खिज्र खाँ कौन था? उसकी उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।

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खिज्र खाँ कौन था?- तुगलक वंश के पतन के पश्चात् दिल्ली के तख्त पर सैयद राजवंश का उदय हुआ। यद्यपि सैयद वंश का उद्भव एवं विकास इतिहास में अनुमान मात्र पर आधारित है। सैयद वंश के संस्थापक खिन खाँ के बारे में इतिहासकार माया का कथन है कि वह मुहम्मद साहब के वंश से सम्बद्ध था, असत्य प्रतीत होता है। खिज्र खाँ का परिवार अरब से आकर मुल्तान में बस गया था, जहाँ हामिक मलिक मर्दान दौलत ने खि खाँ के पिता सुलेमान को गोद लिया था। मलिक मर्दान की मृत्यु के पश्चात् उनका पुत्र मलिक शेख मुल्तान का हाकिम हुआ, जिसके मरने के पश्चात् सुलेमान उस पद पर बैठा। सुलेमान की मृत्यू पर मुल्तान का शासन खित खाँ को सौंपा गया। खिन खाँ 1395 ई. तक इस पर शासन किया, इसके बाद मलिक मल्लू इकबाल के भाई सारंग खाँ ने खिच खाँ को मुल्तान से भगा दिया। खि 1398 ई. में तैमूर की सेना में शामिल हो गया। तैमूर ने भारत से वापस लौटते समय खिग्र को मुल्तान, दीपालपुर और लाहौर का सुबेदार बनाया।

दिल्ली विजय महमद शाह तुगलक के अन्तिम वर्षों में दिल्ली में अराजकता फैल गयी। जिसका लाभ वि खाँ ने उठाया और अपनी सेना एकत्रित करके 1414 ई. में दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। उसने दौलत खाँ से दिल्ली छीन ली और दिल्ली का प्रथम सैयद सुल्तान बना। परन्तु दिल्ली पर अधिकार करने के पश्चात् भी उसने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित नहीं किया और न ही सुल्तान की उपाधि धारण की। वह अपनी पूर्व की उपाधि रैयत-ए-आला से ही संतुष्ट था। दिल्ली में खिन ने तैमूर के प्रतिनिधि के तौर पर ही खुतबा पढ़ावाया, सिक्का चलाया और कर लिया। इससे यह स्पष्ट है कि दिल्ली पर अधिकार होने के बाद भी खित खाँ ने स्वयं को तैमूर के अधीनस्थ प्रतिनिधि ही माना।

शासनकाल की मुख्य घटनाएँ

जब खिम खाँ गद्दी पर बैठा तो दिल्ली की आन्तरिक तथा वाह्य अत्यधिक शोचनीय थीं। दिल्ली की अवस्था भी बड़ी शोचनीय थी और सल्तनत के सरदार विभिन्न दलों में विभक्त होकर शक्ति प्राप्त करने तथा अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने में संलग्न थे। दोआब के हिन्दू सरदारों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की स्थापना कर राज्य को कर देना स्थगित कर दिया था। मालवा, गुजरात तथा जौनपुर के सुल्तान स्वतंत्र रूप से सत्तारूढ़ होकर शासन कर रहे थे और उनके समीप के पड़ोसी राज्य से भीषण संघर्ष हुआ करते थे। उत्तरी सीमा की स्वतंत्र खोखर जाति मुल्तान तथा लाहौर पर अपनी छोटी-छोटी टुकड़ियों में धावा कर वहाँ की सुख तथा शान्ति भंग करने में तल्लीन थीं खि खाँ ने इन समस्त परिस्थितियों का बड़ी वीरता तथा अदम्य साहस साथ सामना किया, जिसके कारण उसकी गणना अच्छे तथा योग्य शासकों में होती है।

खिज्र खाँ की उपलब्धियां

खितखों की उपलब्धियों का विवरण इस प्रकार है-

(1) विद्रोहों का दमन

खिन खाँ दिल्ली सल्तनत का वैभव व शक्ति पुनः स्थापित करना चाहता था। अतः उसने पंजाब तथा दिल्ली को मिलाकर राज्य करना आरम्भ किया और राज्य के विरुद्ध हो रहे निम्नलिखित विद्रोहों का दमन किया-

