मौखरि उत्तरगुप्त संघर्ष पर एक निबन्ध लिखिये।

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मौखरि उत्तरगुप्त संघर्ष – गुप्तवंश एवं मौखरि वंश महान गुप्त वंश के आधीन थे। गुप्तों के पतन के पश्चात इन वंशों ने अपनी-अपनी अलग सत्ता स्थापित कर ली। प्रारम्भ में मौखारियों और उत्तरकालीन गुप्तों में मित्रता थी। मौखरी-नरेशों आदित्यवर्मा और ईश्वरवर्मा ने क्रमशः हर्षगुप्ता और उपगुप्ता के साथ विवाह किया था। ये उत्तरकालीन गुप्त वंश की राजकुमारियाँ थी।

परन्तु जब मौखरी-नरेश ईशानवर्मा ने अपनी स्वतंत्रता घोषित करते हुए ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की तो उत्तरकालीन गुप्त वंश ने उसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा समझा। इसी समय से दोनों राजवंशों में शत्रुता का सूत्रपात हुआ जो कई पीढ़ियों तक चलता रहा।

कुमार गुप्त एवं ईशानवर्मा में संघर्ष

ईशानवर्मा का समकालीन गुप्त-नरेश कुमारगुप्त था। अभिलेख से विदित होता है कि इन दोनों में युद्ध हुआ और इनमें कुमारगुप्त ने ईशानधर्मा को पराजित कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि इस विजय के परिणामस्वरूप कुमारगुप्त ने मौखरी- राज्य के पूर्वी भाग पर अधिकार भी कर लिया। अफसढ़ अभिलेख के कथनानुसार कुमारगुप्त का दाह- संस्कार प्रयाग में हुआ था।

ईशानवर्मा ब्राह्मण धर्मावलम्बी था। हरहा अभिलेख का कथन है कि उसने तीनों वेदों की पुन प्रतिष्ठा स्थापित कराई थी। जौनपुर अभिलेख का भी कथन है कि उसने वर्णाश्रम धर्म की पुनः स्थापना की चेष्टा की थी।

कुमार गुप्त एवं सूर्यवर्मा

अभिलेख में ईरान के एक पुत्र सूर्यवर्मा का उल्लेख है। इसने एक शिव मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था। इससे यह प्रकट होता है कि सम्भवतः ईशानवर्मा ने मगध पर भी अधिकार कर लिया था। मगध में ईशानवर्मा की कुछ मुहरें भी मिली हैं। परन्तु उत्तर गुप्त वंशीय शासक कुमारगुप्त ने उसे पराजित कर इस अधिकार का न केवल अन्त कर दिया वरन् मौखरी राज्य के पूर्वी भाग को भी छीन लिया। डॉ. आर.एस. त्रिपाठी के अनुसार ईशानवर्मा की मृत्यु के बाद उसके दोनों पुत्रों सूर्यवर्मा और सर्ववर्मा में गृह-युद्ध हुआ। इसमें सर्ववर्मा की विजय हुई और सूर्यवर्मा मारा गया।

सर्ववर्मा एवं दामोदर गुप्त

ईशान वर्मा की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र सर्ववर्मा मौखरिवंश के सिंहासन पर बैठा। असीरगढ़ राजमुद्रा से ज्ञात होता है कि इसने भी ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की थी। इसके समय में उत्तरकालीन गुप्त वंश में दामोदरगुप्त शासन कर रहा था। अफसड़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि सर्ववर्मा और दामोदरगुप्त का भी युद्ध हुआ। इस युद्ध में दामोदरगुप्त पराजित हुआ और मारा गया। इस विजय के परिणामस्वरूप सर्ववर्मा ने मगध के बड़े भूभाग पर अधिकार कर लिया। इस कथन की पुष्टि देवबर्नार्क अभिलेख से होती है। यह मगध से प्राप्त हुआ है। इसमें सर्ववर्मा के ग्राम दान का उल्लेख है।

