हिन्दू विवाह के निषेध अथवा नियमों की विवेचना कीजिए।

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हिन्दू विवाह के निषेध अथवा नियम (Rules of Hindu Marriage) प्रत्येक समाज में विवाह से सम्बन्धित कुछ निषेध सम्बन्धी नियम होते हैं। हिन्दू समाज ने भी विवाह के क्षेत्र में अनेक निषेध अथवा प्रतिबन्ध लगाये हैं। इस सम्बन्ध में पी. एच. प्रभू लिखते हैं, “हिन्दू धर्मशास्त्रों में जीवन साथी के चुनाव को नियंत्रित करने की दृष्टि से हिन्दू विवाह को व्यवस्थित करने हेतु अन्तर्विवाह और बहिर्विवाह के कुछ नियम निर्धारित किये गये है।” हिन्दू विवाह से सम्बन्धित निषेध चार प्रकार के होते हैं-अन्तर्विवाह, बहिर्विवाह, अनुलोम तथा प्रतिलोम

(1 ) अन्तर्विवाह का नियम

अन्तर्विवाह वह विवाह है जिसके अनुसार एक व्यक्ति अपने समूह के अन्दर ही विवाह कर सकता है। हिन्दुओं में जाति अन्तर्विवाह प्रचलित है। हिन्दू समाज में एक व्यक्ति अपना विवाह अपनी जाति में ही कर सकता है। जाति से हमारा तात्पर्य केवल ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र से ही नहीं हैं। हिन्दू छोटे-छोटे समूहों में बंटे हुये हैं जिसे वे जाति कहते हैं। डॉ. एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, “जाति से मेरा अभिप्राय वेदों के अनुसार जातियों से नहीं है, किन्तु उपजाति से जो अन्तर्विवाह की वास्तविक इकाई है।” धर्मशास्त्र प्रत्येक हिन्दू को अपने वर्ण में ही विवाह करने का निर्देश देता है, किन्तु व्यावहारिक रूप में प्रत्येक वर्ण अनेक जातियों-उपजातियों में विभाजित है और ये उपजातियां पुनः अनेक भागों में विभक्त हैं। हिन्दू जाति उपजातियों से भी अधिक विभागों में बंटी हुई है और विवाह की इकाई के छोटे-छोटे समूह है। कपाड़िया ने इस सन्दर्भ में लिखा है-“हिन्दू समुदाय अनेक जातियों में विभक्त है जो अन्तर्विवाह के समूह हैं व्यवहार में जाति पुनः अनेक भागों में बंटी हुई है। यह विभाग फिर उपविभागों में बंटे हुए हैं। जैसे बीसा या दसा अथवा रहने के स्थान के अनुसार।” इससे स्पष्ट है कि विवाह के लिए हिन्दू समुदाय अत्यन्त छोटे-छोटे समूहों में बंटा है जिसे वे जाति कहते हैं।

वैदिक और उत्तर वैदिक काल में अन्तर्विवाह का क्षेत्र बहुत विस्तृत था और इस विस्तृत क्षेत्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जिन्हें ‘द्विज’ के नाम से सम्बोधित किया जाता था एक दूसरे से विवाह सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे। अन्तर्विवाह की नीति के द्वारा केवल शूद्रों से ही सामाजिक दूरी बनाये रखने का प्रयत्न किया गया। मनु ने भी अन्तवर्ण विवाह की अनुमति दे रखी थी किन्तु अत्यन्त निम्न वर्ण की लड़कियों से कुछ विशेष परिस्थितियों में ही विवाह करने की आशा थी। यद्यपि 11 वीं शताब्दी तक इस सम्बन्ध में कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं थे, किन्तु इसके बाद धीरे- धीरे अन्तवर्ण विवाह पर प्रतिबन्ध कठोर होने लगे।

अन्तर्विवाह के नियम को प्रोत्साहित करने में अनेक कारणों की भूमिका ि जैसे भारत में प्रजातीय समूहों के आगमन के बाद प्रजातीय और सांस्कृतिक भिन्नता अधिक होने के कारण प्रत्येक समूह अपने समूह के अन्दर ही विवाह पर जोर देने लगा। इससे अन्तर्विवाह समूह मजबूत होने लगे। इसके अतिरिक्त बाल-विवाह, हिन्दू समाज पर मुस्लिमों के आक्रमण, कर्म के स्थान पर जन्म पर अधिक बल तथा जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव इन समस्त कारणों ने अन्तर्विवाह के नियम को कठोर बना दिया। दूसरी ओर शिक्षा के बढ़ते स्तर, औद्योगीकरण तथा नित नये कानूनों ने अन्तर्विवाह के नियमों की कठोरता को कम किया है। सन् 1955 में बने ‘हिन्दू विवाह अधिनियम के द्वारा अन्तर्विवाह के निषेध को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया लेकिन कानूनों के बाद भी व्यावहारिक रूप से हिन्दुओं में अन्तर्विवाह की नीति को व्यापक रूप से अपनाया जाता रहा है।

