मानव अधिकारों का वर्गीकरण किस प्रकार से किया गया है ?

मानव अधिकारों का वर्गीकरण – मानवाधिकारों का कई रूपों में वर्गीकरण किया जा सकता है। वैसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों को दो प्रमुख भागों नागरिक और राजनैतिक अधिकार तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार।

(I) नागरिक और राजनैतिक अधिकार

नागरिक और राजनैतिक अधिकारों को परम्परागत अधिकार भी कहा जाता है, इन्हें 17वीं और 18वीं सदी के सुधारात्मक सिद्धान्तों की उपज माना जाता है जो अंग्रेजी, अमेरिकन और फ्रांसीसी क्रान्तियों से सम्बन्धित है। उदार व्यक्तिवादी राजनैतिक दर्शन और अहस्तक्षेप (laissez faire) के आर्थिक और सामाजिक सिद्धान्त से अनुप्राणित होकर यह मानवाधिकार की कल्पना नकारात्मक (‘से स्वतन्त्रता’ ‘freedom from ) न कि सकारात्मक (का अधिकार’ ‘right to’) पद में करता है। यह मानव गरिमा की खोज में राज्य के प्रविरति (abstention) के पक्ष में है न कि राज्य के हस्तक्षेप के पक्ष में। नागरिक और राजनैतिक अधिकारों में प्रधान तथा वहीं अधिकार आते हैं। जिनका उल्लेख मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 2 से 21 में किया गया है और जिनकी विवेचना ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा की अन्तर्वस्तु’ शीर्षक के अन्तर्गत इसमें पहले के पृष्ठों में किया जा चुका है। उन्हें यहाँ पुनः दोहराने की आवश्यकता नहीं है, इस सम्बन्ध में उपरोक्त शीर्षक देखें।

(2) आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार

आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को कार्यक्रमिक (programmatic) अधिकार भी कहा जाता है। इनकी उत्पत्ति प्रधानतया, समाजवादी परम्पराओं, क्रान्तिकारी संघर्षों और लोक कल्याणकारी आन्दोलनों में खोजी जा सकती है। बड़े पैमाने पर ये पूँजीवादी विकास के दुष्प्रयोग और दुर्व्यवहार की प्रतिक्रियाएँ हैं और जिसका परिणाम कामगार (working class) और औपनिवेशिक लोगों के शोषण में हुआ। ऐतिहासिक रूप से ये नागरिक और राजनैतिक अधिकारों के प्रतिस्थायी (counter part) हैं। इनकी संकल्पना सकारात्मक न कि नकारात्मक पदों के रूप में की गयी है। ये राज्य के प्रतिविरति (Abstention) नहीं अपितु हस्तक्षेप की अपेक्षा करते हैं ताकि इसमें अन्तर्ग्रस्त मूल्यों के उत्पादन और विभाजन में साम्यिक (eqauitable) सहभागिता सुनिश्चित की जा सके। आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की सूची मानवाधिकार के सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 22 से 27 में पायी जा सकती है, जिसकी विवेचना ‘मानवाधिकार के सार्वभौम घोषणा की अन्तर्वस्तु’ शीर्षक के अन्तर्गत इसके पूर्व के पृष्ठों में

किया जा चुका है। इस सम्बन्ध में उपरोक्त शीर्षक देखें। मानवाधिकारों को एक अन्य तरीके से भी विभाजित किया जा सकता है नकारात्मक और सकारात्मक अधिकार।

(3) नकारात्मक अधिकार

नागरिक और राजनैतिक अधिकारों को नकारात्मक अधिकार भी कहा जाता है। नकारात्मक इन अर्थों में कि इन अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के ‘सकारात्मक कार्यवाही’ (affirmative action) की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की श्रेणी में कुछ ऐसे अधिकार हैं जिन्हें हम पूर्णतया नकारात्मक अधिकार की परिधि में नहीं ला सकते। उन्हें सुनिश्चित करने के लिए राज्य की कुछ सकारात्मक कार्यवाही आवश्यक है, जैसे व्यक्ति की सुरक्षा का अधिकार (the right to security of person), ऋतु और लोक विचारण का अधिकार (right to fair and public trial), स्वतन्त्र चुनाव का अधिकार (right to free elections), उत्पीड़न से बचने के लिए का अधिकार।

(4) सकारात्मक अधिकार

आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को सकारात्मक अधिकार भी कहा जाता है। सकारात्मक इन अर्थों में कि इन अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य द्वारा ‘सकारात्मक कार्यवाही’ (affirmative action) की आवश्यकता होती है। उदाहरणास्वरूप काम का अधिकार (right to work)। यह अधिकार लोगों को सुनिश्चित करता है तो राज्य को रोजगार के अवसर या रोजगार की परिस्थितियाँ पैदा करनी होगी तभी कार्य का अधिकार वस्तविकता में बदला जा सकता है। इसी प्रकार शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए विद्यालय चाहिए, पाठ्य-पुस्तकें चाहिए, अध्यापक चाहिए, पुस्तकालय एवं अन्य सामग्री चाहिए। राज्य सरकार को इन मदों पर पैसा खर्च करना होगा।

महिला प्रौढ़ शिक्षा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।

जिस प्रकार नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की सूची में सभी अधिकारों को नकारात्मक अधिकार नहीं माना जा सकता उसी प्रकार आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सूची में सभी अधिकारों को सकारात्मक अधिकार की संज्ञा नहीं दी जा सकती। उदाहरणस्वरूप, नियोजन के स्वतन्त्र चयन का अधिकार (Right to free choice of employment), श्रम संघ के निर्माण और उसका सदस्य बनने का अधिकार (Right to form and Join Trade Unions) और राज्य के सांस्कृतिक जीवन में स्वतन्त्र रूप से सहभागिता का अधिकार (The right reely to participate in the cultural life to the community)। इनके लिए राज्य के सकारात्मक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं पड़ती।

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