हर्ष की प्रारम्भिक कठिनाईयों पर प्रकाश डालिये।

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हर्ष की प्रारम्भिक कठिनाईया सन् 606 ई. में हर्षवर्धन थानेश्वर के सिंहासन पर विराजमान हुआ। यह सिंहासन उसे बहुत ही विषम परिस्थितियों में प्राप्त हुआ था। एक ओर कन्नौज के शासक गृहवर्धन (हर्ष के बहनोई) की हत्या कर दी गयी थी और उसकी पत्नी (हर्ष की बहन) राज्यश्री को बन्दी बना लिया गया था। वहीं हर्ष के बड़े भाई राज्य वर्धन की भी हत्या कर दी गयी थी। उसके नवस्थापित राज्य के अनेक शत्रु थे जो उसके राज्य का अन्त कर देना चाहते थे। हर्ष के सामने एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या कन्नौज की थी। इस समय कन्नौज का राजसिंहासन रिक्त था। वह चारों ओर शत्रुओं से घिरा हुआ था। मालवा के राजा को राज्यवर्धन ने युद्ध में परास्त कर दिया। किन्तु शशांक के विरुद्ध वह सफल नहीं हो सका था। राज्यश्री किसी प्रकार से मुक्त हो गयी। बन्दीगृह से मुक्त होकर उसने विन्ध्याचल की श्रेणियों में शरण ली थी। वह अपने पति की मृत्यु के कारण बहुत क्षुब्ध एवं दुःखी थी। वह स्वयं राज्य का भार संभालने के लिए उद्यत नहीं थीं। वह निःसंतान थी और राज्य का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं था।

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