(2) बहिर्विवाह का नियम

हिन्दुओं में बहिर्विवाह के नियमों के अनुसार, एक व्यक्ति को अपने परिवार, गोत्र, प्रवर, पिण्ड एवं जाति के कुछ समूहों के बाहर विवाह करना चाहिए। जनजातियों में एक ही टोरम को मानने वाले लोगों को भी परस्पर विवाह करने की मनाही है। रिवर्स के अनुसार- “बहिर्विवाह से उस विनियम का बोध होता है जिसमें एक सामाजिक समूह के सदस्य के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह दूसरे सामाजिक समूह से अपना जीवन साथी जुड़े।” हिन्दुओं में प्रचलित बहिर्विवाह के स्वरूप निम्नांकित हैं-

(क) गोत्र बहिर्विवाह

साधारणतया गोत्र का अर्थ उस समूह से समझा जाता है जो एक ही ऋषि या पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं अर्थात् वंशज हिरण्यकेशी श्रोतसूत्र के अनुसार, “विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य नामक आठ ऋषियों की सन्तानों को गोत्र के नाम से पुकारा गया।” करिन्दीकर के शब्दों में, “श्रग्वेद काल में गोत्र शब्द यद्यपि परिवार के बाद अर्थ को प्रकट नहीं करता था, पर धीरे-धीरे समूह के विचार को अपने में सम्मिलित करता गया। यह शब्द निश्चित रूप से परिवार के अर्थ में छान्दोग्य उपनिषद में आया है।” गोत्र बहिर्विवाह अथवा सगोत्र में विवाह करने का प्रतिबन्ध कब और कैसे प्रारम्भ हुआ इसके विषय में निश्चित रूप से अधिक नहीं कहा जा सकता। पुराणों में इस प्रतिबन्ध • का कोई उल्लेख नहीं है यह प्रतिबन्ध प्रथम बार गृह सूत्र साहित्य में आता है। भारत में लगभग सभी जातियां किसी-न-किसी पूर्वज से अपनी उत्पत्ति का दावा करके अनेक गोत्र समूहों में विभाजित हैं और इस प्रकार वे अपने गोत्र के सदस्यों के साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करना नैतिक नहीं समझती।

(ख) प्रवर बहिर्विवाह

वैदिक इण्डेक्स के अनुसार, “प्रवर का अर्थ आह्नान करना होता है।” इण्डोआर्यन लोगों में अग्नि की पूजा या हवन का प्रचलन था। हवन करते समय पुरोहित अपने प्रमुख या श्रेष्ठ ऋषि पूर्वज का नाम लेते थे। इस प्रकार प्रवर के अन्तर्गत एक व्यक्ति के उन पूर्वजों का समावेश है जो अग्नि का आह्वान करते हैं। कापड़िया लिखते हैं, “प्रवर संस्कार अथवा ज्ञान के उस समुदाय की ओर संकेत करता है जिससे एक व्यक्ति सम्बन्धित होता. है।” प्रवर आध्यात्मिक दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित लोगों के समूह की ओर संकेत करता है न कि रक्त सम्बन्धियों की ओर संक्षेप में कहा जा सकता है कि वे सभी व्यक्ति जो एक सामान्य ऋषि पूर्वज से अपना संस्कारात्मक या आध्यात्मिक सम्बन्ध जोड़ते हैं, अपने को उसी एक पूर्वज से सम्बन्धित मानने के कारण आपस में विवाह नहीं करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रवर का कोई भी सम्बन्ध रक्त सम्बन्ध से नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक या आध्यात्मिक या संस्कार सम्बन्ध से सम्बन्धित समूह की ओर संकेत करता है। वर्तमान समय में यज्ञों का प्रचलन न होने के कारण प्रवर की धारणा लगभग समाप्त हो चुकी है।

