मुहम्मद बिन तुगलक की विदेश नीति की विवेचना कीजिए।

0
45

मुहम्मद तुगलक की विदेश नीति – मुहम्मद तुगलक ने अनेक सैनिक अभियान किए एवं कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी बनाई, परन्तु उसकी गृहनीति की तरह विदेशनीति भी पूर्णतः असफल रहीं।

मंगोल आक्रमण का सामना

मुहम्मद-बिन-तुगलक के समय सम्भवतः मंगोल नेता तरमशीरी का आक्रमण हुआ। अनेक विद्वान यह मानते हैं कि वह एक शरणार्थी के रूप में भारत आया था, जिसकी सहायता कर मुहम्मद ने मंगोलों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया। इसके विपरीत, कुछ अन्य विद्वानों की धारणा है कि मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया था। मंगोलों के पूर्व इतिहास को देखते हुए यही मत ज्यादा सही प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तरमशीरी ने सिंध पर आक्रमण किया और आगे बढ़ता हुआ मेरठ तक आ पहुँचा। मेरठ के नजदीक सुलतान ने उसे परास्त कर वापस जाने पर मजबूर कर दिया। तरमशीरी के साथ सम्भवतः मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध भी स्थापित किए गए। दोनों में उपहारों का आदान-प्रदान हुआ। कुछ मंगोल अधिकारियों को सरकारी नौकरी दी गई। मंगोल नेता से मैत्री के चलते अनेक लाभ हुए। सुलतान को मध्य एशिया की राजनीति के विषय में लगातार जानकारी मिलने लगी। सुलतान ने इसके आधार पर गजनी को अपने प्रभाव में लाने तथा खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाई । इसके बाद मुहम्मद तुगलक के समय में फिर मंगोलों ने भारत पर आक्रमण नहीं किया।

राजपूत राज्यों पर विजय का प्रयास

सुलतान ने राजपूतों पर भी अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। राजपूत राज्य सदैव ही दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर अपनी शक्ति सुदृढ़ कर लेते थे। मेवाड़ के राणा हम्मीरदेव ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी एवं सम्पूर्ण मेवाड़ पर अपना आधिपत्य जमा लिया। सुलतान की सेना ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, परन्तु पराजित हुई। कहा जाता है कि राणा ने सुलतान को भी बंदी बना लिया था एवं सुलतान को राणा से बाध्य होकर संधि करनी पड़ी, परन्तु अनेक विद्वान इस घटना की सत्यता में अविश्वास प्रकट करते हैं।

नागरकोट एवं अन्य स्थानों की विजय

1337 ई. में सुलतान ने हिमालय की तराई में स्थित नागरकोट पर विजय प्राप्त की। उसने सम्भवतः दक्षिण भारत के अनेक प्रदेशों पर अधिकार किया, परन्तु उसकी दक्षिण की विजय अस्थायी सिद्ध हुई। अपने राज्यारोहण के तुरंत बाद सुलतान ने पश्चिमोत्तर सीमा में कलानौर तथा पेशावर पर अधिकार किया। कोंधाना (सिंहगढ़) देवगिरी के निकट था। यहाँ पर नाग नायक का अधिकार था। सुलतान ने उसे परास्त कर आत्मसमर्पण करने को विवश कर दिया।

विदेशों से सम्बन्ध

मुहम्मद तुगलक ने विदेशी शासकों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इराक के शासक मूसा, ख्वारिज्म की रानी तुरावक तथा चीनी सम्राट तोगन तैमूर एवं मि के अब्बासी खलीफा के साथ उसने मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाया। इब्ने बतूता को राजदूत के रूप में चीन भेजा गया। उसके समय में एशिया के विभिन्न भागों से दूत मंडल दिल्ली आए तथा विदेशों के साथ राजनयिक सम्बन्धों का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। इराक, चीन, ख्वारज्मि के राजकीय प्रतिनिधिमंडल तथा सीरियाई अरबों के सरदार का पुत्र उसके दरबार में आए। चीन के सम्राट ने मुहम्मद तुगलक के लिए प्रचुर मात्रा में मूल्यवान उपहार भी भेजे। इसी प्रकार ईरान के सुलतान अबू सईद खाँ ने अपना राजदूत दिल्ली भेजा। सुलतान ने भी अपना एक शिटमण्डल चीन भेजा। इन शिष्टमण्डलों के आदान-प्रदान से सुलतान को विदेशी शासकों की मैत्री प्राप्त हुई और उसके सम्मान में वृद्धि भी हुई।

