जेम्स द्वितीय का चरित्र एवं कार्यों का उल्लेख कीजिए।

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जेम्स द्वितीय का चरित्र 1685 ई. में अपने बड़े भाई चार्ल्स द्वितीय के मृत्युपरान्त गद्दी पर बैठा। वह अपने बड़े भाई चार्ल्स द्वितीय के समान विवेक और दूरदर्शिता नहीं थी। चार्ल्स द्वितीय ने अपनी चतुरता तथा षडयंत्रों से सफलता प्राप्त की थी। उसने अपने विलासी और लापरवाह जीवन के बाह्य आवरण में अपनी निरंकुशता तथा महत्वाकांक्षा को छिपाकर रखा था। इससे वह पार्लियामेन्ट के साथ संघर्ष से बच गया था और उसने अपने विरोधियों का दमन उसी समय किया जब वे दुर्बल होते थे। जेम्स स्पष्ट वक्ता था। वह अपने उद्देश्यों को कभी छिपाने का प्रयत्न नहीं करता था। उसके चरित्र में अने पिता चार्ल्स प्रथम के समान दृढ़वादिता थी। यह संकीर्ण विचारों का था। उसमें यह क्षमता नहीं थी कि किसी समस्या पर यह व्यापक रूप से विचार कर सकता। चार्ल्स प्रथम के समान वह दूसरों के विचारों को समझने का कभी प्रयत्न नहीं करता था। वह एक निष्ठावान कैथोलिक था। उसे अपने धर्म में पूर्ण श्रद्धा थी। चार्ल्स प्रथम के समान उसका जीवन अनैतिकतापूर्ण नहीं था। इस धार्मिक कट्टरता के कारण सभी उसके विरोधी बन गये और उसे 1688 ई. में इंग्लैण्ड छोड़कर भागना पड़ा। वारन और मार्टिन ने लिखा है, “जेम्स एक धर्मान्ध व्यक्ति था जो विचारों में अतिवादी था। वह एक उत्साही रोमन कैथोलिक था जो उससे सहमत नहीं होते थे उन्हें वह नास्तिक समझता था। यह निरंकुश राजतंत्र में विश्वास रखता था और जो इसका विरोध करता था उसको वह विद्रोही समझता था।”

कैथोलिक होने के कारण जेम्स के उत्तराधिकार के बारे में बहुत विवाद हुआ था। लेकिन गद्दी पर बैठने के बाद सभी वर्गों ने उसका स्वागत किया था। बहुतों को उससे सहानुभूति भी थी। बहुतों की धारणा थी कि उत्तराधिकार ईश्वर द्वारा निर्धारित होता था और मनुष्य उसे बदल नहीं सकता था। लोगों का विश्वासा था कि जेम्स द्वितीय अपने कैथोलिक विचारों को देश पर नहीं पोपेगा। यही भावना चर्च में थी और चर्च ने उसे अपना प्रमुख स्वीकार कर लिया था। लेकिन जेम्स ने जनता की इस उदारता तथा सहानुभूति को गलत समझा। उसने समझा कि जनता उससे भयभीत थी और जनता ने राजा के देवी अधिकारों को स्वीकार कर लिया था। चार्ल्स द्वितीय ने प्रत्यक्ष रूप से कैथोलिक धर्म की स्थापना आरम्भ की। यह जनसाधारण की आकांक्षाओं की उपेक्षा थी। इससे जनता उसके विरुद्ध हो गई।

जेम्स के कार्य

इसके द्वारा किये गये पमुख कार्य निम्नलिखित हैं।

(1) मन्मथ के विद्रोह का दमन करने में उसने जघन्य क्रूरता का प्रदर्शन किया। मन्मथ चार्ल्स द्वितीय का अवैध पुत्र था। वह प्रोटेस्टेन्ट था। रिंग दल ने उसके उत्तराधिकार का समर्थन किया था। जेम्स के राज्याभिषेक के पश्चात उसने विद्रोह करके प्रोटेस्टेन्ट लोगों की सहायता से सिंहासन प्राप्त करने का प्रयत्न किया। इस विद्रोह का निर्दयता से दमन किया गया। मन्मथ तथा उसके समर्थक यूक ऑफ अरगाइल को कत्ल कर दिया। विशेष न्यायाधीश जेफ्रे ने उसके 300 समर्थकों को मृत्यु दंड दिया और उनकी लाशों को सड़कों पर टांग दिया गया। 800 व्यक्तियों को देश निकाला दिया गया।

(2) जेम्स का पार्लियामेन्ट से भी झगड़ा हो गया। पार्लियामेन्ट की दूसरी बैठक होने पर जेम्स ने दो मांगे प्रस्तुत की। प्रथम विद्रोहों का दमन करने के लिए उसे स्थायी सेना रखने दी जाए। द्वितीय, इस सेना के व्यय के लिए 7 लाख पौण्ड स्वीकृत किये जायें। जेम्स ने सेना तैयार कर ली थी और कैथोलिक अधिकारी भी नियुक्त कर दिये थे। पार्लियामेन्ट ने इन मांगों का विरोध किया। इस पर जेम्स ने पार्लियामेन्ट को भंग कर दिया और उसे फिर कभी नहीं बुलाया।

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(3) जेम्स ने टेस्ट एक्ट का व्यापक रूप से उल्लंघन किया। इस एक्ट के अनुसार किसी भी कैथोलिक को राज्य के किसी पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता था। टोरी पार्टी राजा की समर्थक थी लेकिन वह भी इस एक्ट का उल्लंघन स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। परम्परा के अनुसार राजा को किसी कानून को निलम्बित करने या उससे छूट देने का अधिकार था लेकिन इस अधिकार का प्रयोग अपवाद रूप में होता था। जेम्स द्वितीय ने इसका व्यापक प्रयोग करके मंत्री, न्यायाधीश, कार्पोरेशन के सदस्य व मेयर और सेना के उच्च पद पर कैथोलिकों की नियुक्तियों की कैथोलिक खुले रूप से ‘मास’ का आयोजन करने लगे। जेम्स ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के कुलपति को हटा दिया क्योंकि उसने एक कैथोलिक को उपाधि देना अस्वीकार कर दिया था। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कैथोलिकों ने धर्म प्रचार तथा प्रार्थना आरम्भ कर दी। क्राइस्ट चर्च कालेज और मेगडानेल कालेज में जेम्स ने कैथोलिक शिक्षकों की नियुक्ति की

(4) 1687 ई. में जेम्स के अनुग्रह की घोषणा की। इस घोषणा के अनुसार कैथोलिकों और डिसेन्टरों को कठोर कानूनों से मुक्त कर दिया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गयी। इस घोषणा का व्यापक विरोध किया गया। अनेक अधिकारियों ने इस घोषणा को मानने से इंकार कर दिया और अनेक पदाधिकारियों ने त्याग पत्र दे दिया। इस घोषणा का सात पादरियों ने खुले रूप से विरोध किया। उन्हें बंदी बनाया गया तथा उन पर मुकदमा चलाया गया। लेकिन न्यायाधीशों ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया। जनता ने उन पादरियों का उत्साह से स्थान-स्थान पर स्वागत किया तथा प्रसन्नता व्यक्त की।

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