कर्म के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।

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कर्म के सिद्धांत – हिन्दू जीवन-दर्शन में वेदों से लेकर स्मृतियों तक में कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त का व्यापक उल्लेख मिलता है। इस सिद्धान्त को स्पष्ट करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म तथा पुनर्जन्म दो पृथक सिद्धान्त नहीं हैं बल्कि इनके बीच वही सम्बन्ध है जो एक बीज तथा उससे उत्पन्न होने वाले पौधे के मध्य पाया जाता है। मूल रूप से यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि कर्म का प्रभाव जन्म-जन्मान्तर से सम्बद्ध है और कोई भी व्यक्ति कर्म-फल के प्रभाव से बच नहीं सकता। कर्म के विचार का आरम्भ वेदों से होता है जिसे उपनिषदों में सिद्धान्त का रूप दिया गया और बाद में महाभारत, गीता तथा स्मृतियों में अनेक घटनाओं के उदाहरणों द्वारा इसकी पुष्टि की गयी।

सर्वप्रथम वेदों में यह उल्लेख मिलता है कि आत्मा अमर है और शरीर नाशवान है। इसी आधार पर वैदिक मन्त्रों की अनेक ऋचाओं में व्यक्ति के लिए अमरत्व की कामना की गयी। और साथ ही पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा पाने के लिए सकमों को महत्व दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वेदों में ‘कर्म’ का सम्बन्ध प्रमुख रूप से पुरुषायों को पूरा करने से है, क्योंकि वेदों में कर्म और कर्म-फल का उल्लेख होने के बाद भी आवागमन और पुनर्जन्म की धारणा को कर्म से नहीं जोड़ा गया है। इस प्रकार यह कहना उचित होगा कि भारतीय चिन्तन के आरम्भिक स्तर में कर्म का तात्पर्य एक विशेष परिस्थिति में व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य को पूरा करने से था, दैव अथवा भाग्य से नहीं। श्री प्रभु ने यद्यपि अनेक पौराणिक उदाहरणों के द्वारा इसे भाग्य से जोड़ने का प्रयत्न किया है लेकिन यह एक बाद की धारणा है।

उपनिषदों में सबसे पहले कर्म के साथ आवागमन और पुनर्जन्म की धारणाओं को जोड़कर वैदिककालीन कर्म की अवधारणा को एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस समय यह स्पष्ट किया गया कि कर्मों के अनुसार व्यक्ति को परलोक में सुख-दुःख ही नहीं मिलता। बल्कि उसे इन्हीं कर्मों के अनुसार संसार में बार-बार जन्म भी लेना पड़ता है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा शरीर को त्याग देता है लेकिन व्यक्ति द्वारा किये कर्मों का संचित फल आत्मा को प्रभावित किये रहता है। व्यक्ति ने जैसे कर्म किये हैं उन्हीं के फल के अनुसार यह आत्मा व्यक्ति के पुनर्जन्म के रूप को निर्धारित करती है। कर्म और पुनर्जन्म के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए याज्ञवल्क्य का कथन है कि “मानव का भावी जीवन उनके कर्मों से निर्धारित होता है। शुभ कर्मों का फल शुभ होता है और अशुभ कर्मों का फल भी अशुभ होता है। ….. जिस प्रकार एक टिड्डा घास की पत्ती का किनारा तभी छोड़ता है जबकि वह दूसरी पत्ती को पकड़ लेता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर का त्याग तभी करती है।

जब उसे दूसरे शरीर का संबल प्राप्त हो जाता है।” इस प्रकार व्यक्ति के कर्मों के अनुसार आत्मा बार-बार जन्म लेती रहती है। कठोपनिषद में तो यहां तक कहा गया है कि “अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार आत्मा निश्चल योनि अर्थात् पेड़ और पौधों के रूप तक में जन्म ले सकती। है। उपनिषदों में कर्म फल और पुनर्जन्म की ही व्याख्या नहीं की गयी बल्कि जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाने के उपायों को भी स्पष्ट किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद में उल्लेख है। कि जो व्यक्ति इच्छारहित है, यज्ञों का निर्वाह करते हैं और ज्ञानी है उन्हें आवागमन के इस चक्र से छुटकारा मिल जाता है। इस प्रकार उपनिषदों में कर्म के साथ लौकिक और पारलौकिक दोनों तरह के विश्वासों को जोड़ दिया गया। इसका तात्पर्य है कि एक ओर कर्मों के अनुसार व्यक्ति को इस संसार में बार-बार जन्म लेना पड़ता है और दूसरी ओर की ज्ञान प्राप्ति से अथवा ज्ञानयुक्त कर्मों से व्यक्ति ‘ब्रह्म’ को प्राप्त कर सकता है।

महाभारत में कर्म के सिद्धान्त की व्याख्या प्रमुख रूप से वर्ण व्यवस्था के औचित्य को सिद्ध करने के लिए की गयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय तक निम्न वर्ण के सदस्यों में यह असन्तोष फैल चुका होगा कि जब कर्म के आधार पर ही व्यक्ति को सभी सुख-दुःख प्राप्त होते हैं तब अपने दायित्वों का पूरी निष्ठा से पालन करने के बाद भी उन्हें समाज में निम्न स्थिति क्यों मिली हुई है? इन परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय करने के लिए यह विश्वास दिलाया गया कि वर्तमान जीवन के सुख अथवा दुःख इस जीवन के कर्मों का ही परिणाम नहीं है बल्कि पूर्वजन्म के कर्मों का भी ‘प्रारब्ध’ के रूप में, हमारी वर्तमान स्थिति से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