अवन्तिवर्मा एवं महासेन गुप्ता

राजमुद्रा से विदित होता है कि सर्व के पश्चात्उ सका पुत्र अवन्तिवर्मा मौखरी सिंहासन पर बैठा। मिग मुद्रा भाण्ड में अवन्तिवर्मा, सर्ववर्मा और ईशान वर्मा की मुद्राएँ साथ-साथ मिली हैं। बाण के हर्षचरित में भी अवन्तिवर्मा का उल्लेख हुआ है। विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षसण का कथन है कि अवन्तिवर्मा ने म्लेच्छों से त्रस्त पृथ्वी का रक्षा की थी। म्लेच्छों का समीकरण हूणों से किया जा सकता है। इस दशा में सम्भवतः अवन्तिवर्मा ने अपने वंश के परम्परागत शत्रु हूणों को परास्त किया था।

इस समय उत्तरकालीन गुप्त वंश में महासेनगुप्त राज्य कर रहा था। हर्ष के मधुवन दानपत्र तथा सोनीपत राजमुद्रा से ज्ञात होता है कि थानेश्वर के वर्धनवंश के राजा प्रभाकर वर्धन की माता का नाम महासेनगुप्ता था। यह महासेनगुप्त की बहन प्रतीत होती है। सम्भव है कि मौखरी-वंश के भय से महासेनगुप्त ने वर्धन वंश के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया हो। इस सन्धि का परिणाम अच्छा हुआ और महासेनगुप्त को अवन्तिवर्मा के विरूद्ध युद्ध नहीं करना पड़ा।

ग्रहवर्मा एवं देवगुप्त

हर्षचरित से प्रकट होता है कि अवन्तिवर्मा के पश्चात् उसका पुत्र ग्रहवर्मा राजा हुआ। इसी ग्रन्थ से प्रकट होता है कि ग्रहवर्मा ने थानेश्वर के वर्धनरेश प्रभाकरवर्धन, के पास अपना दूत भेजकर उसकी पुत्री राज्यश्री के साथ विवाह करने का प्रस्ताव किया था। प्रभाकर वर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और थानेश्वर में दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ। इस विवाह सम्बन्ध ने राजनीतिक क्षेत्र में, बड़े महत्वपूर्ण प्रभाव उत्पन्न किये। इससे वर्धन और मौखरी वंश मित्र बन गये।

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इस समय मालवा में देवगुप्त का राज्य था। इसका उल्लेख मधुवन और बाँसखेड़ा लेख में किया गया है। नाम से अनुमान किया जा सकता है कि यह उत्तरकालीन गुप्त वंश का राजा था। सम्भव है। कि यह महासेनगुप्त का पुत्र अथवा सम्बन्धी हो। महासेनगुप्त और उसके पुत्र मानवत एवं कुमारगुप्त के विरुद्ध इसने मालवा में अपना राज्य स्थापित किया था। सम्भवतः इसलिये माधवगुप्त और ‘कुमारगुप्त बानेश्वर की राजसभा में रहते थे। यह भी अनुमान किया जा सकता है कि थानेश्वर नरेश प्रभाकरवर्धन ने देवगुप्त के विरुद्ध इन राजकुमारा का पक्ष लिया था। हर्षचरित प्रभाकरवर्धन को ‘मालवलक्ष्मीलतापरशु (मालवों की लक्ष्मीरूपी लता के लिये परशु के समान) कहा गया है। सावंशतः उत्तरकालीन गुप्त-नरेश देवगुप्त वर्धनों और उनके मित्र मौखरियों दोनों के विरुद्ध था।

इस प्रकार महवर्मा के समय उत्तरी भारत दो शिविरों में विभक्त हो गया था। एक ओर प्रहवम और वर्धन वंशीय शासक थे तो दूसरी ओर उत्तरगुप्त कालीन शासक देवगुप्त और गौड़ शासक शशांक थे। देवगुप्त (मालवराज) ने कान्यकुब्ज पर आक्रमण कर ग्रहवर्मा को हत्या कर मौखरि वंश का अन्त कर दिया। इस प्रकार मौखरि उत्तरगुप्त वंश के मध्य संघर्ष का भी अन्त हो गया।

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