन में शोधकर्त्ता का ध्यान कुछ निश्चित इकाइयों की ओर होता है अतः उनसे प्राप्त निष्कर्ष यथार्थ एवं परिशुद्ध होते हैं। यदि निदर्शन का चुनाव सही तरीके से किया गया है तो निष्कर्ष संगणना विधि की तरह परिशुद्ध होते हैं।

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तथ्यों की पुनर्परीक्षा

परिणामों की विश्वसनीयता जाँचने के लिए पुनर्परीक्षा किया जाता है चूँकि निदर्शन पद्धति में इकाइयाँ कम होती है अतः इनका पुनर्परीक्षण सम्भव है।

प्रशासनिक सुविधा

निदर्शन में ईकाइयों की संख्या कम होने के कारण प्रबन्धन एवं प्रशासन के आयोजन एवं संगठन में सुविधा रहती है। एक तरफ तो कम कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है और उन पर नियन्त्रण रखना आसान होता है।

निदर्शन की अनिवार्यता

कई बार अनुसंधान में निदर्शन विधि का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। उदाहरण- जब भौगोलिक क्षेत्र दूर-दूर तक फैला हो इकाइयों की संख्या अधिक हो और सम्पर्क करना सम्भव नहीं हो तो ऐसी स्थिति में निदर्शन विधि एकमात्र उचित साधन है।

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