नातेदारी का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।

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नातेदारी का अर्थ एवं परिभाषा

समाज में कोई भी व्यक्ति अकेला रहकर जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसे बहुत से व्यक्तियों से घिरा रहता है। जिनके बीच उसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति होती है इन व्यक्तियों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति वे होते हैं जिनका एक व्यक्ति से विवाह अथवा रक्त का सम्बन्ध होता है। अतः सम्बन्धों की यह व्यवस्था जिसके अन्तर्गत विवाह और रक्त से सम्बन्धित बहुत से व्यक्तियों को जोड़ता है। वह नातेदारी व्यवस्था कहलाता है।

मानवशास्त्रीय शब्दकोष के अनुसार “नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे सभी सम्बन्ध आते हैं जो कल्पित तथा रक्त सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।” इस परिभाषा में कल्पित सम्बन्धों का तात्पर्य उन सभी सम्बन्धों से है जो या तो विवाह सम्बन्ध के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं अथवा जो गोद लेने या इसी प्रकार के दूसरे सम्बन्धों से जुड़े हुए होते हैं।

रॉबिन फॉक्स ने लिखा है, “नातेदारी का तात्पर्य कुछ स्वजनों के मध्य स्थापित होने वाले सम्बन्धों से है, यह स्वजन चाहे वास्तविक हों अथवा कल्पित समान रक्त वाले हों।”

रेडक्लिफ ब्राउन के शब्दों में “नातेदारी सामाजिक उद्देश्यों के लिए स्वीकृत वंश सम्बन्ध है तथा यह सामाजिक सम्बन्धों के प्रथागत स्वरूप का आधार है।” इससे स्पष्ट होता है कि केवल उन्हीं व्यक्तियों के प्रथागत सम्बन्धों को नातेदारी के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है जो एक वंश अथवा कुल से सम्बन्धित होते हैं।

नातेदारी के प्रकार

नातेदारी व्यवस्था के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं

(1) विवाह सम्बन्धी

नातेदारी यह नातेदारी सम्बन्ध उन व्यक्तियों के बीच स्थापित होते हैं जो विवाह के द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित माने जाते हैं। विवाह के द्वारा एक व्यक्ति का सम्बन्ध केवल अपनी पत्नी से ही नहीं होता बल्कि पत्नी-पक्ष के अनेक दूसरे व्यक्तियों से भी स्थापित हो जाता है। उदाहरण के लिए उसका अपनी पत्नी के भाई-बहिनों, माता-पिता, बहिन के बच्चों, भाई की पत्नी, बहिन के पति तथा भाई के बच्चों से भी बहनोई, दामाद, मौसा, ननदोई, सादू तथा फूफा आदि के रूप में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इसी प्रकार एक स्त्री विवाह के द्वारा केवल पत्नी ही नहीं बनती बल्कि अपने पति के माता-पिता, भाई-बहिनों भाई की पत्नियों, बहिनों के पतियों तथा वंश के अन्य व्यक्तियों के संदर्भ में उसे एक विशेष प्रस्थिति प्राप्त हो जाती है। इन सभी व्यक्तियों के बीच स्थापित होने वाले सम्बन्धों के आधार रक्त न होकर विवाह होता है तथा ऐसी नातेदारी कभी-कभी रक्त सम्बन्धियों से भी अधिक व्यापक हो जाती है।

( 2 ) रक्त सम्बन्धी

नातेदारी इस श्रेणी के अंतर्गत वे सभी लोग आते हैं जो समान रक्त के कारण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। उदाहरण के लिए माता-पिता और उनके बच्चे अथवा भाई-बहिन समान रक्त से सम्बन्धित होने के कारण रक्त सम्बन्धी नातेदार होंगे। ऐसे रक्त सम्बन्ध इस अर्थ में वास्तविक होते हैं कि कोई भी व्यक्ति उन्हें सरलतापूर्वक ज्ञात कर सकता। इस सम्बन्ध में मान्यता यह है कि जिन व्यक्तियों में भी समान रक्त कण होने की सम्भावना की जाती है उन्हें रक्त सम्बन्धी नातेदार कहा जायेगा। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि यदि एक बच्चे में उसके पिता, दादा, दादी, माँ, नाना, नानी आदि का रक्त होने की सम्भावना की जा सकती है तो यह सभी व्यक्ति उस बच्चे के रक्त सम्बन्धी नातेदार होंगे।। इसके बाद भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न रक्त सम्बन्धियों के बीच वास्तविक रक्त सम्बन्ध होना सदैव आवश्यक नहीं होगा। अनेक दशाओं में रक्त सम्बन्ध काल्पनिक अथवा माना हुआ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए नीलगिरि की पहाड़ियों पर रहने वाली टोडा जनजाति मैं एक स्त्री अनेक पुरुषों से विवाह करती है। ऐसी स्थिति में यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि उस स्त्री से जन्म लेने वाले बच्चे का वास्तविक पिता कौन है। पति पुरसुतपिमि (एक संस्कार) के द्वारा उसे धनुष-बाण भेंट करता है, उसे जन्म लेने वाले बच्चे का पिता मान लिया जाता है। इसके पश्चात् भी टोडा जनजाति में पिता और संतान का यह सम्बन्ध समरक्त सम्बन्ध माना जाता है।

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रक्त सम्बन्धी नातेदारी के निर्धारण में प्रथाओं का महत्व मलेनेशिया के ट्रोवियण्ड द्वीप में रहने वाले व्यक्तियों के उदाहरण द्वारा भी समझा जा सकता है। इस द्वीप में स्त्रियों को यौन सम्बन्धों के क्षेत्र में अत्यधिक स्वतंत्रता मिली हुई है। इसके फलस्वरूप बच्चे के पिता को ज्ञात कर सकना बहुत कठिन है लेकिन फिर भी संतान का पिता उसी व्यक्ति को माना जाता है जिसने बच्चे की माँ से विवाह किया हो। इसी प्रकार के उदाहरण ऐसी अनेक जनजातियों में पाये जाते हैं जहाँ वास्तविक रक्त सम्बन्धों की तुलना में “माने हुए” अथवा काल्पनिक रक्त सम्बन्धों का भी उतना ही महत्व होता है। गोद लिये हुए बच्चों से भी माता-पिता का वास्तविक रक्त सम्बन्ध न होने के बाद भी उनसे एक पुत्र अथवा पुत्री के रूप में माता-पिता का वैसा ही सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है जैसा कि समरक्त पुत्र अथवा पुत्री से इसका तात्पर्य है कि रक्त सम्बन्धी नातेदारी केवल उन्हीं व्यक्तियों तक सीमित नहीं होती जिनके बीच प्रजनन का वास्तविक सम्बन्ध होता है। ऐसी नातेदारी में समाज की प्रथाएँ एक महत्वपूर्ण आधार हैं।

इस प्रकार रक्त सम्बन्धियों तथा विवाह सम्बन्धियों के बीच विकसित होने वाली सम्पूर्ण नातेदारी को ही हम नातेदारी व्यवस्था के नाम से सम्बोधित करते हैं।

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