जनजातीय परिवार से आप क्या समझते हैं? इन परिवारों की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

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जनजातीय परिवार (Family in Tribes )– परिवार को इसके उद्देश्यों के आधार पर यद्यपि अनेक प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है, लेकिन जनजातीय जीवन में ‘परिवार’ शब्द का उपयोग एक विशिष्ट अर्थ में किया जाता है। इस अर्थ में जनजातीय परिवार का रूप पूर्णतया संस्थात्मक (institutional) है जिसके द्वारा दो विषम लिंग के व्यक्तियों को यौन सम्बन्धों की स्वीकृति दी जाती है और साथ ही उनसे सन्तान की उत्पत्ति, पालन-पोषण तथा सांस्कृतिक प्रतिमानों के संचरण की प्रत्याशा (expectation) की जाती है। इस प्रकार जनजातियों में प्रत्येक व्यक्ति मूल रूप से दो परिवारों का सदस्य होता है-एक तो वह जिसमें उसका जन्म हुआ है, और दूसरा वह जिसमें वह स्वयं बच्चों को जन्म देता है अथवा भविष्य में जन्म देगा।

मॉर्गन (L. Morgan) ने यद्यपि एक ऐसे सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है जिसके अनुसार प्रारम्भ में विवाह की कोई निशित पद्धति न होने के कारण (यौन साम्यवाद की स्थिति) परिवार

जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन यह कथन बिलकुल भी तर्कसंगत नहीं है। ऐसी कोई भी जनजातीय संस्कृति नहीं है जिसमें किसी भी स्तर पर परिवार एक महत्वपूर्ण संस्था न रहा हो। यह दूसरी बात है कि परिवार की सत्ता कभी वियों के हाथ में रही, तो कभी पुरुष के हाथ में, लेकिन मनुष्य की कुछ मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा न कर सकने के कारण परिवार का अस्तित्व सदैव से रहा है। जनजातियों के एक विशेष भौगोलिक पर्यावरण मित्र सांस्कृतिक मूल्यों और यौन के क्षेत्र में अधिक स्वतन्त्र वातावरण के कारण उनके परिवारों का रूप कुछ मित्र अवश्य है, लेकिन इसे एक विघटित पारिवारिक व्यवस्था नहीं कहा जा सकता।

जनजातीय परिवारों की सामान्य विशेषताएं

जनजातियों की सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था सभ्य समाजों से बहुत कुछ भिन्न होने के कारण उनके परिवार की संरचना, नियमों तथा अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्धों में कुछ विशिष्ट तत्वों का समावेश हैं। इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत विवेचना में जनजातीय परिवारों की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में समझना आवश्यक हो ही जाता है-

(1 ) संस्थात्मक प्रकृति (Institutional Nature)

जनजातीय अथवा आदिम परिवारों की प्रकृति बहुत कुछ संस्थात्मक है। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक परिवार में जहां उपभोग और उत्पत्ति का कार्य करना आवश्यक समझा जाता है। वहीं परिवार में ऐसे कार्यों को विशेष महत्व दिया जाता है जिससे जनजाति की सांस्कृतिक विशेषताओं को स्थायी बनाये रखा जा सके। दूसरे शब्दों में, परिवार संस्कृति की निरन्तरता का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

(2) स्वरूप में विशिष्टता (Diversity in Types)

