जाति एवं राजनीति पर एक निबन्ध लिखिए।

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जाति एवं राजनीति पर निबन्ध – प्राचीन भारतीय समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। वर्णव्यवस्था पर आधारित समाज चार वर्णों में विभक्त था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद वर्णों के विभाजन का आधार जन्म न होकर कर्म था। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-चातुवर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । अर्थात् चारों वर्णों की सृष्टि गुणों एवं कर्मों के अनुसार की गई। समाज का वर्णव्यवस्था पर आधारित होने के पीछे मूल उद्देश्य यह था कि समाज व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे एवं साथ ही साथ सामाजिक समरसता भी बनी रहे। यदि समाज के सभी वर्षों के लोग अपना निर्धारित कार्य करेंगे तो उनमें किसी भी प्रकार की टकराहट नहीं होगी एवं समाज अपने उद्देश्य लोक कल्याण की सहज ही पूर्ति कर लेगा।

इस वर्ण व्यवस्था में विकृति तब आयो जब वर्ण-व्यवस्था का आधार कर्म आधारित न होकर जन्म आधारित बना दी गयी। इस वर्ण-व्यवस्था के चलते तीन वर्षों ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को उच्च दर्जा दिया गया तथा शूदों को इनका सेवक घोषित किया गया। यही वर्ण-व्यवस्था मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक जारी है। वर्ण-व्यवस्था ने ही प्रकारान्तर में चलकर जाति का रूप ले लिया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय ही जातिवादी राजनीति का थोड़ा-थोड़ा असर दिखने लगा था। जब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने निम्न जातियों को आरक्षण दिलाने के लिए आन्दोलन छेड़ दिया जिसका शमन पूना पैक्ट के रूप में सामने आया। फिर भी स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व तक जातिवादी राजनीति का विकृत रूप सामने नहीं आया था।

स्वतन्त्रता के बाद केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी। वैसे कांग्रेस जिसने स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्पूर्ण देश की नुमाईंदगी की थी, परन्तु कुछ दशक के बाद वह रास्ते से भटक गयी। तुष्टिकरण की जो प्रक्रिया धर्म विशेष के साथ चली, यही अनुकरण देश में दूसरी विपक्षी पार्टियों, जो अब तक हाशिए पर थी, ने दूसरे संवेदनशील मुद्दों यथा जाति, अगड़े-पिछड़े आदि को छूना शुरू किया।

जातिवादी राजनीति मुख्यतः नब्बे के दशक में प्रारम्भ हुई। केन्द्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार आयी। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बहुत दिनों से लम्बित मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया, जिसमें सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी। यद्यपि मण्डल कमीशन की रिपोर्ट संविधान सम्मत थी, फिर भी गलत समय पर सही पहल थी। संविधान के अनु. 16(4) में कहा गया है राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के आधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी।

अनु. 15 (4) के अनुसार राज्य सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष उपबन्ध कर सकेगा। इसी अनुच्छेद के आधार पर पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया गया। धीरे-धीरे कतिपय राजनेताओं द्वारा कुछ जाति विशेष के लोगों को फायदा पहुँचाने का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रलोभन दिया। ऐसे देश में जहाँ 40 प्रतिशत जनता निरक्षर हो, राजनेताओं, के बहकावे में आ गयी। राजनेताओं ने राजनीति को जातीय ढंग देना शुरू किया। यहीं से जातिवादी राजनीति सत्ता प्राप्ति का साधन बन गयी।

जातिवादी राजनीति के उदय के प्रमुख कारणों में एक कारण यह था कि सदियों से जो दलित, शोषित तबका था, उन्हें ऐसे में अपने रहनुमा का अक्श दिखा। एक ऐसी आशा की किरण जो उनकी स्थिति को सुधार सकती थी। इसी मृग मारीचिका के पीछे एक जाति- विशेष के लोग एक विशेष राजनेता का समर्थन करने लगे और राजनेता उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने लगा।

जातिवादी राजनीति के उदय का दूसरा कारण था किसी सरकार द्वारा जाति विशेष के लोगों को संरक्षण प्रदान करना। इसके चलते उन्हें विभिन्न सरकारी/गैर सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाने लगा। इससे उनके अंदर यह भावना घर कर गयी कि उनके हित किसी जाति विशेष के साथ जुड़े हुए हैं एवं उन्हीं के साथ पूरे हो सकते हैं। इससे बड़ी बिडम्बना क्या हो सकती है कि इस जातिवादी राजनीति का कारण अशिक्षा कम, जातीय पूर्वाग्रह ज्यादा है। क्योंकि यह देखा जाता है। कि शिक्षित व्यक्तियों की अपेक्षा अशिक्षित व्यक्ति कुछ मायने में कम जातिवादी होता है। शिक्षित व्यक्ति भी अपनी सुरक्षा जातिवादी राजनीति में ही देखता है।