(ग) सपिण्ड बहिर्विवाह

करें सपिण्डता का अर्थ बताती हैं सपिण्ड (together + ball of rice, a body) अर्थात् मृत व्यक्ति को पिण्ड दान देने वाले या उसके रक्त कण से सम्बन्धित मनु के अनुसार, “सपिण्ड विवाह के निषेध मातृपक्ष की लड़की से विवाह न करने से सम्बद्ध है। इसलिए मनु ने मौसी, मामी और बुआ की लड़की से विवाह करना बहुत बुरा समझा।” जबकि ‘दायभाग के अनुसार पिण्ड का अर्थ चावल के उन गोलों से है जो श्राद्ध के समय पूर्वजों को अर्पित किये जाते हैं। इस प्रकार एक ही व्यक्ति या पूर्वज को पिण्डदान करने वाले व्यक्ति आपस में सपिण्ड होते हैं और इस कारण उनके बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकते। दूसरी ओर ‘मिताक्षरा’ के अनुसार, पिण्ड का अर्थ ‘समान रक्त कणों’ से है। इस प्रकार जिन लोगों में समान पूर्वज का रक्त होने की सम्भावना की जाती है, वे सभी व्यक्ति सपिण्ड होते हैं और उनके बीच विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकते। वशिष्ठ ने पिता की ओर से सात व माता की ओर से पांच, याज्ञवल्क्य ने भी माता की ओर से पांच तथा पिता की ओर से सात पीड़ियों का उल्लेख किया है अर्थात् इतनी पीढ़ियों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता।

परन्तु सदैव ही सपिण्डता के नियमों का विवाह में पालन नहीं हुआ है। कृष्ण ने ए अपने मामा की लड़की रुक्मणी तथा अर्जुन ने भी अपने मामा की लड़की सुभद्रा से विवाह किया था। कर्नाटक व मैसूर के ब्राह्मणों में बहिन की लड़की तथा दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह करने की प्रथा आज भी प्रचलित है, किन्तु स्मृतियों में इस प्रकार के विवाहों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाये जाने का वर्णन है।

(घ) ग्राम बहिर्विवाह

ग्राम बहिर्विवाह एक ऐसा नियम है जिसके अनुसार व्यक्ति अपने ही गांव में विवाह नहीं करेगा। यह नियम उत्तरी भारत में प्रमुखतः पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास लागू है। इस प्रकार के विवाह का कारण गांव की जनसंख्या का सीमित होना, उसमें एक ही गोत्र, वंश अथवा परिवार के सदस्यों का निवास होना आदि रहे हैं।

(ङ) टोटम बहिर्विवाह

यह नियम भारतीय जनजातियों में प्रचलित है। टोटम कोई भी एक पशु, पक्षी, पेड़-पौधों अथवा निर्जीव वस्तु हो सकती है जिसे एक गोत्र के लोग आदर एवं श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं, यह एक आध्यात्मिक सम्बन्ध होता है। एक गोत्र का एक टोटम हाता और एक टोटम को मानने वाले परस्पर भाई-बहिन समझे जाते हैं अतः वे परस्पर विवाह नहीं कर सकते।

बहुपत्नी विवाह के गुण-दोष लिखिए।

अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह (Amlom and Pratilom Marriage)

हिन्दुओं में विवाह सम्बन्धी अनेक निषेधों का पालन किया जाता है। उनमें अनुप्रतिलोम के नियम भी महत्वपूर्ण हैं। इन नियमों का पालन लगभग सभी हिन्दू करते हैं। संक्षेप में इनका वर्णन निम्नलिखित है-

अनुलोम विवाह

अनुलोम विवाह वह विवाह है जिसके अनुसार पुरुष का वर्णं या जाति स्त्री से उच्च होती है। याज्ञवक्त्य ने लिखा है कि ब्राह्मण चार विवाह कर सकता है, एक अपने वर्ण से तथा एक-एक अन्य तीनों वर्णों से क्षत्रिय तीन विवाह कर सकता है एक अपने वर्ण से तथा दो अन्य वर्ण से वैश्य दो स्त्रियों से विवाह कर सकता है एक अपने वर्ण से तथा दूसरा अपने से नीचे वर्ण अथवा शूद्र वर्ण से शूद्र केवल एक विवाह कर सकता है अपने वर्ण से। अतः स्पष्ट है कि जब एक उच्च वर्ण, जाति, उपजाति, कुल एवं गोत्र के लड़के का विवाह एक ऐसी लड़की से किया जिसका वर्ण, जाति उपजाति, कुल एवं वंश लड़के से निम्न हो तो ऐसे विवाह को अनुलोम विवाह कहेंगे। उद्यहरणार्थ एक ब्राह्मण लड़के का विवाह एक क्षत्रिय वा वैश्य लड़की से होता है तो इसे अनुलोम विवाह कहते हैं। वैदिक काल से लेकर मनुस्मृति काल तक ऐसे विवाहों का प्रचलन रहा है। महाभारत में लिखा है ब्राह्मण तीन वर्ण, क्षत्रिय दो वर्ण तथा वैश्य अपने ही वर्ण की कन्या से विवाह करें तो उनसे जो सन्तति होती है वह हितकारी होती है।

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