जनजातीय परिवारों में विभिन्न आधारों पर एक स्पष्ट विभिन्नता दिखायी देती है। किसी जनजाति में परिवार का आकार बहुत छोटा है तो किसी में बहुत विस्तृत। यहां परिवार की स्थापना केवल एकविवाह के द्वारा ही नहीं होती बल्कि बहुपति विवाह तथा बहुपत्नी विवाह के द्वारा भी परिवार की स्थापना की जाती है। उदाहरण के लिए, भारत की गोंड, बैगा, टोडा तथा कुछ नागा जनजातियों में एक पुरुष अनेक स्वियों से विवाह सम्बन्ध स्थापित करके परिवार की स्थापना करता है जबकि खस, नीलगिरि पर्वत के ‘टोडा’, केरल की ‘टियान’ तथा मालाबार की ‘कम्मल’ जनजाति में एक स्वी अनेक पुरुषों से विवाह करके परिवार की स्थापना करती है। इसके पज्ञात भी अधिकांश जनजातियों में एक विवाह ही परिवार का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। सत्ता के आधार पर जनजातीय परिवार मातृ सत्तात्मक तथा पितृ सत्तात्मक जैसे दो प्रमुख भागों में विभाजित हैं। सभ्यता के सम्पर्क के कारण आज अधिकांश जनजातीय परिवारों में वंश का नाम पितृ पक्ष से सम्बन्धित हो गया है लेकिन भारत की खासी और गारो जनजाति तथा मालाबार के नायरों में वंश का नाम मातृ-पक्ष से चलता है, पिता के पक्ष से नहीं।

(3) स्त्रियों की उच्च स्थिति (Higher Status of Women)

परिवार में स्थियों की स्थिति के दृष्टिकोण से भी जनजातीय परिवार सभ्य समाजों से बहुत कुछ भिन्न है। किसी जनजाति में परिवार का रूप चाहे पितृ सत्तात्मक ही क्यों न हो लेकिन ऐसी कोई जनजाति नहीं मिलेगी जिसमें व्यावहारिक रूप से स्त्रियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता हो। साधारणतया घर की देख-रेख समारोहों का आयोजन वस्तुओं का वितरण तथा धार्मिक क्रियाओं की पूर्ति स्त्रियों के द्वारा ही की जाती है। इन परिवारों में बच्चों को भी तुलनात्मक रूप से अधिक स्वतन्त्रता शप्त होती है तथा उनके समाजीकरण में स्थियों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है।

(4) उत्पादन की इकाई (Unit of Production)

जनजातीय परिवारों को उत्पादन की एक प्रमुख इकाई के रूप में देखा जाता है। इसका तात्पर्य है कि परिवार के सभी सदस्य मछली मारने, खेती करने अथवा किसी अन्य साधन से आजीविका उपार्जित करने के कार्य में लगे होते हैं। उनके बीच कार्यों का विभाजन बहुत कुछ आयु तथा लिंग के आधार पर होता है।

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(5) सामूहिकता का आधार (Basis of Collectivity)

सामाजिक तथा कार्यात्मक दृष्टिकोण से जनजातीय परिवार एक समन्वित इकाई है जिसमें व्यक्तिवादिता का अधिक प्रभाव नहीं हो सका है। जनजातियों की संस्कृति भी बच्चों को ऐसी शिक्षाएं देती है जिससे वे एक-दूसरे के प्रति अपने अत्यधिक दायित्वों को पूरा कर सकें तथा अपने समूह को संगठित रख सकें।

(6) भावनात्मक विशिष्टता (Emotional Pecnliarty)

साधारणतया यह समझा जाता है कि पति-पत्नी के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का दृढ़ होना बहुत कुछ यौन सम्बन्धों पर निर्भर होता हैं। जनजातीय परिवारों की यह विशेषता है कि यहां विवाह से पूर्व तथा विवाह के बाद स्त्रियों और पुरुषों को यौन के क्षेत्र में काफी स्वतन्त्रता मिलने के बाद भी परिवार भावानात्मक रूप से दुर्बल नहीं होते। इसका कारण जनजातियों में कुछ ऐसी सांस्कृतिक तथा व्यवहार सम्बन्धी विशेषताएं हैं जो परिवार के सदस्यों को भावनात्मक रूप से बांधे रखती है।

(7) सामाजिक स्थिति प्रदान करने का आधार (Basis of Status Ascription)

जनजातियों में परिवार व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति की प्रतिष्ठा तथा सम्मान उसके व्यक्तिगत प्रयत्नों से अधिक सम्बन्धित नहीं होती बल्कि इसका निर्धारण बहुत कुछ उसके परिवार की प्रतिष्ठा के आधार पर होता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार की प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए अधिक से अधिक प्रयत्नशील रहता है।

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