डॉ. हरिवंशराय बच्चन का जीवन परिचय (निबंध)

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प्रस्तावना- हमारा भारत देश वीरों, योद्धाओं, कवियों तथा महान लेखकों की जन्मभूमि है। इन महान लोगों ने भारतवर्ष को हर क्षेत्र में सर्वोपरि स्थान दिलाया है। जहाँ वीर योद्धाओं ने भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, वही महान कवियों तथा लेखकों ने भी अपने चेतनामयी गय तथा पद्य के माध्यम से सुप्तप्राय मनुष्यों में जागरुकता लाने का कार्य किया है। ऐसे ही महान साहित्यकारों में डॉ. हरिवंशराय बच्चन का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।

जन्म परिचय एवं शिक्षा

प्रखर छायावाद तथा आधुनिक प्रगतिवाद के प्रमुख स्तम्भ डॉ. हरिवंशराय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को प्रयाग के पास स्थित ‘आमोड़’ नामक गाँव में हुआ था ‘बच्चन’ इनके माता-पिता द्वारा दिया जाने वाला प्यार का नाम था, जिसे उन्होंने अपना उपनाम बना लिया था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कायस्थ पाठशाला से हुई थी इसके पश्चात् आपने इलाहाबाद के राजकीय कॉलेज एवं विश्व प्रसिद्ध ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की पढ़ाई समाप्त कर आप ‘अध्यापन’ से जुड़ गये तथा सन् 1941 1 से 1952 तक आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य किया। तत्पश्चात् पी-एच.डी. करने आप इंग्लैण्ड चले गए जहाँ 1952 से 1954 तक आपने अध्ययन किया। आपने ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ से पी-एच.डी. की डिग्री ‘डब्ल्यू.बी. येट्स’ के कार्यों पर शोध कर ग्रहण की। अंग्रेजी साहित्य में आपने पी-एच.डी. की डिग्री तो प्राप्त कर ली, परन्तु हिन्दी को भारतीय जनमानस की भाषा मानते हुए आपने इसी क्षेत्र में साहित्य सृजन करने का निर्णय लिया। कैम्ब्रिज से लौटकर आप एक वर्ष तक पूर्व पद पर कार्य करते रहे। इसके बाद आपने आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र में कार्य किया। आप सोलह सालों तक दिल्ली में रहे तथा उसके बाद विदेश मन्त्रालय में दस सालों तक हिन्दी विशेषज्ञ जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन रहे। आपको छः वर्षों के लिए राज्य सभा में विशेष सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया।

काव्य रचनाएँ

डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने अपने काव्य काल के आरम्भ से लेकर 1983 तक अनेक काव्य रचनाएँ की है, इनमें हिन्दी कविता में नवीन आयाम देने वाली उनकी कालजयी रचना ‘मधुशाला’ आपकी सबसे लोकप्रिय हिन्दी कविता है। मधुशाला में शराब एवं मयखाना के माध्यम से प्रेम, सौन्दर्य, पीड़ा, दुख, मृत्यु और जीवन के सभी पहलुओं को अति सुन्दर रूप में प्रदर्शित किया गया है। मधुशाला के अतिरिक्त ‘मधुकलश’, ‘निशा निमन्त्रण’, ‘मिलन ‘योगिनी’, ‘खादी के फूल’, ‘बहुत दिन बाते’, ‘जाल समेटा’, ‘आकुल अन्तर, ‘बुध व नाच घर’, ‘आरती व अंगार’, ‘त्रिभंगिमा’ आदि प्रमुख हैं। आपकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना तथा जीवन दर्शन के स्वर मिलते हैं। डॉ. बच्चन की आत्मकथा तीन खण्डों में विभक्त हैं तथा बच्चन रचनावली नी खण्डों में हुई है। आपने महान अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयर के दुखान्त नाटकों का हिन्दी अनुवाद करने के साथ-साथ रूसी कविताओं का हिन्दी संग्रह भी प्रकाशित किया है आपकी कविताओं में आरम्भिक छायावाद, रहस्यवाद, प्रयोगवाद एवं प्रगतिवाद का सुन्दर समावेश प्रदर्शित होता है।

आपने अपनी रचनाओं में अधिकतर सरल भाषा का प्रयोग किया हैं। आप कभी भी किसी साहित्य आन्दोलन से नहीं जुड़े तथा प्रत्येक विधा को अपनाया। इसके अतिरिक्त आपने फिल्मों के लिए भी गीत लिखे हैं, जिनमें यश चोपड़ा द्वारा निर्मित फिल्म ‘सिलसिला’ का ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे…’ उनकी रुमानी कलम द्वारा लिखा गीत है। इसके अतिरिक्त उन्होंने फिल्म ‘अग्निपथ’ सहित कई अन्य फिल्मों के भी गीत लिखे हैं। उनकी कविता ‘अग्निपथ’ मनुष्य को यह सन्देश देती है कि मनुष्य को राह में सुख रूपी छाँव की चाह न कर अपनी मंजिल की ओर कर्मठतापूर्वक बिना थकान महसूस किए बढ़ते रहना चाहिए।

पुरस्कारों से सम्मानित

डॉ. बच्चन को उनके अमूल्य साहित्यिक योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता रहा है। सन् 1968 में आपको हिन्दी कविता का ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। यह पुरस्कार आपको आपकी कृति ‘दो चट्टाने’ के लिए दिया गया था। आपको आत्मकथा के लिए विडला फाउन्डेशन द्वारा “सरस्वती सम्मान’ से विभूषित किया गया, जिसके • फलस्वरूप आपको तीन लाख रुपए दिए गए। सन् 1968 में ही आपको सोवियत लैण्ड नेहरू एवं एफ्रोएशियाई सम्मेलन के ‘कमल पुरस्कार‘ से सम्मानित किया गया। साहित्य सम्मेलन द्वारा आपको ‘साहित्य वाचस्पति’ पुरस्कार प्रदान किया गया। तत्पश्चात् भारत सरकार ने आपको ‘पद्मभूषण पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया।

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उपसंहार

डॉ. बच्चन देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू से काफी मधुर सम्बन्ध रखते थे। 18 जनवरी 2003 को डॉ. हरिवंशराय बच्चन का मुम्बई में देहावसान हो गया। आपकी मृत्यु आपके पुत्र, सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन के मुम्बई स्थित आवास ‘प्रतीक्षा’ में हुई। उस समय आपकी आयु 96 वर्ष थी। 1 जनवरी को जुहू (मुम्बई) के रूइया पार्क स्थित वैकुण्ठधाम श्मशान भूमि पर आपके बेटे अमिताभ बच्चन ने ही अनगिनत लोगों की उपस्थिति में आपको मुखग्नि दी तथा उसी क्षण आपका पार्थिव शरीर पंचतत्त्व में विलीन होकर अमर हो गया। आज शारीरिक रूप में हमारे साथ न होते हुए भी कविवर डॉ. हरिवंशराय बच्चन अपने काव्य के रूप में हमारे मध्य उपस्थित हैं।

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