ईसाई परिवार की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

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ईसाई परिवार की विशेषताओं का वर्णन –ईसाई परिवार की विशेषताये निनम लिखित हैं।

( 1 ) पितृसत्तात्मक व्यवस्था

ईसाई परिवार इस दृष्टिकोण से पुरुष-प्रधान हैं कि इनमें वंश की परम्परा पिता के नाम पर ही चलती है। यहां तक कि प्रत्येक व्यक्ति के नाम के साथ उसके पिता के नाम का पहला हिस्सा जुड़ा रहता है। साधारणतया परिवार की सम्पत्ति का हस्तान्तरण भी पिता से उसके पुत्र अथवा पुत्रों को होता है। जो आदिवासी धर्म परिवर्तन के द्वारा ईसाई बने हैं, उनमें मातृसत्तात्मक परिवारों की भी अनेक विशेषताएं देखने को मिलती हैं लेकिन धीरे-धीरे इस श्रेणी के परिवार भी पुरुष प्रधान होते जा रहे हैं।

(2) केन्द्रक परिवारों की प्रधानता

ईसाई जीवन में संयुक्त परिवारों का अभाव है। अधिकांश ईसाई परिवार केन्द्रक अथवा एकाकी प्रकृति के होते हैं। ईसाई परिवार में वैयक्तिक स्वतन्त्रता का विशेष महत्व होने तथा सम्मिलित सम्पत्ति का अभाव होने के कारण विवाह के बाद अधिकांश व्यक्ति अपने माता-पिता से अलग होकर एक पृथक परिवार की स्थापना कर लेते हैं। जीवन के प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण होने तथा भौतिक सुख-सुविधाओं को अधिक महत्वपूर्ण मानने के कारण परिवार के आकार को छोटे से छोटा रखने का प्रयत्न किया जाता है। परम्परागत रूप से कैथॉलिक धर्म परिवार नियोजन को अधार्मिक मानता है लेकिन आज अधिकांश ईसाई अपने रहन-सहन के स्तर को ऊंचा रखने के लिए केन्द्रक और छोटे परिवार को ही पसन्द करते हैं। ऐसे परिवारों को डॉ. एस. सी. दुबे ने ‘नवस्थानीय परिवार’ कहा है।

(3) समतावादी मूल्य

ईसाई परिवारों पर प्रोटेस्टेण्ट धर्म के आचारों की एक स्पष्ट छाप देखने को मिलती है। प्रोटेस्टेण्ट धर्म के आचार मानवतावाद, समानता, स्वतन्त्रता तथा आत्मनिवेदन (confession) को विशेष महत्व देते हैं। इसके फलस्वरूप ईसाई परिवारों में समतावादी मूल्यों को अधिक महत्व दिया जाता है। परिवार में स्त्री-पुरुषों, वृद्धों तथा युवकों के विचारों का समान महत्व होता है। माता-पिता तथा उनके लड़कों और लड़कियों के बीच साधारणतया मित्रता के सम्बन्ध देखने को मिलते हैं। परिवार के प्रमुख निर्णय सभी सदस्यों की सहमति से लिये जाते हैं। ईसाई समाज में केवल उन्हीं परिवारों को अच्छी दृष्टि से देखा जाता है जिनमें एक स्वतन्त्र वातावरण होने के साथ ही सदस्यों के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध होते हैं। ईसाई परिवारों की यह विशेषता हिन्दू और मुस्लिम परिवारों से काफी भिन्न है।

( 4 ) आर्थिक आत्मनिर्भरता

ईसाई परिवारों में सम्मिलित सम्पत्ति जैसी कोई विशेषता नहीं पायी जाती। प्रत्येक सदस्य से यह आशा की जाती है वह अपनी आजीविका स्वयं उपार्जित करे तथा अपने द्वारा उपार्जित धन का अपनी इच्छानुसार उपयोग करे। माता-पिता की मृत्यु क बाद उनकी सम्पत्ति का शीघ्र से शीघ्र विभाजन कर लेना अच्छा समझा जाता है। परिवार में उन स्त्रियों और लड़कियों को अधिक सम्मान मिलता है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों।

(5) अर्जित स्थिति का महत्व

ईसाई पश्चिम की उस संस्कृति से प्रभावित हैं जिसमें व्यक्ति के जन्म अथवा वंश की तुलना में उसकी योग्यता और कुशलता को अधिक महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि परिवार का जो सदस्य सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में जितनी अधिक सफलता प्राप्त कर लेता है, उसे अपने परिवार में उतनी ही अधिक प्रतिष्ठा मिल जाती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि एक ही परिवार के सदस्यों के बीच आर्थिक आधार पर ऊंच-नीच का कोई विभेद होता हो। इसका तात्पर्य केवल यह है कि केवल आयु अथवा लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को परिवार में विशेष अधिकार नहीं मिलते। परिवार में जो स्त्रियां आर्थिक जीवन में सफलता प्राप्त कर लेती हैं, उन्हें अक्सर पुरुषों से भी अधिक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। यह सच है कि इस विशेषता के कारण ईसाई परिवारों में व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन मिलता है लेकिन परिवार के उदार और मित्रतापूर्ण वातावरण में व्यक्तिवादिता के दोष अपने आप कमजोर पड़ जाते हैं।