जातिवादी राजनीति के फलस्वरूप कहीं ब्राह्मण महासभा का गठन हुआ है, कहीं क्षत्रिय सभा का और कहीं पिछड़ों का संगठन उभर कर सामने आ रहा है। राजनेता हैं कि अपनी राजनीति की रोटी इन्हीं सामाजिक वैमनस्यता को हवा देकर सेंक रहे हैं। उन्हें सत्ता तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ी की आवश्यकता है। यह सीढ़ी जातिवादी राजनीति के द्वारा आसानी से मिल जाती है। सत्ता पर काबिज होने के बाद जबकि वे अपनी जाति को ही नजर अन्दाज करना शुरू कर देते हैं।

जातिवाद की राजनीति से राष्ट्रीयता की भावना को गहरी क्षति पहुँचती है, क्योंकि समाज में जातीय हित के सम्मुख राष्ट्रीय हित गौण हो जाते हैं। इससे देश की एकता एवं अखण्डता को खतरा पैदा हो जाता है।

जातिवाद की राजनीति से समाज में विभिन्न जातियों के मध्य राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए एक गलाकाट प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है जिसका परिणाम हत्या आगजनी एवं विभिन्न विध्वंसात्मक कार्यों के रूप में होता है। हाल ही में हरियाणा में दलित बस्ती को आग लगा दी गयी, जो कि जातिवाद की राजनीति का एक नंगा रूप एवं उदाहरण है।

जातिवादी राजनीति कुछ विशेष वर्ग के लोगों को लाभ पहुँचाने का कार्य करती है। समाज के शेष अन्य लोग चाहे उनकी आर्थिक स्थिति क्यों न खस्ताहाल हो, आर्थिक लाभ पानेnसे वंचित रह जाते हैं। इससे आर्थिक असंतोष पैदा होता है जिससे विघटनकारी शक्तियों को पनपने का मौका मिल जाता है। यह देश के लिए शुभ लक्षण नहीं है।

आज जातिवाद की राजनीति प्रदेश स्तर से उठकर राष्ट्रीय स्तर पर भी व्याप्त हो गयी है। यह समस्या एक विकराल रूप धारण करके सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, बन्धुत्व की भावना एवं मूल्यों की राजनीति को समाप्त करने पर तुली हुई है। इस समस्या से निजात पाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी बात यह है कि इसके लिए कोई ऐसा कानून बनाया जाय जिससे जातिवाद की राजनीति करने वाले नेता एवं राजनीतिक दल चुनाव लड़ने से वंचित कर दिए जाएँ। इस कार्य में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका निर्धारक किस संस्था को बनाया जाय कि जो यह निर्धारित करे कि कौन जातिवादी राजनीति कर रहा है। इसके लिए सवर्धा योग्य संस्था चुनाव आयोग ही है।

जाति व्यवस्था की उत्पत्ति सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

दूसरी प्रमुख बात यह है कि लोगों को यह समझना होगा कि स्वार्थपरक राजनीति से ऊपर उठकर जब तक वे नहीं सोचेंगे तब तक न राष्ट्र का उत्थान होगा और न उनका स्वयं का। जब तक राष्ट्र की उन्नति को अपनी उन्नति एवं समृद्धि के साथ नहीं देखेंगे जातिवाद की राजनीति का खेल बदस्तूर जारी रहेगा और आम जनता इस घिनौनी राजनीति का शिकार होती रहेगी।

आम जनता को मूल्यों की राजनीति के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए क्योंकि मूल्यों की राजनीति ही लोगों का समग्र विकास कर सकती है। जातिवादी राजनीति तो शेर के पंजे के समान है जिसके गद्देदार मुलायम पंजों में नाखून छुपे होते हैं, जो हमें कभी भी रक्त रंजित कर सकते हैं। आज आवश्यकता है कि जातिवाद की राजनीति करने वाले भेड़िये की पहचान करने की तथा उसके राजनीतिक, सामाजिक बहिष्कार करने की। यदि उसका बहिष्कार नहीं किया गया तो हम उसके हृदय रूप से धोखा खाते रहेंगे तथा उसमें फँसकर अंधे कुएं में छलांग लगाते रहेंगे जो भयावह है।

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