मानव अधिकारों का कार्यान्वयन के बारे में विश्लेषण कीजिए।

मानव अधिकारों का कार्यान्वयन

मानव अधिकारों का कार्यान्वयन अन्तर्राष्ट्रीय विधि के पुरातन काल में राष्ट्र पूर्ण रूप से स्वतंत्र थे और अपने नागरिकों के साथ जैसा चाहें वैसा व्यवहार कर सकते थे। अब विश्व युद्ध के पश्चात् अधिकतर लोग यह बात स्वीकार करते हैं कि अपने नागरिकों के प्रति व्यवहार के मामले में राज्यों के स्वविवेक या स्वतंत्रता की कुछ सीमाएँ हैं। पुरातन काल में जब कोई राष्ट्र अपने नागरिकों के साथ निर्दयता का व्यवहार करता था। या उसके साथ अत्याचार करता था अथवा उन्हें उनके मूल अधिकारों और स्वतंत्रताएंनहीं देता था तो मानवता के हित में ऐसे राज्यों के मामले में दूसरे राज्यों द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता था। न्यायाधीश लाटर पैट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र चार्टर मानव अधिकार के मामले में राज्यों पर कुछ उत्तरदायित्व अधिरोपित करता है। प्रोफेसर जान हम्फ्री के अनुसार संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों के विषय में कुछ नियम और मापदण्ड स्थापित किए हैं और राज्यों का यह उत्तरदायित्व है कि वे इस नियम में सहयोग करें। परन्तु जहां तक मूल मानव अधिकारों को लागू कराने का प्रश्न है, अन्तर्राष्ट्रीय विधि में ऐसी संस्था का अभाव है जो इनको लागू करवा सके। संस्थापक पक्ष में अभी अन्तर्राष्ट्रीय विधि कमजोर है। प्रोफेसर ओपेनहाइम के अनुसार मूल मानव अधिकारों को लागू करने के मामले में अभी बहुत प्रारंभिक अवस्था है। इस विषय में सबसे बड़ी रुकावट यह है कि राज्य के घरेलू मामलों में संयुक्त राष्ट्र हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। मानव अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में राज्य बहुधा इसी बात का हवाला देते हैं। परन्तु जैसे-जैसे अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विकास हो रहा ह

अन्तर्राष्ट्रीय विषय माना जाता है। यह बात अब स्वीकार की जाने लगी है कि मानव अधिकारों के कार्यान्वयन में घरेलू मामले जिनका उल्लेख चार्टर के अनुच्छेद 2(7) में किया गया है अपवाद है और वे अब लागू नहीं होंगे। यह खेद का विषय है कि बंगला देश में मानव अधिकारों के अप्रत्याशित उल्लंघन के प्रति संयुक्त राष्ट्र उदासीन और अकर्मण्य रहा। यदि मानव अधिकारों के उल्लंघन से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है तो संयुक्त राष्ट्र हस्तक्षेप कर सकता है। बंगला देश के अनुभव ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में प्रतिपादित मानव अधिकारी के प्रोत्साहन तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

अन्तराष्ट्रीय क्षेत्र में प्रत्येक नई घटना नये नियमों को जन्म देने की क्षमता रखती है। बंगला देश के उदाहरण से इस क्षेत्र में उपयुक्त विधि के विकास की आशा करना अनुचित नहीं होगा। भारत द्वारा की गई कार्रवाई से भी राज्यों के व्यवहार में परिवर्तन आने की संभावना है। मानव अधिकारों को प्रोत्साहित करने के लिए तथा भविष्य में मानव अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि प्रणाली को और भी अधिक प्रभावी बनाया जाए। विश्व स्तर पर मानव विधिक नीति को निर्धारित करने की अत्यन्त आवश्यकता है।

मानव अधिकार एवं घरेलू या आन्तरिक अधिकारिता

मानव अधिकारों के क्रियान्वयन में एक प्रमुख समस्या घरेलू अधिकारिता की है। इसका मुख्य कारण संयुक्त चार्टर का अनुच्छेद 2 ( 7 ) है क्योंकि इसमें प्रावधान है कि संयुक्त राष्ट्र ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जो आवश्यक रूप से किसी राज्य की घरेलू या आन्तरिक अधिकारिता में आता है तथा न ही संयुक्त राष्ट्र सदस्यों को ऐसे मामलों या विवादों को चार्टर के अनुसार निस्तारण करने के लिये विवश करेगा। कुछ विधिवेत्ता यह कहते हैं कि चार्टर में यह निषेध मानव अधिकारों के संरक्षण को कम कर देता है। फिर भी यह मत ठीक नहीं जान पड़ता है। वस्तुतः बेहतर या सही मत यह है कि मानव अधिकारों से सम्बन्धित चार्टर के प्रावधानों के कार्यान्वयन में घरेलू अधिकारिता का प्रश्न नहीं उठता है। इस विषय में यह उल्लेखनीय है कि घरेलू या आन्तरिक पहलू एक दूसरे से घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं।