(6) स्त्रियों की उन्नत स्थिति

सैद्धान्तिक रूप से ईसाई परिवारों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था पायी जाती है लेकिन व्यवहार में स्त्रियों और पुरुषों के अधिकार एक-दूसरे के समान होते हैं। परिवार में लकड़ियों की शिक्षा को उतना ही महत्व दिया जाता है जितना कि लड़कों की शिक्षा को परिवार की सभी अविवाहित लड़कियों और विवाहित स्त्रियों को आजीविका उपार्जित करने की पूरी स्वतन्त्रता है। ईसाई परिवारों में न तो बाल विवाह का प्रचलन है और न ही दहेव के द्वारा कन्या पक्ष का शोषण किया जाता है। अविवाहित रहकर जीवन व्यतीत करना सामाजिक अपराध के रूप में नहीं देखा जाता। व्यावहारिक रूप से आज विधवा पुनर्विवाह को भी चर्च द्वारा मान्यता दी जाने लगी है। स्त्रियां अपने जीवन साथी का चुनाव करने के लिए पूरी तरह स्वतन हैं। उच्च श्रेणी के ईसाई परिवारों में माता-पिता का यह प्रयत्न रहता है कि उनकी पुत्री को भी पुर के समान सम्पत्ति अधिकार प्राप्त हो। धार्मिक क्रियाओं में भाग लेने और चर्च में जाने के लिए स्त्रियां पुरुषों के समान ही स्वतन्त्र हैं। सार्वजनिक जीवन में उनकी सहभागिता पुरुषों से कम नहीं है। इन्हीं दशाओं के फलस्वरूप ईसाई परिवार में पति-पत्नी के सम्बन्ध अधिक मित्रतापूर्ण देखने को मिलते हैं।

(7) तर्कप्रधान जीवन

शिक्षा के प्रभाव तथा समाजवादी मूल्यों के कारण ईसाई परिवार व्यवस्था तर्कप्रधान है। अधिकांश ईसाई परिवारों में रूड़ियों, अन्धविश्वासों और कुप्रथाओं का कोई स्थान नहीं है। यह सच है कि ईसाई परिवारों में भी कुछ संस्कारों और अनुष्ठानों को महत्व दिया जाता है लेकिन ऐसे कर्मकाण्डों में विश्वास नहीं किया जाता जिनका कोई सामाजिक महत्व न हो। बपतिस्मा (Baptisma) एकमात्र वह संस्कार है जिसका आयोजन साधारणतया सभी ईसाई परिवारों में किया जाता है। यह वह संस्कार है जिसके द्वारा किशोर होने पर बच्चे को चर्च में भेजकर उसे अपने धर्म की दीक्षा दी जाती है। साधारणतया परिवार में कोई धार्मिक क्रियाएं आयोजित नही की जातीं। विशेष अवसरों पर उत्सवों तथा चाय-पार्टियों का आयोजन होता है लेकिन उनका रूप धार्मिक नहीं होता। परिवार में भावना की जगह तर्क और विवेक का महत्व अधिक होता है।

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( 8 ) वैयक्तिक स्वतन्त्रता

ईसाई परिवारों की एक प्रमुख विशेषता प्रत्येक सदस्य को अधिक से अधिक वैयक्तिक स्वतन्त्रता मिलना है। परिवार का कोई सदस्य स्त्री हो या पुरुष, किशोर हो या युवा, उसे आजीविका उपार्जित करने तथा उसका अपनी इच्छानुसार उपयोग करने की पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। परिवार के बड़े और अनुभवी सदस्यों का काम केवल उन्हें उपयोगी सलाह देना है, उनकी गतिविधियों में हस्तक्षेप करना नहीं। यही कारण है कि ईसाई परिवारों में व्यक्तित्व का विकास जिस स्वाभाविक ढंग से होता है, वैसा दूसरे समाजों में कठिनता से देखने को मिलता है। वैयक्तिक स्वतन्त्रता से ईसाई परिवारों में सहयोग का एक ऐसा वातावरण विकसित होता है जो ऐच्छिक और आत्मिक होता है।

ईसाई परिवारों की इन सभी विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि सैद्धान्तिक रूप से ईसाई परिवारों का जीवन भी धर्म प्रधान माना गया है लेकिन व्यावहारिक रूप से ईसाई परिवार कहीं अधिक स्वतन्त्र, समतावादी, तर्कप्रधान तथा आत्मनिर्भर होते हैं। यह सच है कि ईसाई परिवारों में आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की प्रक्रिया हिन्दू परिवारों की तुलना में कहीं अधिक देखने को मिलती है लेकिन भारत के अधिकांश ईसाई परिवार आज भी हिन्दू परिवार की विशेषताओं के अधिक निकट हैं। दूसरा तथ्य यह है कि ईसाई परिवारों का जीवन अधिक सन्तुलित है। इन परिवारों में आन्तरिक विघटन के वे लक्षण नहीं पाये जाते जो हिन्दू अथवा मुस्लिम परिवारों में देखने को मिलते हैं।

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