मूल्य परिप्रेक्ष्य (आर०के० मुखर्जी) की व्याख्या कीजिए।

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मूल्य परिप्रेक्ष्य – सामाजिक मूल्य सामाजिक घटनाओं को मापने का वह पैमाना है जो किसी घटना विशेष के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण रखता है। सामाजिक मूल्य प्रत्येक समाज के वातावरण है और परिस्थितियों की भिन्नता के कारण अलग-अलग होते हैं। ये मानव मस्तिष्क को विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करते हैं जो सामाजिक मूल्य के निर्माता होते हैं।

आर. के. मुखर्जी के अनुसार “मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्ति की इच्छाएँ तथा वे लक्ष्य हैं जिनका आन्तरीकरण समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है और जो व्यक्तिपरक अधिमान्यताएँ, प्रतिमान तथा अभिलाषाएँ बन जाते हैं।”

अतः मूल्यों का सामाजिक आधार होता है और वे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त लक्ष्यों की अभिव्यक्ति करते हैं। मूल्य हमारे व्यवहार का सामान्य तरीका है मूल्यों द्वारा ही एक अच्छे या बुरे सही या गलत में अन्तर करना सीखते हैं।

साक्षात्कार की परिभाषा एवं उसके विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए।

मूल्य एक अमूर्त सामाजिक घटना है। मूल्य समाज का दायाँ भाग जिसका मिश्रण व्यक्ति के व्यक्तित्त्व में समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है। किसी भी समाज की संस्कृति वहाँ के मूल्य निश्चित करते हैं जो भविष्य में फैलकर दृढ़ होते हैं। मूल्य सामान्य होते हैं। सामाजिक मूल्य सार्वभौमिक नहीं होते अपितु परिस्थिति एवं क्षेत्रीय आधार पर विकसित होते हैं।

सामाजिक मूल्य व्यक्तित्व निर्माण में योगदान देते है। व्यक्ति समाजीकरण के माध्यम से मूल्यों को आन्तरीकृत कर लेता है, तथा मूल्यों में वृद्धि के कारण ही उसके नैतिक जीवन का विकास होता है। मूल्यों में संस्तरण पाया जाता है आध्यात्मिक, सामाजिक एवं जैविक मूल्य । आध्यात्मिक मूल्य हैं इसे अन्तर्निष्ठा या लोकातीत कहा जाता है। सामाजिक मूल्यों को बाह्य या क्रियात्मक मूल्य कहा जाता है। सबसे अन्त जैविक मूल्य आता है जो जीवन को आगे बढ़ाने से सम्बन्धित होता है।

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