इस प्रकार महाभारत के अनुसार पूर्व जन्म के कर्मों (प्रारब्ध) को ही व्यक्ति के स्वभाव, जीवन की सफलताओं क तथा सामाजिक स्थिति का निर्धारक कारक माना जाना चाहिए। श्री प्रभु ने इसके स्पष्टीकरण के लिए महाभारत के कुछ अंशों को उद्धृत करते हुए कहा है कि पूर्व जन्म के संचित कर्म ही व्यक्ति के सुख-दुःख का कारण है, यही कर्म व्यक्ति की वर्तमान योनि का निर्धारण करते हैं और वह प्रारब्ध का ही परिणाम है कि इस जीवन में सज्जन को दुःख और दुर्जन को सुख मिल जाये ।

महाभारत के वनपर्व में कहा गया है कि “पूर्व जन्म में किये गये कर्मों का फल इस जीवन में अवश्य भोगना पड़ता है…. जो व्यक्ति कर्म के सिद्धान्त से अनभिज्ञ हैं वे यह नहीं जानते कि उनके दुःख उनके ही अशुभ कर्मों के परिणाम हैं।” इस प्रकार महाभारत में व्यक्ति के भाग्य को पूर्णतया उसके पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही स्पष्ट किया गया।

गीता के अन्तर्गत कर्म के सिद्धान्त को सबसे अधिक विशद और वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया गया। वैदिक परम्परा और उपनिषदों में कर्म से सम्बन्धित जो विचार प्रतिपादित हुए थे, गीता में उन्हें कहीं अधिक व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करके एक अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। महाभारत में जहां इस बात पर बल दिया गया था कि पूर्व जन्म में व्यक्ति ने जैसे कर्म किये हैं उसी के फल इस जन्म में प्राप्त हो रहे हैं, वहीं गीता में व्यक्ति के वर्तमान जीवन के कर्मों को प्रारब्ध की अपेक्षा अधिक महत्व दिया गया। गीता में कर्म के सिद्धान्त का सार हैं। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचत् । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वास्तविक कर्मयोग यह है कि व्यक्ति कर्म करने में ही अपना अधिकार समझे, कर्मफल की आशा न करे। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को उतारकर नए वस्त्रों को धारण करता रहता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती रहती है। इस प्रकार जन्म और मृत्यु की चिन्ता न करके व्यक्ति स्वधर्म का पालन करता रहे, यही वास्तविक कर्म है। व्यक्ति को अपने कर्म का फल अवश्य मिलता है। यदि एक जन्म में कर्म फल से सिद्धि नहीं मिलती तो दूसरे जन्म में मिलेगी और व्यक्ति सदैव कर्म में ही आस्था रखेगा तो उसे किसी न किसी समय सद्गति अवश्य मिलेगी। गीता में कर्म की धारणा को ‘कर्म’, ‘अकर्म’ और ‘विकर्म’ की धारणाओं के द्वारा भी स्पष्ट किया गया।

यद्यपि निवृत्तिवादियों का विचार है कि सभी कर्मों को छोड़ देना ही अकर्म है, लेकिन गीता के अनुसार अकर्म का तात्पर्य निष्काम कर्म करने से है क्योंकि कर्मों को पूर्णतया छोड़ देना तो मनुष्य के लिए क्या, स्वयं ईश्वर के लिए भी सम्भव नहीं है। इस प्रकार अकर्म ही वास्तव में सात्विक कर्म है। जिन कर्मों को व्यक्ति लोभ अथवा मोह के कारण छोड़ देता है उन्हें हम ‘विकर्म’ कहते हैं। इस प्रकार निष्काम कर्म, ज्ञान और भक्ति ही वह त्रिवर्ग है जिसके माध्यम से व्यक्ति जन्म और पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। वास्तव में कर्म तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है, यह एक बन्धन नहीं है बन्धन तो कर्मफल के प्रति व्यक्ति की आसक्ति और मोह है। व्यक्ति ज्ञान और भक्ति के द्वारा जब इन बन्धनों से छूट जाता है तभी वह ब्रह्म को प्राप्त करता है। व्यक्ति जब कर्म-फल में आसक्ति छोड़ देता है, तभी उसमें सभी प्राणियों और सभी परिस्थितियों के प्रति समता के भाव का विकास होता है। यही वास्तविक कर्मयोग है और यही पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा पाने का एकमात्र आधार है।

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मनुस्मृति में कर्म की व्याख्या केवल जन्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के सन्दर्भ में ही नहीं की गयी है बल्कि इसके अन्तर्गत सभी तरह के कर्मों के फल निर्धारित करके और जैन धर्म हिन्दू धर्म के अनेक पक्षों के कटु आलोचक होते हुए भी कर्म के सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि कर्म का सिद्धान्त जैन और बौद्ध धर्मों में भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए हैं जितना कि हिन्दू धर्म में इस सिद्धान्त की व्यावहारिकता से मैक्स वेबर तो इतने अधिक प्रभावित थे कि आपके अनुसार “कर्म के सिद्धान्त ने सम्पूर्ण संसार को एक बुद्धिवादी तथा नैतिक व्यवस्था में परिणित कर दिया. इस प्रकार यह सिद्धान्त सम्पूर्ण इतिहास में सबसे अधिक सन्तुलित ईश्वरीय विश्वास का प्रतिनिधित्व करता है।”

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