मुदालियर आयोग की स्थापना पर प्रकाश डालिए।

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मुदालियर आयोग की स्थापना

मुदालियर आयोग की स्थापना 1948 ई. में ‘केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड’ ने भारत सरकार के सामने माध्यमिक शिक्षा की जाँच करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रस्ताव रखा। राधाकृष्णन आयोग (1948-49) ने भी अपनी रिपोर्ट में माध्यमिक शिक्षा की स्थिति पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहा था कि “माध्यमिक शिक्षा देश की शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है।” जनवरी, 1951 ई. में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने पुनः अपनी इस माँग को दुहराते हुए कहा कि “माध्यमिक शिक्षा के पुनर्गठन की अत्यधिक आवश्यकता है क्योंकि माध्यमिक शिक्षा एकांगी है। और उसमें विद्यार्थियों की रुचियों और क्षमताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता।”

प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की विवेचना कीजिए।

केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के सुझाव को स्वीकार करते हुए सरकार ने 23 सितम्बर, 1952 ई० को मद्रास विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ० लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया। इस आयोग को अध्यक्ष के नाम पर ‘मुदालियर आयोग’ भी कहते है। आयोग में कुल नौ सदस्य थे जिनमें डॉ० के० एल० श्रीमाली, के०जी० सैयदेन, श्रीमती हंस मेहता, जॉन काइस्ट और कैनथ रस्ट विलियम्स के नाम उल्लेखनीय हैं। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने विस्तृत प्रश्नावली के आधार पर पूरे देश का भ्रमण कर तथ्यों का संकलन किया और अन्त में अपनी रिपोर्ट तैयार कर उसे 29 अगस्त, 1953 ई० को भारत सरकार को प्रेषित कर दिया। 244 पृष्ठों वाला प्रतिवेदन 14 प्रकरणों में विभाजित था।

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