धर्म से आपका क्या अभिप्राय है?

धर्म से अभिप्राय

धर्म शब्द आँग्ल भाषा के “रिलीजन’ शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। रिलीजन शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘Religio’ शब्द से हुई है जो कि स्वयं धातु से निकला है जिसका अभिप्राय बांधने से है। दूसरे शब्दों में किसी “अलौकिक’ या “समाजोपरि’ या “अतिमानवीय शक्ति’ पर विश्वास करने को ही धर्म कहते हैं। किन्तु विश्वास करने पर ही एक मात्र धर्म आधारित नहीं होता बल्कि विश्वास का एक “भावात्मक आधार’ भी होता है अर्थात् उस शक्ति के प्रति भय, श्रद्धा, प्रेम इत्यादि भाव भी रहते हैं।

इसके अतिरिक्त धर्म के अन्तर्गत एक सांसारिक पक्ष भी निहित रहता है अर्थात् उस अलौकिक शक्ति से लाभ उठाने तथा उसके कोप से बचने के लिये प्रार्थना या पूजा की अनेक विधियों या संस्कारों को भी करना पड़ता है। हाँ यह बात अवश्य है कि विभिन्न समाजों में अलौकिक शक्ति का स्वरूप अलग-अलग होता है तथा इस शक्ति की आराधना करने के लिये जो संस्कार किये जाते हैं, उनमें प्रयुक्त “धार्मिक सामग्रियों’, धार्मिक प्रतीकों, पौराणिक कथाओं, जादू-टोनों इत्यादि में अन्तर होता है।

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इस प्रकार धर्म का तात्पर्य किसी अलौकिक या समाजोपरि या अति मानवीय शक्ति, जिसे प्रायः हम ईश्वर कहते है, पर विश्वास से है जिसका आधार भय, श्रद्धा, भक्ति, प्रेम इत्यादि की भावनायें होती हैं तथा जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना या आराधना करने की विधियों या संस्कारों में होती है।

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