गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का योग में क्या योगदान है?

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गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का योग

योग के इतिहास में वर्णित कथानुसार मत्स्येन्द्रनाथ जी को विष्णु का अवतार कहा गया है। इनके जन्म के विषय में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार शंकर जी द्वारा माँ पार्वती को योग की अमर कथा सुनाई जा रही थी शर्त यह थी कि पार्वती जी को बीच-बीच में हुंकार भरनी थी। माँ पार्वती को कथा सुनते-सुनते नींद आ गई जब विष्णुजी ने देखा कि माँ पार्वती को नींद आ गई तो उन्होंने मछली का रूप प्रकट किया और हुंकार भरने लगे। जब शंकर जी ने अपने नेत्र खोले तो देखा कि पार्वती जी सो रही हैं। तत्काल उन्होंने कहा कि कौन है जो हुंकार भर रहा है सामने आ जाये। विष्णु जी मछली से बच्चे के रूप में प्रकट हो गए। शंकर जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और योग को शिक्षा दी तभी से वह मत्स्येन्द्रनाथ कहलाए।

गोरखनाथ, भर्तृहरि, पूरनमल आदि मत्स्येन्द्रनाथ जी के शिष्य थे। एक बार गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी एक नगरी से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति जिसके हाथ पैर बिल्कुल कटे हुए थे। यह लुंज-पुंज होकर पृथ्वी पर पड़ा हुआ था। मत्स्येन्द्रनाथ जी को उस पर बड़ी दया आई और उनकी कृपा मात्र से उस व्यक्ति के हाथ-पाँव जुड़ गये वह व्यक्ति चौरंगी योगी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत एक उपभोक्ता कौन होता है?

मत्स्येन्द्रनाथ जी एक नगरी से गुजर रहे थे। कुएं पर एक व्यक्ति पड़ा मिला। वह व्यक्ति पूरनमल था। पूरनमल एक राजमहल का बालक था। उसकी विमाता उसके ऊपर ही आसक्त हो। गई थी। परन्तु पूरनमल ने अपने मातृत्व प्रेम को महत्व देते हुए अपनी विमाता की आसक्ति को ठुकरा दिया। इसका बदला लेने के लिए पूरनमल के हाथ पैर कटवाकर उसे कुएं में डाल दिया। गया था। संयोगवश गुरुजी रास्ते से गुजर रहे थे उन्होंने उसे बाहर निकाला पुनर्जीवन का वरदान दिया और योग की उत्तम शिक्षा दी।

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