कुषाणों के भारत में शासन पर एक लघु निबन्ध लिखिए।

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कुषाणों के भारत में शासन – कुषाण मध्य एशिया में निवास करने वाली यू-ची जाति की एक शाखा थे। चीनी इतिहासकार सू-मा- चीन के अनुसार, दूसरी शताब्दी ई.पू. में यह जाति पश्चिमी चीन में निवास करती थी। कुई- शुआंग राज्य इनके अधिकार में था। लगभग 165 ई.पू. में यू-ची कबीले को पड़ोसी कबीले हिंग-नू के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में यू-ची राजा मारा गया। बाध्य होकर यू-ची अपनी विधवा रानी के नेतृत्व में पश्चिम की तरफ बढ़े यू-सुन के प्रदेश पर अधिकार करते हुए ये सरदरिया तक जा पहुँचे तथा वहाँ से शकों को भागने पर मजबूर कर दिया। यहाँ भी वे स्थायी रूप से नहीं रह सके। अपने पुराने दुश्मनों के आक्रमण से बचने के लिए ये ताहिया पहुंचे तथा यहाँ अपना अधिकार जमाया। सोन्दियाना और बैक्ट्रिया भी उनके अधीन आ गए। अब उन्होंने अपनी राजधानी कीन ची (कीन-शी) में स्थापित की चीनी अन्यों हान-शू तथा हाउ-हान-शू में 206 ई.पू. से 220 ई. तक कुषाणों का इतिहास मिलता है। इसके अनुसार मोदियाना पहुंचने के पूर्व ही यू-ची की एक शाखा छोटी यू-ची प्रमुख शाखा से अलग होकर तिब्बत की तरफ चली गई थी। बच्ची हुई पाँच शाखाओं-कुई शुआंग या कुषाण, हीड-मी, शुआग्मी, सितुन और तुमी को उनके एक सरदार (यव) क्यू-ज्यू-कियो या कुजुल केडफिसेस ने कुई शुआंग अथवा कुषाण समुदाय की अध्यक्षता में संगठित किया तथा स्वयं उनका सम्राट (योग) बन गया।

कुंजुल केडफिसेस

भारत में कुषाण वंश का संस्थापक था। यह मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के पश्चात् भारत की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। सर्वप्रथम उसने अपनी सत्ता काबुल और गान्धार में स्थापित की। तक्षशिला के सिरप नामक स्थान से बड़ी संख्या में कुजुल केडफिसेस के सिक्के प्राप्त हुए है। उसके सिक्कों पर एक तरफ अन्तिम यवन- शासक हर्मियम की आकृति मिलती है। इससे अंदाज लगता है कि पहले उसने यूनानियों की अधीनता स्वीकार की होगी। पहवों से भी उसने मित्रता कायम की, परन्तु गोंडोफिर्निस की मृत्यु के पश्चात् उत्तर-पश्चिम में यह स्वतन्य शासक बन बैठा। अपने सिक्कों पर वह अपने आपको महाराजाधिराज कहता है। इसके सिक्कों पर रोमन प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि बिम केडफिसेस ने अपने पिता की भारत विजय में सहायता की सम्भवतः उसी ने गान्धार और तक्षशिला पर भी विजय प्राप्त की। कुजुत ने लगभग 15-65 ई. के मध्य शासन किया। उसके सिक्कों पर उत्कीर्ण ‘सचधर्मतिष्ठ’ अभिलेख के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि यह बौद्धधर्म अथवा संवधर्म में भक्ति रखता था। उसकी मृत्यु अस्सी वर्ष की उम्र में हुई। भारत में कुषाण वंश की सत्ता का संस्थापक कुजुत ‘केडफिसेस ही था। उसने चैक्ट्रिया से गान्धारशिला तक का विस्तार किया।

विम केडफिसेस : 65 ई. में कुल की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र विम केसेस फेडफिसेस द्वितीय कुषाणों का राजा बना। इसके समय में भारत में कुषाण राज्य विस्तृत हुआ तथा इसे स्थायित्व भी प्राप्त हुआ। सिन्धु नदी पारकर इसने तक्षशिला और पंजाब पर अधिकार किया। ऐसा प्रतीत होता है कि कुजुल केडफिसेस के समय में ही तक्षशिला कुषाणों के हाथों से निकल गया। था। अतः विम को दुबारा इस पर अधिकार करना पड़ा। उसने गान्धार पर भी अपनी सत्ता सुदृढ़ की तथा मथुरा तक अपनी शक्ति का विस्तार किया। उसके साम्राज्य की सीमा बहुत अधिक विस्तृत थी। इसमें भारत के अतिरिक्त मध्य एशिया भी सम्मिलित था। प्रो. वैजनाथ पुरी के अनुसार विम केडफिसेस का साम्राज्य पूर्व में बनारस से लेकर पश्चिमोत्तर में पार्शिया की सीमा तक विस्तृत था। अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, बुखारा और रूसी तुर्किस्तान के भाग भी उसके अधीन थे। उसके सिक्के बेग्राम, पेशावर, तक्षशिला, मथुरा, गोरखपुर, वाराणसी, इंदौर से पाए गए हैं। इससे अंदाज लगता है। कि उसका प्रभाव काफी विस्तृत क्षेत्र में था। उसकी भक्ति शैवधर्म में थी। सैनिक अभियानों के अतिरिक्त विम केडफिसेस का समय व्यापार वाणिज्य, धर्म, कला, मुद्रा आदि के विकास के लिए भी उल्लेखनीय है। चूँकि इस समय तक कुषाण साम्राज्य की सीमाएँ उस समय के तीन महत्वपूर्ण साम्राज्यों से जुड़ी हुई थीं तथा प्रमुख व्यापारिक मार्ग कुषाण साम्राज्य के नियन्त्रण में ही थे, इससे विदेशों के साथ, खासकर रोमन साम्राज्य के साथ, व्यापार की काफी प्रगति हुई। इस व्यापार से कुषाणों को काफी आर्थिक लाभ हुए।