प्रत्येक समस्या जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से जुड़ी है किसी न किसी प्रकार से राज्य के घरेलू या आन्तरिक सम्बन्धों या घरेलू सीमाओं के अन्तर्गत आती है तथा वह अन्य राज्य की सीमा में पहुँच सकती है तथा वह अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन जाती है। अस्तु, कोई भी मामला आवश्यक रूप से घरेलू मामला नहीं होता है यदि वह राज्य द्वारा स्वीकृत किसी अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व का विषय होता है। चूंकि मानव अधिकार एवं मूल स्वतंत्रताएं एक गम्भीर अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व का विषय हो गये है अब यह संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के घरेलू या आन्तरिक अधिकारिता के विषय नहीं रह गये हैं। आज से पाँच दशकों के पूर्व प्रत्येक राज्य को अपनी प्रजा पर पूर्ण प्रभुत्व तथा पूर्ण अधिकारिता इस प्रकार थी कि वह अपनी प्रजा के साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार कर सकता था, उन पर अत्याचार कर सकता था, तथा कोई अन्य राज्य उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना, चार्टर में मूल अधिकार एवं मूल स्वतंत्रताओं का समावेश, मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा का अंगीकार किय

उपलब्धियों ने क्रान्तिकारी परिवर्तन किये। अब यह सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि अपने नागरिकों के साथ व्यवहार के मामले में भी प्रत्येक राज्य की कुछ परिसीमायें है। यदि कोई नागरिक यह अनुभव करता है वह अपने राज्य द्वारा मानव अधिकारों के उल्लंघन का शिकार है या उससे पीड़ित है तो वह संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के माध्यम से अपनी याचिका मानव अधिकार के संयुक्त राष्ट्र कमीशन को भेज सकता है। अस्तु, अब यह सार्वभौम रूप से स्वीकार किया जाता है कि मानव अधिकार एवं मूल स्वतंत्रता अन्तर्राष्ट्रीय चिन्ता का विषय हो गये है तथा जो विषय अन्तर्राष्ट्रीय चिन्ता का विषय हो जाता है यह आवश्यक रूप से राज्य की घरेलू अधिकारिता का विषय नहीं हो सकता है।

मूल्य शिक्षा व मूल्यपरक शिक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए और उसके मार्गदर्शक सिद्धान्तों तथा उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।

यहाँ पर यह देखने की बात है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (7) जिसमें घरेलू आधिकारिता के विषय में निषेध है वह स्वयं एक अपवाद उपबंधित करता है। यह अपवाद चार्टर के अध्याय 7 के अन्तर्गत की गई कार्यवाही के प्रवर्तन के बारे में लागू होता है। यदि मानव अधिकारों के उल्लंघन से ऐसी परिस्थिति या विवाद की उत्पत्ति होती है कि जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति या सुरक्षा को खतरा पहुंचता है तो चार्टर के अध्याय 7 के अन्तर्गत इस आधार पर कार्यवाही की जा सकती है। सुरक्षा परिषद में इस प्रकार की कार्यवाही दक्षिण अफ्रीका 1977, ईराक 1977, सोमालिया (1992) तथा रुआण्डा (1994) में की है। एक लेखक ने ठीक ही लिखा है कि जैसा कई प्रस्ताव विशेषकर दक्षिण अफ्रीका से सम्बन्धित प्रस्ताव से स्पष्ट है कि यदि शान्ति को खतरा नहीं भी है तो भी संस्था कार्यवाही करेगी। ऐसे मामलों में धारा 2 (7) के अन्तर्गत घरेलू अधिकारिता का तर्क बाधा नहीं बना है। प्रचलित मत के अनुसार मानव अधिकारों का गम्भीर उल्लंघन राज्यों के “आवश्यक रूप से घरेलू अधिकारिता के अन्तर्गत” नहीं आता है तथा न ही वह कार्यवाहियाँ जो संयुक्त राष्ट्र ने की है तकनीकी विधिक अर्थों में हस्तक्षेप मानी जायेगी।

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