  • कटेहर तथा दोआब के विद्रोह का दमन जब कटेहर और दोआब में विद्रोह का विस्फोट हुआ तो खिज्र खाँ ने इसकी ओर पूर्ण ध्यान दिया और कटेहर तथा दोआब के विद्रोहों का दमन करने में वह पूर्णरूपेण सफल हुआ। उसने ताजुल्मुल्क के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। भीषण युद्ध के उपरांत ताजुल्मुल्क की विजय हुई और वह बड़े गौरव और गर्व के साथ दिल्ली लौटा। उसने कटेहर के हरिसिंह एवं बदायूँ इटावा तथा काम्पिल के राजाओं को पराजित किया तथा उनको दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार करने पर बाध्य किया। इसके पश्चात् भी विद्रोह हुए परंतु उनका निर्दयता से दमन कर दिया गया। उसने दोआब में कटेहर, बदायूँ में महावत खाँ और इटावा में राजपूत सरदारों के
  • विद्रोहों का दमन करके देश में शांति स्थापित की।
  • सरंग खाँ ने जब सरहिन्द पर आक्रमण किया उसको भी पराजित कर दिया गया।
  • इसके पश्चात् जब मेवात तथा ग्वालियर के विद्रोह हुए तो उसने उनका भी बुरी तरह से दमन किया।

(2) खिज्र खाँ की विजयें

खिज्र खाँ की प्रमुख विजयें निम्नलिखित थीं-

(क) खिज्र खाँ की सरहिन्द विजय सुल्तान की सेना ने सन् 1319 ई. में सरहिन्द पर आक्रमण किया तथा वहाँ के विद्रोहियों का बुरी तरह से दमन किया।

(ख) गुजरात विजय- सन् 1412 ई. में उसने गुजरात पर आक्रमण किया और सेना के साथ स्वयं भी युद्ध भूमि में गया। गुजरात के शासक ने उसके सीमांत प्रदेशों पर आक्रमण किया जिस पर सुल्तान खिन खों ने भी उस पर आक्रमण किया।. गुजरात का सूबेदार पराजित हुआ।

(ग) ग्वालियर तथा बयाना विजय सन् 1416 ई. में खिज्र खाँ ने ग्वालियर तथा बयाना के समीपस्थ प्रदेशों के राज्यों पर आक्रमण किया और वहाँ के राजाओं को अपने आधीन करके उनके वार्षिक कर प्राप्त किया। यह सुल्तान की एक महत्वपूर्ण विजय समझी जाती है।

(घ) मेवातियों पर आक्रमण सन् 1421 ई. में खिल खाँ ने मेवातियों पर भी आक्रमण किया और यहाँ के विद्रोहियों को भी बुरी तरह से दमन करके शांति स्थापित की।

सैय्यद वंश के खिज्र खाँ का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

खिज्र खाँ की मृत्यु

सन् 1421 ई. में जब वह दिल्ली की ओर वापस आ रहा था तब मार्ग में वह बीमार हो गया तथा 20 मई सन् 1421 ई. में उसका देहांत हो गया। इस प्रकार खिज्र खाँ एक योग्य शासक तथा कुशल सेनापति था। वह एक वीर और साहसी योद्धा के रूप में सर्वगुण सम्पन्न था। उसमें एक सैनिक के सभी ही गुण थे जिनके कारण उसको सफलता प्राप्त हुई। वह एक छोटे से पद से शासक बन गया यह बात उसकी महानता को पुष्ट करती है। यह एक स्वामिभक्त सुल्तान था, जिसने अपने स्वामी के लिए नगर दुर्ग पर विजय प्राप्त की। एक योग्य सेनानायक होते हुए भी उसको साहित्य से प्रेम रहा। कला में उसकी रूचि अधिक थी यह सुल्तान प्रजाप्रिय था। उसने देश में शांति स्थापित की और उसकी रक्षा भी की इसी कारण इतिहासकार उसकी प्रशंसा करते हैं।

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