खुरासान विजय की योजना

सुलतान मुहम्मद तुगलक एक महत्वाकांक्षी शासक था। विदेशों से सम्पर्क स्थापित होने से उसे मध्य एशिया की राजनीति पर नजर रखने का मौका मिला। मध्य एशिया की स्थिति इस समय अशांत थी। खुरासान सम्भवतः ईरान के नियंत्रण में था। अबू सईद के शासनकाल में ईरान की स्थिति दुर्बल हो चली थी। यहाँ षड़यंत्रकारी स पलटने का प्रयास कर रहे थे। मंगोल नेता तरमशीरी तथा मि के शासक भी ईरान पर अपना प्रभाव जमाना चाहते थे। ईरान तथा खुरासान से अनेक राजकुमार दिल्ली आए थे। उन्होंने सुलतान को विश्वास दिलाया कि वह आसानी से खुरासान पर विजय प्राप्त कर सकता है। वस्तुतः मध्य एशिया की राजनीति में एक शून्यता आ गई थी जिसका लाभ सुलतान मुहम्मद उठाना चाहता था इस बीच मुहम्मद तुगलक, तरमशीरी और मि के शासक के बीच मैत्री स्थापित हो गई थी। इसका लाभ उठाकर सुलतान ने खुरासान पर आक्रमण करने की योजना बनाई।

योजना की पूर्ति के लिए मुलतान ने एक विशाल सेना संगठित की। इसमें करीब 3,70,000 सैनिक थे। सेना में राजपूतों एवं मंगोलों को सम्मिलित किया गया। सेना को एक वर्ष का अग्रिम वेतन भी दिया गया, लेकिन यह योजना आरंभ ही नहीं हो सकी। सेना के कूच करने के पहले ही मध्य एशिया की राजनीति में परिवर्तन हो गया। तरमशीरी अपदस्थ कर दिया गया तथा मि और ईरान में संधि हो गई। फलस्वरूप मुहम्मद को अपनी योजना त्याग देनी पड़ी। अधिकांश सेना भंग कर दी गई। सेना के कुछ भाग को उत्तरी सीमा की सुरक्षा में लगाया गया लेकिन इस परियोजना पर धन और समय बर्बाद हुआ। बर्खास्त किए गए सैनिकों में असंतोष बढ़ा। इससे सुलतान की प्रति घटी।

फिलिप द्वितीय कौन था? फिलिप द्वितीय की नीतियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

कराचिल- विजय की योजना

खुरासान की ही तरह सुलतान ने कराचिल-विजय की भी योजना बनाई कराचिल-प्रदेश मध्य हिमालय में कुत्त-कांगड़ा या गढ़वाल कुमायूँ क्षेत्र था। कुछ • विद्वानों ने इसे चीन का प्रदेश माना है। सम्भवतः चीनी यहाँ पर उत्पात मचाया करते थे।

अतः, इस सीमावर्ती प्रदेश पर अधिकार कर सुलतान अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहता था। 1337 ई. में मलिक खुसरो के नेतृत्व में एक सेना कराविल के राजपूत राजा के विरुद्ध भेजी गई। पर्वतीय मार्ग की दुर्गमता के कारण खुसरो कराचिल पर अधिकार नहीं कर सका। वह राजा से अपनी अधीनता स्वीकार करवाकर वापस लौट आया सुलतान की यह योजना भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here