लॉक के उदारवाद पर प्रकाश डालिए।

लॉक के उदारवाद – उदारवाद का उदय मध्यकालीन युग के सामंतवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। मध्यकालीन युग में सामंतवादी समाज के अन्तर्गत निरंकुश राजतंत्र की राजकीय व्यवस्था हुआ करती थी तब सम्राट के दैवीय अधिकारों का सिद्धान्त प्रचलित व प्रसिद्ध था। ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में सम्राट की शक्तियों पर लोगों का कोई नियंत्रण नहीं होता था तथा लोगों को कोई अधिकार व स्वतंत्रतायें प्राप्त नहीं होती थीं। सामाजिक समझौते के सिद्धान्त के द्वारा देवी सिद्धान्त का खण्ड किया गया तथा राज्य को मानवकृत संस्था बनाये जाने के तर्क प्रस्तुत किये गये। यहीं से अर्थात हॉब्स, लॉक, रूसो से व्यक्तिवाद का आरम्भ हुआ। उदारवाद के एक अग्रणी विचारक के रूप में लॉक ने सीमित राज्य तथा स्वायत्त व्यक्ति के पक्ष का समर्थन किया।

यद्यपि अत्यन्त प्राचीन काल से स्वतंत्रता को मानवीय जीवन का एक महानतम लक्ष्य समझा जाता रहा है, लेकिन इसे राजनीतिक विचार के केन्द्र-बिन्दु का स्थान प्रदान करने का श्रेय उदारवादी दर्शन को प्राप्त है। स्वतंत्रता की समस्या और मानव के लिये इसकी प्राप्ति के उपायों पर जितना ध्यान उदारवाद ने केन्द्रित किया है, सम्भवतः उतना किसी भी अन्य विचारधारा ने नहीं किया।

जॉन लॉक उदारवाद के समर्थकों में निःसंदेह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। लॉक से उदारवाद की आत्मा कहा जा सकता है, क्योंकि उसने अपने दर्शन में स्वतंत्रता को शासन के सर्वोच्च लक्ष्य का स्थान प्रदान किया है। उदारवाद के दो रूप प्रचलित हैं- पुरातन उदारवाद और नवीन उदारवाद।

पुरातन उदारवाद, जिसका प्रतिपादन जेम्स मिल, जैफरसन और टामस पेन के द्वारा किया गया, राज्य को श्रेष्ठतम अवस्था में भी एक बुराई ही मानता है, उसे केवल एक प्रहरी का ही रूप प्रदान करता है और राज्य के कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के ही पक्ष में है, लेकिन लॉक उदारवाद की नवीन धारा का प्रतिनिधित्व करता है और शासन को स्वतंत्रता की प्राप्ति का एक है महत्त्वपूर्ण और आवश्यक साधन मानता है। लॉक उदारवादी इस बात में है कि वह शासन के व्यक्ति-स्वातंत्र्य की प्राप्ति का एक आवश्यक साधन मानते हुये भी यह कभी नहीं भूला है कि शासकीय शक्ति की मर्याद्ययें निर्धारित की जानी चाहिये, जिससे कि इस शक्ति का प्रयोग मानवी स्वतंत्रता के विरुद्ध न हो सके। उसके द्वारा सामाजिक समझौता सिद्धान्त की सम्पूर्ण व्यूह रचना मानवीय स्वतंत्रता के लक्ष्य को दृष्टि में रखकर ही की गयी है।

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डेनिंग के शब्दों में- “हॉब्स और पृफेण्डोर्फ के द्वारा सामाजिक समझौते के आधार पर राजनीतिक संघ के निर्माण की पद्धति शासकीय सत्ता को असीमितता का प्रतिपादन करने के लिये अपनायी गयी है, लेकिन लॉक इस पद्धति के आधार पर शासकीय सत्ता को सीमित करने में ही प्रत्यनशील रहा है। हैकर का मत है कि “जबकि सभी पूर्वगामी विचारकों ने राज्य को अधिक सुदृढ़ बनाने के प्रयत्न किये, लॉक प्रथम विचारक है। जिसने राज्य संस्था को कमजोर बनाने और उसकी शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया।” लॉक की धारणा है कि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्तियों को कुछ प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे और राजनीतिक समाज की स्थापना के बाद भी उनके ये अधिकार पूर्णतः सुरक्षित रहे। डनिंग के शब्दों में, “व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार सम्प्रमु समाज के अधिकारों को ठीक वैसे ही सीमित करते हैं जिस प्रकार प्राकृतिक अधिकार अन्य व्यक्तियों के प्राकृतिक अधिकारों को सीमित करते थे।” शक्ति का कोई दुरुपयोग न करे, इसलिये लॉक ने शक्ति विभाजन का सिद्धान्त भी स्थिर कर दिया था। वह विधायिका और कार्यपालिका विभागों को बिल्कुल अलग-अलग रखना चाहता था, क्योंकि उसका विचार था कि दोनों शक्तियों के एक ही स्थान पर केन्द्रित होने से स्वतंत्रता को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

राजनीतिक उदारवाद को उसकी एक बहुत बड़ी देन धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धान है। उसका विचार है कि व्यक्ति को अपनी आत्मा के अनुसार कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिये। उसका कहना है कि एक ही राज्य में सबको इस बात की छूट होनी चाहिये कि जो व्यक्ति जो धर्म चाहे माने और चाहे जिस सम्प्रदाय का सदस्य रहे। वस्तुतः लॉक व्यक्तियों की स्वतंत्रता की रक्षा के प्रति इतना अधिक जागरूक है कि उसके द्वारा व्यक्तियों को कुशासन के विरुद्ध विद्रोह का स्पष्ट अधिकार प्रदान कर दिया गया है। मानवीय स्वतंत्रता के इस रक्षक को ‘उदारवाद की आत्मा’ का नाम ठीक ही दिया गया है। इवन्स्टीन के शब्दों में, “उदारवाद की आत्मा सर्वाधिक श्रेष्ठ रूप में जॉन लॉक में ही प्रतिविम्बित हुई है।”

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