वैदिक काल में पशुपालन पर टिप्पणी लिखिए।

कनिष्क प्रथम :- कनिष्क प्रथम कुषाण वंश का एक महान सम्राट था। वह साम्राज्य निर्माता यं महत्वाकांक्षी शासक था। उसने अपने राज्य का विस्तार कर उसे भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य ना दिया। अपने साम्राज्य विस्तार हेतु कनिष्क ने सर्वप्रथम कश्मीर पर आक्रमण कर उसे अपने ज्य में मिला लिया। कश्मीर में उसने अनेक नगरों की स्थापना की। चीनी तथा तिब्बती अनुश्रुतियों अनुसार उसने साकेत एवं मगध पर भी अपना जमा किया कनिष्क से पार्थिया के राजा को भी हराया था। पामीर की पर्वतीय श्रृंखलाओं के उस पार उससे चीनी सेनापति पश्चयाओ की भी मुकाबला किया किन्तु इसमें विजयश्री उसके हाथ नहीं आयी। बाद में उसके पुत्र को कनिष्क में पराजित किया। इस प्रकार उसके अधिकार में काशगर, पारकन्द, खोतान आदि प्रदेश आ गए थे। उसकी मुद्राओं तथा अभिलेखों से यह सिद्ध हो जाता है कि उसका साम्राज्य पूर्व में पाटलिपुत्र से लेकर पश्चिम सिन्ध तक फैला था। कनिष्क बौद्ध धर्म का प्रबल समर्थक तथा उत्साही प्रचारक था। बौद्ध धर्म के इतिहास में उसका अशोक महान के बाद दूसरा स्थान है जिसने बौद्ध धर्म का संरक्षण किया तथा उसके उन्नति का कार्य किया। वह कला एवं साहित्य का भी संरक्षक था। उसके शासन काल में गान्धार एवं मथुरा में कला की विशेष उन्नति हुई।

कनिष्क के पश्चात् उसका पुत्र हुविष्क जो कि भारतीय प्रान्तों पर पहले से ही शासन कर रहा था, राजा हुआ। किन्तु वह अपने पिता कनिष्क की भाँति महान विजेता, सफल शासक, महान निर्माता और साहित्य एवं कला का आश्रयदाता न था। उसके धर्म के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। उसकी मुद्राओं पर ईरानी, यूनानी और भारतीय देवी-देवताओं के चित्र मिलते हैं। उसने मथुरा में बौद्ध विहार बनवाया हुविष्क की मुद्राओं में रोमन देवताओं का भी चित्र है। परन्तु बुद्ध का कोई चित्र नहीं है। हुविष्क के समय रुद्रदामन ने सिन्ध प्रान्त जीतकर कुषाणों को वहाँ से भगा दिया था। परिणाम यह हुआ कि सिन्धु नदी की निचली पाटी से उसका अधिकार शीघ्र ही समाप्त हो गया और राजनैतिक दृढ़ता भी समाप्त हो गई। इसके अतिरिक्त उसने भारतीय एवं हिन्दुकुश के दक्षिण का साम्राज्य सुरक्षित रखा। उसके सिक्कों में लिपि तो ग्रीक है परन्तु भाषाक नहीं है। इसने सन् 182 ई. तक शासन किया।

कुषाणों के शासनकाल में व्यापार और उद्योग धन्धों में बड़ी उन्नति हुई। विदेशों से खूब व्यापार होता था। रोमन साम्राज्य से व्यापार के प्रमाण प्राप्त होते हैं। कनिष्क के शासनकाल में कुषाणों का साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया था और अनेक देशों से इसकी सीमायें स्पर्श करने लगी थी। इसके फलस्वरूप मिस्र, ईरान, खोतान, चीन, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान और तिब्बत आदि देशों से खूब व्यापार होता था। रोमन साम्राज्य को प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में रेशम और सूत के वस्व, गरम मसाले, रत्न और आभूषण, हाथी दाँत से बनी वस्तुएँ तथा श्रृंगार के सामान भेजे जाते थे। इसके विनिमय में भारत को स्वर्ण मिलता था। रोम से भी बड़ी मात्रा में स्वर्ण भारत आता था।

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