गणराज्यों की शासन व्यवस्था वर्णन कीजिए।

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गणराज्यों की शासन व्यवस्था

गणराज्यों की शासन व्यवस्था राजतन्त्रों से काफी भिन्न थी। राजतन्त्रों में जहाँ शासन का प्रमुख वंशानुगत राजा होता था जिस पर किसी प्रकार का कोई नियन्त्रण न था, वही इसके विपरीत गणतन्त्रीय व्यवस्था में निर्वाचित राज्य कुलीनों के सहयोग से शासन करता था।

वास्तव में गणराज्यों के शासन व्यवस्था के विषय में जानकारी बहुत कम मिलती है। गणराज्यों में केवल लिच्छवियों के शासन व्यवस्था के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। सम्भवतः इसी व्यवस्था को समकालीन अन्य गणराज्यों ने कुछ परिवर्तनों के साथ अपनाया होगा। गणराज्यों की कार्यपालिका का अध्यक्ष एक निर्वाचित पदाधिकारी होता था जिसे ‘राजा’ कहा जाता था। सामान्य प्रशासन की देख-भाल के साथ-साथ गणराज्य में आन्तरिक शान्ति एवं सामन्जस्य बनाए रखना उसका एक प्रमुख कार्य था। अन्य पदाधिकारियों में उपराजा (उपाध्यक्ष), सेनापति, भाण्डागारिक (कोषाध्यक्ष) आदि प्रमुख थे। परन्तु राज्य की वास्तविक शक्ति एक केन्द्रीय समिति अथवा संस्थागार में निहित होती थी। इस समिति के सदस्यों की संख्या काफी बड़ी होती थी। समिति के सदस्य भी ‘राजा’ कहे जाते थे।

एकपण्ण जातक के अनुसार लिच्छति गणराज्य की केन्द्रीय समिति में 7707 राजा थे तथा उपराजाओं, सेनापतियों और कोषाध्यक्षों की संख्या भी यही थी। इसी प्रकार एक स्थान पर शाक्यों के संस्थागार के सदस्यों की संख्या 500 बतानी गई है। ये सम्भवतः राज्य के कुलीन परिवारों के प्रमुख थे जिन्हें ‘राजा’ की पदवी का अधिकार था। प्रत्येक राजा के अधीन उपराजा,सेनापति भण्डागारिक आदि पदाधिकारी होते थे। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि लिच्छवि राज्य अनेक छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभक्त था तथा प्रत्येक इकाई का अध्यक्ष एक राजा होता था जो अपने अधीन पदाधिकारियों की सहायता से उस इकाई का शासन चलाता था। प्रत्येक इकाई के अध्यक्ष केन्द्रीय समिति के सदस्य होते थे। गणराज्यों से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण विषयों, जैसे सन्धि विग्रह, कूटनीतिक सम्बन्ध, राजस्व संग्रह आदि के ऊपर केन्द्रीय समिति के सदस्य संस्थागार में पर्याप्त वाद-विवाद के पश्चात् बहुमत से निर्णय लेते थे। जब रोहिणी नदी के जल वितरण के सम्बन्ध में कोलियों तथा शाक्यों के बीच विवाद हुआ तो उन्होंने अपने-अपने अधिकारियों को सूचित किया तथा अधिकारियों ने अपने राजाओं को बताया। राजाओं ने इस विषय पर पर्याप्त वाद विवाद के पश्चात् युद्ध का निर्णय लिया।

इस प्रकार कोशल नरेश विहम द्वारा शाक्य गणराज्य पर आक्रमण किए जाने तथा उनकी राजधानी का घेरा डालकर उनसे आत्म-समर्पण के लिए कहे जाने पर शाक्यों ने अपने संस्थागार में आत्म समर्पण अथवा युद्ध करने के ऊपर विचार विमर्श किया। अन्त में बहुमत से आत्म-समर्पण का निर्णय लिया गया। लिच्छवि गणराज्य में सेनापति के चुनाव का भी एक विवरण प्राप्त होता है। तदनुसार सेनापति खण्ड की मृत्यु के बाद सेनापति सिंह की नियुक्ति संस्थागार के सदस्यों द्वारा निर्वाचन के आधार पर की गई थी। कुशीनारा के मल्लों ने बुद्ध की अन्त्येष्टि तथा उनकी धातुओं के विषय में अपने संस्थागार में विचार-विमर्श किया था। इन उल्लेखों से स्पष्ट है कि गणराज्यों का शासन जनत त्रात्मक ढंग से चलाया जाता था।

संस्थागार की कार्यवाही आधुनिक प्रजातन्त्रात्मक संसद के ही समान थी। प्रत्येक सदस्य को बैठने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की जाती थी। उस कार्य के लिए आसनपन्नापक नामक अधिकारी नियुक्त था। कोरम की पूर्ति, प्रस्ताव रखने, मतगणना आदि के लिए सुस्पष्ट एवं सुनिश्चित नियम होते थे। संस्थागार में रखा जाने वाला प्रस्ताव सामान्यतः दोन बार दोहराया जाता था, तथा विरोध होने पर स्वीकार कर लिया जाता था। विरोध होने पर बहुमत लिया जाता था। गुप्तमत प्रणाली की प्रथा थी। अनुपस्थित सदस्य के मत लेने के भी । यम बने हुए थे। मतदान अधिकारी को ‘शलाका ग्राहक कहा जाता था। प्रत्येक सदस्य को अनेक रंगों की शलाकाएँ दी जाती थीं। विशेष प्रकार के मत के लिए विशेष रंग की शलाका होती थी जो शलाका ग्राहक के | पास पहुँचती थी। भत के लिए ‘छन्द’ शब्द का प्रयोग मिलता है। विवादग्रस्त विषय समितियों के पास भेजे जाते थे। संस्थागार के कार्यों के संचालन के लिए अनेक पदाधिकारी होते थे।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के उद्देश्य बताइये।

गण की कार्यपालिका का अध्यक्ष ही सम्भवतः संस्थागार का भी प्रधान होता था। सामान्यतः गणराज्यों की सरकार पर केन्द्रीय समिति का पूर्ण नियन्त्रण होता था। राज्य के उच्च पदाधिकारी तथा प्रादेशिक शासकों की नियुक्ति समिति द्वारा ही की जाती थी। गणराज्यों में एक मंत्रिपरिषद भी होती थी जिसमें चार से लेकर बीस तक सदस्य होते थे। केन्द्रीय समिति द्वारा ही नियुक्त किए जाते थे। गणाध्यक्ष ही मन्त्रिपरिषद का प्रधान होता था। केन्द्रीय समितियाँ न्याय का भी कार्य करती थीं।

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